लखनऊ सम्मेलन का हवाला, हाईकोर्ट के फैसले का किया स्वागत
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली/लखनऊ— बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने देश में संसद और राज्य विधानमंडलों की लगातार घटती कार्यवाही अवधि पर गंभीर चिंता जताई है.उन्होंने कहा कि सत्रों के दौरान बढ़ते हंगामे, बार-बार के स्थगन और समय की बर्बादी से लोकतांत्रिक संस्थाओं की जन-उपयोगिता प्रभावित हो रही है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है.
मायावती ने यह टिप्पणी लखनऊ में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारियों के तीन-दिवसीय सम्मेलन के संदर्भ में की है, जहां विधानमंडलों की कार्यवाही के घटते समय पर चिंता व्यक्त की गई.उन्होंने इस विमर्श को सामयिक, उचित और सराहनीय बताते हुए सरकार और विपक्ष, दोनों से इस पर गंभीरता से अमल करने की अपील किया है.
लोकतंत्र के अहम स्तंभ हैं संसद और विधानमंडल
बसपा प्रमुख ने कहा कि भारतीय संसद और राज्यों के विधानमंडल देश की संवैधानिक और लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल स्तंभ हैं.यही संस्थाएं सरकार और कार्यपालिका को जनता के प्रति जवाबदेह बनाए रखने का सबसे सशक्त माध्यम हैं.
मायावती के अनुसार, यदि संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही ही सुचारु रूप से नहीं चलेगी, तो जनहित से जुड़े मुद्दों पर सार्थक चर्चा, कानून निर्माण और नीति निर्धारण की प्रक्रिया भी कमजोर पड़ जाएगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल सत्र बुला लेना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका उत्पादक और नियमों के अनुरूप संचालन भी उतना ही जरूरी है.
साल में कम-से-कम 100 दिन कार्यवाही की आवश्यकता
मायावती ने सुझाव दिया कि संसद और सभी राज्य विधानमंडलों की कार्यवाही साल में कम-से-कम 100 दिन आयोजित की जानी चाहिए. इसके लिए एक पूर्व निर्धारित कैलेंडर बने और सदन की कार्यवाही शांतिपूर्ण, अनुशासित तथा नियमों के अनुरूप संचालित हो.
उन्होंने कहा कि लगातार हंगामे और राजनीतिक टकराव से न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि जनता के उन मुद्दों पर भी चर्चा नहीं हो पाती, जिनके लिए प्रतिनिधियों को चुना जाता है.लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष,दोनों की समान जिम्मेदारी है कि सदन की गरिमा बनी रहे.
मदरसा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का स्वागत
अपने बयान के दूसरे हिस्से में मायावती ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के एक अहम फैसले का स्वागत किया. कोर्ट ने कहा है कि सरकारी मान्यता नहीं होना किसी मदरसे को बंद करने का आधार नहीं हो सकता.
इस फैसले के तहत उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में एक मदरसे पर लगी सील को 24 घंटे के भीतर हटाने के निर्देश दिया गया हैं. मायावती ने इसे अति-महत्वपूर्ण और सामयिक निर्णय बताते हुए कहा कि इससे अल्पसंख्यक समुदाय में फैली आशंकाओं को दूर करने में मदद मिलेगी.
नीतिगत नहीं, बल्कि अधिकारियों की मनमानी का नतीजा
मायावती ने यह भी स्पष्ट किया कि उनके विचार में किसी भी सरकार की नीतिगत मंशा प्राइवेट मदरसों के खिलाफ नहीं होती. उन्होंने कहा कि अक्सर इस तरह की घटनाएं जिला स्तर पर अधिकारियों की मनमानी या गलत व्याख्या का परिणाम होती हैं, जिससे अनावश्यक विवाद पैदा होते हैं.
उन्होंने सरकार से अपेक्षा की कि ऐसे मामलों में उचित संज्ञान लिया जाए और अधिकारियों की इस तरह की प्रवृत्तियों पर सख्ती से रोक लगाई जाए, ताकि भविष्य में इस प्रकार की अप्रिय घटनाएं दोबारा न हों.
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संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सौहार्द पर जोर
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मायावती का यह बयान न केवल संसदीय कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, अल्पसंख्यक अधिकारों और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे व्यापक मुद्दों को भी सामने लाता है.
एक ओर जहां संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही को मजबूत करने की बात कही गई है, वहीं दूसरी ओर न्यायपालिका के फैसले के समर्थन के जरिए यह संदेश दिया गया है कि कानून का राज और संवैधानिक संतुलन हर स्थिति में सर्वोपरि होना चाहिए.
निष्कर्ष
मायावती का यह बयान ऐसे समय में आया है, जब देश में संसदीय कार्यवाही की गुणवत्ता और अवधि को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं.साथ ही, मदरसों और अल्पसंख्यक संस्थानों से जुड़े प्रशासनिक कदमों पर भी न्यायिक हस्तक्षेप देखने को मिल रहा है.
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि सरकार और विपक्ष मिलकर संसद और विधानमंडलों की कार्यवाही को अधिक सार्थक और अनुशासित बनाते हैं, तथा प्रशासनिक स्तर पर मनमानी पर लगाम लगाई जाती है, तो इससे लोकतंत्र में जनता का विश्वास और मजबूत हो सकता है.
स्रोत:यह खबर बसपा प्रमुख मायावती द्वारा उनके आधिकारिक एवं सत्यापित सोशल मीडिया अकाउंट @Mayawati पर एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किए गए सार्वजनिक बयान पर आधारित है

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