कांग्रेस की अपील, मोदी सरकार की नीतियां और बढ़ती चुनौतियां
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली,21 जनवरी 2026 ग्रामीण भारत केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि देश की आत्मा है.गांवों में बसने वाला मेहनतकश किसान, मजदूर और महिला ही भारत की असली ताकत हैं. इन्हीं लोगों की आजीविका और स्वाभिमान से जुड़ी योजना है मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम).आज एक बार फिर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (@INCIndia) द्वारा किए गए एक एक्स (पूर्व ट्विटर) पोस्ट ने एक बार फिर इस योजना के भविष्य को लेकर राष्ट्रीय बहस छेड़ दिया है.
कांग्रेस ने मनरेगा को ग्रामीण भारत का स्वाभिमान बताते हुए आरोप लगाया है कि नरेंद्र मोदी सरकार इस ऐतिहासिक योजना को कमजोर करने की दिशा में लगातार कदम उठा रही है. दिल्ली के जवाहर भवन में आयोजित होने वाले कार्यक्रम के जरिए मजदूरों की आवाज बुलंद करने की अपील की गई है. सवाल यह है कि क्या मनरेगा वास्तव में खतरे में है, और अगर हां, तो इसके परिणाम क्या होंगे?
मनरेगा का इतिहास और उद्देश्य
मनरेगा की शुरुआत वर्ष 2005 में यूपीए सरकार के दौरान हुआ था .इसका मूल उद्देश्य था ग्रामीण गरीब परिवारों को साल में कम से कम 100 दिन का गारंटीड रोजगार उपलब्ध कराना. 2009 में इसे महात्मा गांधी के नाम से जोड़ा गया, क्योंकि यह योजना उनके ग्राम स्वराज और आत्मनिर्भरता के विचारों से प्रेरित था.
यह दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक रोजगार गारंटी योजनाओं में से एक है.इसका कानूनी स्वरूप इसे खास बनाता है, क्योंकि यह सरकार पर रोजगार देने की बाध्यता डालता है, न कि इसे किसी दया या अनुदान की तरह पेश करता है.
ग्रामीण भारत में मनरेगा का वास्तविक योगदान
मनरेगा ने केवल रोजगार ही नहीं दिया, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिरता भी प्रदान किया है .
मुख्य योगदान, ग्रामीण गरीबी में कमी, पलायन पर रोक, मजदूरी दरों में वृद्धि,
सड़क, तालाब, नहर, जल संरक्षण जैसे टिकाऊ कार्य,
महिलाओं की आर्थिक भागीदारी में बढ़ोतरी.
दलित, आदिवासी और वंचित वर्गों को सामाजिक सुरक्षा.,
कोविड-19 महामारी के दौरान, जब लाखों प्रवासी मजदूर शहरों से गांव लौटे, तब मनरेगा ही उनका अंतिम सहारा बना. यही कारण है कि इसे ग्रामीण भारत की जीवन रेखा कहा जाता है.
महिलाओं और वंचित वर्गों के लिए सुरक्षा कवच
मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 50% से अधिक रही है. यह योजना ग्रामीण महिलाओं के लिए न सिर्फ रोजगार बल्कि आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का माध्यम बना.कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि मनरेगा महिलाओं के लिए अक्सर एकमात्र रोजगार विकल्प होता है.
दलितों और आदिवासियों के लिए भी यह योजना सामाजिक न्याय का मजबूत स्तंभ रही है, जिसने उन्हें सम्मानजनक मजदूरी और स्थानीय स्तर पर काम दिया.
मोदी सरकार की नीतियां और उठते सवाल
2014 के बाद मनरेगा को लेकर केंद्र सरकार का रुख लगातार सवालों के घेरे में रहा है. शुरुआती दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे पिछली सरकार की विफलता का स्मारक बताया था.
आलोचना के प्रमुख बिंदु
बजट में कटौती, मजदूरी भुगतान में देरी
आधार आधारित तकनीकी बाधाएं
जॉब कार्ड रद्द होना
सबसे बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब मनरेगा को VB-G RAM G (विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन) से बदलने की प्रक्रिया शुरू किया गया . आलोचकों का कहना है कि इससे काम का कानूनी अधिकार खत्म होकर यह एक विवेकाधीन योजना बन जाता है.
नया कानून: अधिकार से योजना तक का सफर
विशेषज्ञों के अनुसार, नया ढांचा
केंद्र को अत्यधिक शक्तिशाली बनाता है.
राज्यों पर 40% फंडिंग का बोझ डालता है.
गरीब राज्यों को बाहर कर सकता है.
पंचायती राज व्यवस्था को कमजोर करता है.
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इससे ग्रामीण मजदूरी और क्रय शक्ति पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
कांग्रेस की मनरेगा बचाओ मुहिम
कांग्रेस पार्टी ने मनरेगा को बचाने के लिए राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू किया है.मनरेगा बचाओ संग्राम, के तहत पंचायत से लेकर संसद तक आवाज उठाने की योजना है.
मुख्य गतिविधियां
ग्राम सभाओं में प्रस्ताव, पंचायत स्तर पर चौपाल, धरना और प्रदर्शन, विधानसभा घेराव
कानूनी चुनौती
राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने इसे संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बताया है.पार्टी का कहना है कि यह केवल एक योजना नहीं, बल्कि ग्रामीण भारत की गरिमा का सवाल है.
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दिल्ली का कार्यक्रम: प्रतीकात्मक लेकिन प्रभावी
जवाहर भवन में होने वाला कार्यक्रम खास है, जहां देशभर से मजदूर अपनी मिट्टी लेकर पहुंचेंगे. यह मिट्टी उनके पसीने, संघर्ष और अधिकारों की प्रतीक होगी.कांग्रेस इसे गांधीवादी विचारधारा और लोकतांत्रिक प्रतिरोध का मंच बता रही है.
निष्कर्ष: मनरेगा बचाना क्यों जरूरी है?
मनरेगा केवल रोजगार योजना नहीं है, यह संविधान, समानता और सामाजिक न्याय की आत्मा है. इसे कमजोर करना ग्रामीण भारत को कमजोर करने जैसा है। चाहे राजनीतिक मतभेद हों, लेकिन ग्रामीण गरीबों के अधिकारों पर समझौता नहीं होना चाहिए.
आज जरूरत है कि नागरिक, संस्थाएं और जनप्रतिनिधि मिलकर इस योजना की रक्षा करें, ताकि गांव मजबूत हों और देश आत्मनिर्भर बने.
जय हिंद, जय लोकतंत्र!
न्यूज़ स्रोत: @INCIndia (कांग्रेस का आधिकारिक एक्स हैंडल) वयान केआधार पर

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