नेहरू का नाम क्यों आज भी भारतीय राजनीति की धुरी बना हुआ है?

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Ajit Kumar

भारत
नेहरू का नाम क्यों आज भी भारतीय राजनीति की धुरी बना हुआ है?

Supriya Shrinate के X पोस्ट के बहाने एक गहरी पड़ताल

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,8 दिसंबर 2025— भारतीय राजनीति में जवाहरलाल नेहरू का नाम एक ऐसा चुम्बक है, जो दशकों बाद भी विमर्श, विवाद और वैचारिक टकरावों का केंद्र बना हुआ है.समय बदला, सरकारें बदलीं, प्राथमिकताएँ बदलीं है ,परंतु नेहरू के इर्द-गिर्द राजनीति का घेरा आज भी उतना ही मजबूत है.कांग्रेस प्रवक्ता और सांसद सुप्रिया श्रीनेत ने अपने X (Twitter) पोस्ट में इसी तथ्य को बेहद तीखे लेकिन प्रभावशाली अंदाज़ में उठाया है. उनके तर्क, आलोचना और व्यंग्य ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि आखिर क्यों देश की सत्ताधारी राजनीति में नेहरू को लेकर इतना जुनून है?

सुप्रिया श्रीनेत का पोस्ट सिर्फ एक राजनैतिक टिप्पणी नहीं था; यह एक सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण भी था जहाँ नेहरू को हटाने पर पूरी कथा ढह जाती दिखाई देती है. उनका कहना है कि — अगर पंडित नेहरू ना होते तो आज नरेंद्र मोदी और भाजपा की राजनीति किस पर टिकी होती? यह सवाल सिर्फ सत्ता या विपक्ष पर कटाक्ष नहीं, बल्कि भारत की राजनीतिक संस्कृति की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है.

नेहरू: आलोचना का शाश्वत केंद्र क्यों?

भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाते हैं.उनके द्वारा स्थापित संस्थान, विश्वविद्यालय, पब्लिक सेक्टर कंपनियाँ, वैज्ञानिक ढाँचे और लोकतांत्रिक परंपराएँ आज भी भारत की रीढ़ हैं.और यही कारण है कि नेहरू का नाम राजनीतिक विमर्श से हट ही नहीं पाता है,चाहे आलोचना के रूप में हो या प्रशंसा के रूप में.

सुप्रिया श्रीनेत के शब्दों में, यदि नेहरू न होते तो वर्तमान सत्ताधारी राजनीति के पास समस्याओं का ठीकरा फोड़ने के लिए कोई ऐतिहासिक चेहरा ही नहीं बचता. यह टिप्पणी भले ही तीखी हो, लेकिन इसमें एक राजनीतिक यथार्थ छिपा है—आज भी कई नीतिगत विफलताओं, आर्थिक चूक, प्रशासनिक समस्याओं और सामाजिक संकटों को नेहरू युग से जोड़कर देखा जाता है.

क्या नेहरू राजनीतिक आवश्यकता बन चुके हैं?

पोस्ट में सुप्रिया श्रीनेत कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाती हैं,
यदि नेहरू न होते तो फेक नैरेटिव और व्हाट्सएप विश्वविद्यालय का कंटेंट किस पर चलता?
सरकार अपनी हर असफलता का दोष किस पर डालती?
निजीकरण के लिए बेचने को सरकारी कंपनियाँ कहाँ से आतीं?
विश्वविद्यालयों और संस्थानों में कब्ज़ा या हस्तक्षेप कैसे होता?

ये प्रश्न मूल रूप से भारतीय राजनीति में दोषारोपण की सुविधा पर प्रहार हैं. नेहरू आज एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रतीक हैं.जिसे सत्ता अपनी सुविधा के अनुसार इस्तेमाल करती है.

नेहरू को लेकर यह लगातार आलोचना कहीं न कहीं इस बात की पुष्टि भी करती है कि भारत की आधुनिक संरचना में उनकी भूमिका कितनी केंद्रीय रही है.जिन संस्थानों को आज सत्ता आलोचना का माध्यम बनाती है, उन्हीं संस्थानों पर वह सत्ता भी टिकी हुई है.

