राज्यसभा में अशोक सिंह के X पोस्ट का हवाला, MSP से कम दाम और आयात नीति पर उठे सवाल
तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 11 फरवरी भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर सियासत तेज हो गया है.कांग्रेस के आधिकारिक X (पूर्व ट्विटर) हैंडल @INCIndia पर साझा की गई जानकारी के अनुसार, राज्यसभा सांसद अशोक सिंह ने सरकार की आयात नीति पर गंभीर सवाल उठाया हैं.उनका कहना है कि अमेरिका से सोयाबीन तेल और अनाज के आयात के लिए दरवाजे खोलना मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसानों के लिए मुसीबत साबित हो सकता है.
अशोक सिंह के अनुसार, एक तरफ राज्य का किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार 2025-26 के लिए घोषित 5,300 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से कम दाम पर बिक रहा फसल को लेकर प्रभावी हस्तक्षेप नहीं कर रहा है. ऐसे में यदि अमेरिका से सस्ता सोयाबीन तेल भारत आता है, तो घरेलू बाजार में कीमतों पर और दबाव पड़ेगा.
मध्य प्रदेश: देश की सोयाबीन राजधानी और बढ़ती चिंता
मध्य प्रदेश को देश की ,सोयाबीन राजधानी कहा जाता है. राज्य के लाखों किसान खरीफ सीजन में सोयाबीन की खेती पर निर्भर रहता हैं. यह फसल न केवल किसानों की आय का प्रमुख स्रोत है, बल्कि तेल उद्योग और पशु चारा उद्योग के लिए भी महत्वपूर्ण कच्चा माल उपलब्ध कराता है.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में किसानों को मौसम की मार, उत्पादन लागत में बढ़ोतरी और बाजार में कीमतों की अनिश्चितता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है. बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल और मजदूरी की लागत लगातार बढ़ा है, जबकि मंडियों में फसल का दाम अक्सर MSP से नीचे चला जाता है.
2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने सोयाबीन का MSP 5,300 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है. लेकिन कांग्रेस का आरोप है कि जमीनी हकीकत में किसान अपनी उपज इस तय कीमत से काफी कम पर बेचने को मजबूर हैं. यदि MSP पर प्रभावी खरीद नहीं होती, तो इसकी घोषणा किसानों के लिए केवल कागजी राहत बनकर रह जाता है.
आयात बनाम आत्मनिर्भरता: नीति पर सवाल
अशोक सिंह ने अपने X पोस्ट के हवाले से कहा कि जब घरेलू किसान पहले से संकट में हैं, तब अमेरिका से सस्ता सोयाबीन तेल आयात करना उनके हितों के खिलाफ है. उनका तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यदि कीमतें कम हैं और आयात बढ़ता है, तो घरेलू बाजार में मांग घटेगी और कीमतें और नीचे जा सकता हैं.
कृषि अर्थशास्त्र के जानकारों का मानना है कि आयात नीति का सीधा असर घरेलू कीमतों पर पड़ता है. यदि विदेशी उत्पाद सस्ते दाम पर उपलब्ध हों, तो प्रोसेसिंग उद्योग आयातित कच्चे माल की ओर झुक सकता है. इसका परिणाम यह होता है कि स्थानीय किसानों की उपज की मांग कम हो जाती है और मंडियों में भाव गिरने लगते हैं.
कांग्रेस का कहना है कि यह समझौता किसानों के साथ ,धोखा है और सरकार को अमेरिका से सोयाबीन आयात पर तुरंत रोक लगानी चाहिये.
MSP का सवाल: घोषणा से ज़मीन तक
MSP का उद्देश्य किसानों को न्यूनतम आय सुरक्षा देना है. लेकिन अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या सभी किसानों को MSP का लाभ वास्तव में मिल पाता है?
मध्य प्रदेश में सोयाबीन की सरकारी खरीद का दायरा सीमित होने और खरीद केंद्रों की संख्या कम होने की शिकायतें पहले भी सामने आती रही हैं. कई किसान मंडियों में निजी व्यापारियों को कम दाम पर फसल बेचने के लिए मजबूर हो जाता हैं, क्योंकि उन्हें तुरंत नकदी की जरूरत होती है.
यदि सरकार MSP घोषित करता है, तो यह भी जरूरी है कि खरीद की व्यवस्था मजबूत हो, भुगतान समय पर हो और बिचौलियों की भूमिका सीमित हो. अन्यथा MSP केवल आंकड़ा बनकर रह जाता है.
संभावित असर: किसान, उद्योग और उपभोक्ता
भारत में खाद्य तेल की मांग बड़ी है और देश आयात पर काफी निर्भर भी है. सरकार का तर्क अक्सर यह होता है कि आयात से उपभोक्ताओं को सस्ता तेल मिलता है और महंगाई नियंत्रित रहती है.
लेकिन दूसरी तरफ किसानों का सवाल है कि यदि उनकी फसल का उचित मूल्य नहीं मिलेगा, तो खेती करना ही घाटे का सौदा बन जाएगा. लंबे समय में यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को कमजोर कर सकता है.
इस मुद्दे पर संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती है,एक ओर उपभोक्ता हित, दूसरी ओर किसान हित. विपक्ष का आरोप है कि वर्तमान नीति में किसानों के हितों की अनदेखी हो रही है.
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राजनीतिक तापमान बढ़ा
भारत-अमेरिका डील को लेकर संसद से लेकर सोशल मीडिया तक बहस तेज हो गई है. कांग्रेस इसे किसानों के खिलाफ कदम बता रही है, जबकि सरकार की ओर से अभी विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है.
राज्यसभा में उठाए गए इस मुद्दे ने स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में कृषि नीति और आयात-निर्यात से जुड़े फैसले राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रहेंगे। विशेष रूप से मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां सोयाबीन लाखों परिवारों की आजीविका से जुड़ा है, यह मुद्दा चुनावी राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है.
निष्कर्ष: समाधान क्या हो?
इस पूरे विवाद के बीच सबसे अहम सवाल यही है कि किसानों को स्थायी राहत कैसे मिले. विशेषज्ञों के अनुसार,
MSP पर प्रभावी और व्यापक खरीद सुनिश्चित किया जाये .
आयात नीति तय करते समय घरेलू उत्पादन और बाजार स्थिति का आकलन किया जाये.
प्रोसेसिंग उद्योग को घरेलू सोयाबीन खरीदने के लिए प्रोत्साहन दिया जाये.
किसानों की लागत घटाने के लिए इनपुट सब्सिडी और तकनीकी सहायता बढ़ाई जाये.
भारत-अमेरिका डील पर अंतिम निर्णय चाहे जो हो, लेकिन यह स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश के सोयाबीन किसानों की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है . यदि आयात और घरेलू उत्पादन के बीच संतुलन नहीं साधा गया, तो इसका असर न केवल किसानों की आय पर, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र की स्थिरता पर भी पड़ेगा.

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