भारत में “गोदी मीडिया” की छवि से जूझ रहे मीडिया संस्थानों के लिए यह घटना एक आईना है ?
तीसरा पक्ष डेस्क,पटना: नेपाल में GEN – Z आंदोलन के दौरान सरकार समर्थित मीडिया पर हुए हमले ने न केवल वहां के लोकतांत्रिक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया है, बल्कि यह भारत जैसे पड़ोसी देशों के लिए भी एक सख्त चेतावनी है. आंदोलन के दौरान काठमांडू पोस्ट और कांतिपुर दैनिक जैसे नेपाल में प्रतिष्ठित मीडिया हाउस और पत्रकारों पर हुए हमले आँखें खोलने के लिए काफी है. यह घटना एक बार फिर यह सवाल उठाती है कि क्या मीडिया वास्तव में जनता की आवाज़ है, या वह सत्ता के इशारों पर नाचने वाली कठपुतली बन चुका है?
भारत में भी “गोदी मीडिया” की छवि से जूझ रहे मीडिया संस्थानों के लिए यह घटना एक आईना है, जो यह बताती है कि सत्ता के साथ अंधी गठजोड़ की कीमत कितनी भारी हो सकती है.
नेपाल का चौथा स्तंभ: एक लोकतांत्रिक संकट

नेपाल में सरकार समर्थित मीडिया हाउसों पर हुए हमले ने यह साफ कर दिया है कि जनता का भरोसा टूटने की स्थिति में गुस्सा सड़कों से लेकर मीडिया के दफ्तरों तक पहुंच सकता है. यह हमला केवल हिंसा का मामला नहीं है, बल्कि यह जनता के उस असंतोष का प्रतीक है, जो तब उभरता है जब मीडिया अपनी निष्पक्षता और विश्वसनीयता खो देता है. नेपाल में यह धारणा बढ़ रही थी कि कुछ मीडिया संस्थान सरकार के प्रचार तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं. ऐसे में, जनता का गुस्सा उन पर उतरा, जो उनकी नजर में सत्ता के हितों को जनता के हितों से ऊपर रख रहे थे.
भारतीय मीडिया के लिए सबक
भारत में “गोदी मीडिया” का तमगा कुछ मीडिया संस्थानों पर चस्पा हो चुका है. यह शब्द उन मीडिया हाउसों के लिए इस्तेमाल होता है, जो सत्ता के पक्ष में खबरें परोसते हुए नजर आते हैं, चाहे वह सरकार की नीतियों का महिमामंडन हो या विपक्ष की आलोचना. नेपाल की घटना भारतीय मीडिया के लिए एक चेतावनी है कि जनता की नाराज़गी का सामना करने की स्थिति में कोई भी संस्थान अछूता नहीं रहेगा.
भारतीय मीडिया को यह समझना होगा कि उसका प्राथमिक दायित्व सत्ता का प्रहरी बनना नहीं, बल्कि जनता की आवाज़ को बुलंद करना है. जब मीडिया सत्ता के साथ गठजोड़ करता है, तो वह अपनी विश्वसनीयता खो देता है. और जब जनता का भरोसा टूटता है, तो उसका गुस्सा न केवल सड़कों पर, बल्कि उन दरवाज़ों पर भी दस्तक देता है, जो कभी जनता की आवाज़ होने का दावा करते थे.
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मीडिया की भूमिका: प्रहरी या प्रचारक?

मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. इसका काम सत्ता को जवाबदेह बनाना, सच को सामने लाना और जनता के हितों की रक्षा करना है. लेकिन जब मीडिया सत्ता के प्रचार तंत्र का हिस्सा बन जाता है, तो वह अपनी मूल भूमिका से भटक जाता है. भारत में कुछ मीडिया हाउसों पर यह आरोप लगता रहा है कि वे सरकार की नीतियों को बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के बढ़ावा देते हैं. इससे न केवल पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं, बल्कि जनता का गुस्सा भी बढ़ता है.
आगे का रास्ता
भारतीय मीडिया के लिए यह समय आत्ममंथन का है. उसे यह समझना और अपने आप से पूछना होगा कि क्या वह जनता की आवाज़ बन रहा है, या सत्ता का मुखपत्र?
निम्नलिखित कुछ कदम भारतीय मीडिया को अपनी विश्वसनीयता वापस हासिल करने में मदद कर सकते हैं:
- निष्पक्षता को प्राथमिकता दें: खबरों को तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत करें, न कि किसी पक्ष के प्रति झुकाव के साथ.
- आलोचनात्मक पत्रकारिता को बढ़ावा दें: सत्ता की नीतियों की तारीफ और आलोचना दोनों को संतुलित तरीके से पेश करें.
- जनता के मुद्दों पर फोकस करें: बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दें, न कि केवल सत्ता के एजेंडे को.
- पारदर्शिता बनाए रखें: अपने फंडिंग स्रोतों और संपादकीय नीतियों के बारे में खुलकर बात करें.
- सुरक्षा सुनिश्चित करें: पत्रकारों की सुरक्षा और स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए नीतियां बनाएं.
निष्कर्ष
नेपाल में मीडिया पर हुआ हमला एक चेतावनी है कि जब मीडिया अपनी निष्पक्षता खो देता है, तो वह जनता का भरोसा भी खो देता है. भारत में “गोदी मीडिया” की छवि से जूझ रहे मीडिया हाउसों के लिए यह समय है कि वे अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करें. पत्रकारिता का रास्ता आसान नहीं है, लेकिन यह रास्ता सच, निष्पक्षता और जनता के प्रति जवाबदेही से होकर गुजरता है. अगर भारतीय मीडिया को जनता का प्रहरी बनना है, तो उसे सत्ता के प्रलोभनों से ऊपर उठकर अपनी मूल जिम्मेदारी को अपनाना होगा. क्योंकि जब जनता का गुस्सा उबरेगा, तो वह न केवल सड़कों पर, बल्कि मीडिया के दरवाज़ों पर भी दस्तक देगा.

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