क्या चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ा रहा है सत्ता का राजनीति-केंद्रित मॉडल?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,30 नवंबर 2025— भारत अपने आपको विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहकर गर्व महसूस करता है, लेकिन जब इसी लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगें, जब चुनावी प्रक्रिया में तानाशाही के संकेत दिखने लगें, और जब सत्ता-प्राप्ति की जल्दबाज़ी इंसानी ज़िंदगियों पर भारी पड़ने लगे—तो सवाल पूछना हर नागरिक का कर्तव्य बन जाता है.
Rashtriya Janata Dal (@RJDforIndia) ने एक गंभीर मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है.उनके अनुसार भाजपा सत्ता पाने की हड़बड़ी में हर दिशा से दबाव बना रही है, और भारतीय चुनाव आयोग पर भी पक्षपात के आरोप लग रहे हैं. लेकिन इस बहस का सबसे दुखद पहलू उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में SIR के काम में लगे BLO सर्वेश सिंह की कथित आत्महत्या है, जिसने पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर गहरी चोट की है.
BLO की भूमिका: लोकतंत्र की रीढ़ लेकिन सबसे ज़्यादा दबाव में
BLO (Booth Level Officer) चुनावी व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है.
हर वोटर का नाम चेक करना
नए मतदाताओं का पंजीकरण
गलतियों को सुधारना
SIR जैसी परियोजनाओं में उच्च अधिकारियों के दबाव में त्वरित कार्य करना
ये सब जिम्मेदारियाँ BLOs के कंधों पर होती हैं.लेकिन जब इन्हीं को समय-सीमा, धमकियों, दबाव और असहनीय कार्यभार के बीच काम करना पड़े तो परिणाम कभी-कभी बेहद दुखद हो जाते हैं.
मुरादाबाद के BLO सर्वेश सिंह की मौत की खबर इसी दुखद सच्चाई की गवाही देती है.
क्या चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ा रहा है सत्ता का राजनीति-केंद्रित मॉडल?
RJD का आरोप बेहद गंभीर है. उनका कहना है कि भाजपा देशभर में किसी भी तरह सत्ता हथियाने की हड़बड़ी में है, और इसी लक्ष्य के लिए चुनाव आयोग तक पर “प्रकोष्ठ” की तरह नियंत्रण स्थापित कर लिया गया है.
यह आरोप सिर्फ एक राजनीतिक बयानभर नहीं है।
पिछले कुछ समय में,
BLOs पर असामान्य कार्यभार
निरंतर बढ़ती समय सीमाएँ
रात-रात भर का काम
उच्च अधिकारियों की सख्त फटकार
रिपोर्टिंग में ज़बरदस्त दबाव
ये सभी बातें लगातार सामने आती रही हैं.
जब लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए नियुक्त अधिकारी ही सुरक्षित न हों, तब लोकतंत्र की असली हालत समझना मुश्किल नहीं है.
मुरादाबाद घटना क्या बताती है?
सर्वेश सिंह की मौत सिर्फ एक प्रशासनिक घटना नहीं है.
यह उन सभी सवालों को सामने लाती है जिन्हें आमतौर पर दबा दिया जाता है.
क्या चुनाव आयोग स्वतंत्र रूप से काम कर रहा है?
क्या BLOs और चुनावी अधिकारी मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं?
क्या राजनीतिक दबाव चुनाव आयोग के फैसलों को प्रभावित कर रहा है?
क्या इंसानी ज़िंदगी की कीमत लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नज़रअंदाज़ हो चुकी है?
जब कोई सरकारी अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों के दबाव में जान गंवा दे, तो यह किसी लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता होती है.
लोकतंत्र पर दुनिया की नज़र: क्या भारत अपनी छवि खो रहा है?
RJD ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग व सत्ता की मिलीभगत विश्वभर में भारत की लोकतांत्रिक छवि को नुकसान पहुँचा रही है.
और यह चिंता बेबुनियाद नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को,
लोकतंत्र का मजबूत प्रतीक
पारदर्शी चुनावी प्रणाली
निष्पक्ष चुनाव आयोग
के रूप में देखा जाता रहा है.
लेकिन जब देश में BLOs की मौत जैसी घटनाएँ सामने आती हैं और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं, तो यह छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभावित होती है.
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क्या लोकतंत्र का प्रशासनिक ढांचा टूट रहा है?
भारतीय लोकतंत्र तीन स्तंभों पर खड़ा है.
सरकार, न्यायपालिका और चुनाव आयोग.
इनमें से कोई भी स्तंभ कमजोर हो जाए तो लोकतंत्र खतरे में पड़ सकता है.
आज की स्थिति चिंताजनक इसलिए है क्योंकि:
सत्ता की राजनीति चुनावी प्रक्रिया पर हावी दिख रही है
प्रशासनिक अधिकारी असहनीय दबाव झेल रहे हैं
चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर लगातार उंगलियाँ उठ रही हैं
मैदान में काम करने वाले कर्मचारी—जैसे BLOs—सबसे ज्यादा दबाव में हैं
सवाल यह है कि क्या यह वही लोकतंत्र है जिसकी रक्षा हमारे संविधान ने की थी?
आगे का रास्ता: क्या होना चाहिए?
BLOs के लिए सुरक्षित कार्य-परिस्थिति
तय समय सीमा
पर्याप्त स्टाफ
मानसिक स्वास्थ्य समर्थन
अत्यधिक कार्यभार पर नियंत्रण
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवालों का समाधान
पारदर्शिता और जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए आयोग को जवाबदेही के साथ स्वतंत्र रूप से काम करना ही होगा.
राजनीतिक दबाव की जांच और रोकथाम
किसी भी पार्टी को लोकतांत्रिक संस्थानों पर दबाव डालने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए.
BLO की मौत पर निष्पक्ष जांच
सर्वेश सिंह के मामले की जांच सिर्फ औपचारिकता न हो, बल्कि सच्चाई सामने लाना लोकतंत्र का कर्तव्य है.
निष्कर्ष: लोकतंत्र की रक्षा सिर्फ चुनाव से नहीं, संवेदनशीलता से होती है
मुरादाबाद के BLO की मौत हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र सिर्फ वोटिंग मशीनों, बूथों और आयोगों का नाम नहीं है. लोकतंत्र उन लोगों से चलता है जो इसके लिए दिन-रात मेहनत करते हैं.
यदि उसी व्यवस्था के लोगों की सुरक्षा, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी हो जाए—तो लोकतंत्र का भवन अंदर ही अंदर खोखला होने लगता है.
RJD द्वारा उठाया गया मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ राजनीति नहीं, मानवता और लोकतंत्र दोनों का प्रश्न है.
अब समय है कि देश इन सवालों को गंभीरता से ले—वरना आने वाली पीढ़ियाँ हम पर सवाल पूछेंगी कि हमने लोकतंत्र को बचाने के लिए क्या किया.

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