नेहरू: निर्माण का नाम, विवाद का चेहरा

विरोधी दलों का यह कहना कि नेहरू ने सिर्फ गलतियाँ कीं, न तो तथ्यात्मक रूप से सही है और न राजनीतिक रूप से ईमानदार.यह सच है कि हर ऐतिहासिक नेता की तरह नेहरू की भी कुछ नीतियाँ विवादित रही हैं—जैसे चीन नीति, कश्मीर नीति आदि.परंतु यह भी उतना ही सच है कि,

उन्होंने IIT, AIIMS, ISRO और DRDO के बीज बोए,

उन्होंने विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की मजबूत नींव रखी,

उन्होंने भारत में लोकतंत्र की बुनियाद को जड़ें दीं,

उन्होंने विज्ञान, तकनीक, वैज्ञानिक सोच और आधुनिकीकरण को दिशा दी,

उन्होंने आर्थिक ढांचे का मूल मॉडल गढ़ा, जिसमें पब्लिक सेक्टर मजबूत भूमिका निभाता था.

यदि नेहरू की ये उपलब्धियाँ न होतीं, तो आज भारत का ढांचा बिल्कुल अलग होता.कई बार नीतिगत बहसें इसलिए संभव हैं क्योंकि उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं को जीवित रखा है.

63 साल बाद भी उनका प्रभाव क्यों?

सुप्रिया श्रीनेत इस बात पर जोर देती हैं कि नेहरू अपनी मृत्यु के 63 साल बाद भी नरेंद्र मोदी और उनकी जमात पर इतने भारी हैं कि उनका नाम लिए बिना वे दो लाइन नहीं बोलते.यह टिप्पणी सिर्फ व्यंग्य नहीं, बल्कि राजनीतिक मनोविज्ञान का सटीक चित्रण है.

भारत की राजनीति में नेहरू एक ऐतिहासिक छाया की तरह मौजूद हैं,
विकास मॉडल पर बहस हो,
लोकतंत्र पर सवाल हो,
शिक्षा और संस्थानों की बात हो,
इतिहास पर राजनीति हो,
हर जगह नेहरू अनिवार्य रूप से मौजूद हैं.

यह प्रभाव किसी एक दल के कारण नहीं, बल्कि इसलिए है क्योंकि आधुनिक भारत की निर्मिति में उनकी भूमिका इतनी गहरी है कि उसे मिटाना असंभव है.

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नेहरू पर हमला क्यों लोकप्रिय रणनीति है?

राजनीतिक ध्रुवीकरण बनाने में आसान
नेहरू का नाम लेते ही समर्थक और विरोधी दोनों मोर्चे तैयार हो जाते हैं.इससे राजनीतिक विमर्श तुरंत गर्म हो जाता है.

ऐतिहासिक शख्सियत जवाब नहीं दे सकती
नेहरू आज ज़िंदा नहीं हैं; उन पर आरोप लगाना आसान है.

गलतियों का ठीकरा इतिहास पर फोड़ना सुविधाजनक
वर्तमान की असफलताओं को बीते समय से जोड़ देना एक राजनीतिक रणनीति बन चुकी है.

नैरेटिव बिल्डिंग की आधारशिला
नेहरू की आलोचना करने से एक वैकल्पिक राष्ट्रवाद की कथा गढ़ना आसान होता है.

नेहरू: एक जवाहर जिसे मिटा नहीं पाएगी राजनीति

सुप्रिया श्रीनेत ने अपने पोस्ट के अंत में लिखा है कि,ऐसे ही थोड़े ही बापू उन्हें हिंद का जवाहर कहते थे! यह वाक्य सिर्फ प्रशंसा नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सच को पुनः स्मरण कराता है.

गांधी ने नेहरू को सिर्फ इसलिए जवाहर नहीं कहा कि वे उनके प्रिय थे, बल्कि इसलिए क्योंकि वे भारत के लिए बहुमूल्य थे.उनकी दूरदर्शिता, आधुनिक सोच, वैश्विक दृष्टिकोण और लोकतंत्र में अटूट आस्था उन्हें ऐसे नेताओं की श्रेणी में खड़ा करती है जो सिर्फ अपने समय के नहीं होते, सदी के होते हैं.

निष्कर्ष: नेहरू नहीं, राजनीति की आत्मा पर बहस करें

सुप्रिया श्रीनेत का पोस्ट सिर्फ तंज नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है.नेहरू को कोसना आसान है, परंतु भारत का भविष्य बनाने के लिए वर्तमान में नेतृत्व की जवाबदेही अधिक महत्वपूर्ण है. इतिहास पर आरोप लगाने से समस्याएँ हल नहीं होंगी; समाधान भविष्य की नीतियों और वर्तमान की पारदर्शिता में है.

नेहरू का नाम जितना भी इस्तेमाल किया जाए.सकारात्मक या नकारात्मक,इतिहास उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता ही लिखेगा.और शायद यही कारण है कि 63 साल बाद भी उनकी प्रासंगिकता राजनीति में इतनी गहरी बनी हुई है.

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