न्याय यात्रा का पटना आगमन: महिला सुरक्षा और न्याय के सवाल पर बड़ा जनआंदोलन
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,8 फरवरी — बिहार में महिलाओं और छात्राओं के खिलाफ बढ़ते यौन अपराध, बलात्कार की घटनाएं और प्रशासनिक उदासीनता लगातार गंभीर चिंता का विषय बना हुआ हैं. इन्हीं सवालों को लेकर ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेंस एसोसिएशन (ऐपवा) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) के नेतृत्व में निकाली गई बेटी बचाओ–न्याय यात्रा अब अपने निर्णायक चरण में पहुंच चुका है. यह न्याय यात्रा 9 फरवरी को पटना पहुंचेगी और इसके समापन के अवसर पर 10 फरवरी 2026 को गांधी मैदान के गेट नंबर 10 से विधानसभा तक जोरदार मार्च का आयोजन किया जाएगा.
यह मार्च केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और न्याय के लिए उठ रही एक सशक्त सामूहिक आवाज़ के रूप में देखा जा रहा है.
जहानाबाद से पटना तक: न्याय की लंबी पदयात्रा
बेटी बचाओ–न्याय यात्रा की शुरुआत जहानाबाद के पतियावां से हुई थी.यात्रा का उद्देश्य महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों, बलात्कार मामलों में प्रशासनिक लीपापोती और पीड़ित परिवारों को न्याय से वंचित किए जाने के खिलाफ जनचेतना को संगठित करना रहा है.
यात्रा के दौरान यह अभियान जहानाबाद, नालंदा, नवादा, गया, अरवल और पटना ग्रामीण के कई इलाकों से होकर गुज़रा. इस क्रम में 100 से अधिक नुक्कड़ सभाओं का आयोजन किया गया, जिनमें महिलाओं, छात्राओं, युवाओं और आम नागरिकों ने बड़ी संख्या में भाग लिया.नुक्कड़ सभाओं में पीड़ित परिवारों की पीड़ा, उनकी न्याय की मांग और सरकार की भूमिका पर खुलकर चर्चा हुई.
पीड़ित परिवारों से संवाद और सच्चाई का सामना
न्याय यात्रा के दौरान कई बलात्कार पीड़िताओं के परिजनों से प्रत्यक्ष मुलाकात किया गया. इन मुलाकातों में यह बात सामने आई है कि किस तरह पीड़ित परिवारों को न्याय पाने के लिए थाने, प्रशासन और अदालतों के चक्कर काटना पड़ता हैं, जबकि आरोपी प्रभावशाली होने के कारण बचते नजर आता हैं.
यात्रा के क्रम में औरंगाबाद की नीट छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के मामले का भी जायजा लिया गया. पीड़ित परिजनों से मुलाकात कर निष्पक्ष जांच, सच्चाई सामने लाने और दोषियों को कड़ी सजा देने की मांग की गई. इन घटनाओं ने यह स्पष्ट किया कि महिला सुरक्षा के सरकारी दावे जमीनी हकीकत से कितने दूर हैं.
सरकार पर गंभीर आरोप
ऐपवा के महासचिव मीना तिवारी ने कहा कि बेटी बचाओ–न्याय यात्रा के दौरान यह सच्चाई उजागर हुई है कि भाजपा–जदयू सरकार महिलाओं और छात्राओं के सवाल पर पूरी तरह असंवेदनशील और विफल साबित हुई है. उन्होंने आरोप लगाया कि बलात्कार और महिला उत्पीड़न के मामलों में सरकार और प्रशासन की प्राथमिकता पीड़ितों को न्याय दिलाना नहीं, बल्कि आरोपियों को बचाना बन गई है.
उनका कहना है कि पीड़ित परिवारों को न्याय के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है, जबकि सरकार महिला सुरक्षा के नाम पर केवल खोखले दावे कर रही है. इसी जनआक्रोश की तीव्र अभिव्यक्ति 10 फरवरी के विधानसभा मार्च में देखने को मिलेगी.
विधानसभा मार्च: सिर्फ कार्यक्रम नहीं, एक संघर्ष
मीना तिवारी ने स्पष्ट किया कि यह विधानसभा मार्च केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि बिहार की बेटियों के सम्मान, सुरक्षा और न्याय के लिए उठने वाली सामूहिक आवाज़ है.उन्होंने कहा कि सरकार को महिला सुरक्षा के ठोस उपाय, त्वरित न्याय प्रक्रिया और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी ही होगी.
यह मार्च राज्य सरकार के लिए एक चेतावनी भी है कि यदि महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो जनआंदोलन और तेज़ होगा.
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आंदोलन में शामिल प्रमुख चेहरे
इस न्याय यात्रा में ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी के साथ संगीता सिंह, रीता वर्णवाल, लीला वर्मा, वंदना प्रभा, अंजुषा शामिल हैं.वहीं आइसा की ओर से राज्य अध्यक्ष प्रीति कुमारी, प्रिया, अनु और दीपंकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं. इन सभी ने विभिन्न जिलों में जनसभाओं के माध्यम से लोगों को इस आंदोलन से जोड़ने का काम किया है.
पटना की जनता से अपील
ऐपवा और आइसा ने पटना की जनता, महिलाओं, छात्राओं और तमाम जनतांत्रिक संगठनों से अपील किया है कि वे 10 फरवरी 2026 को विधानसभा मार्च में बड़ी संख्या में शामिल हों और न्याय की इस लड़ाई को मजबूती दें.उनका कहना है कि जब तक समाज संगठित होकर आवाज़ नहीं उठाएगा, तब तक महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर रोक लगाना मुश्किल होगा.
निष्कर्ष
बेटी बचाओ–न्याय यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि बिहार में महिला सुरक्षा केवल कानून और घोषणाओं से नहीं, बल्कि जनदबाव और संगठित संघर्ष से सुनिश्चित हो सकती है. 10 फरवरी को होने वाला विधानसभा मार्च इस संघर्ष का महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो सरकार को जवाबदेह बनाने और महिलाओं को न्याय दिलाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है.

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