सरकार, अदालत और पुलिस किसके साथ?

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Ajit Kumar

भारत
सरकार, अदालत और पुलिस किसके साथ? OBC/SC/ST पर दमन को लेकर तीखे सवाल

OBC/SC/ST आंदोलनों पर दमन और सवर्ण विरोध पर संवेदनशीलता का सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,31 जनवरी — देश में सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गया है. Dr. Kanchana Yadav, सामाजिक न्याय से जुड़ी मुद्दों पर मुखर आवाज़ माना जाता हैं, उन्होंने अपने X (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सत्ता संरचना पर गंभीर सवाल खड़ा किया है.उनका कहना है कि जब सवर्ण वर्ग के लोग विरोध प्रदर्शन करता हैं, तो उन्हें शांतिपूर्वक प्रदर्शन की अनुमति दिया जाता है. लेकिन जब वही अधिकार OBC/SC/ST और अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा प्रयोग किए जाता हैं, तो पुलिसिया दमन देखने को मिलता है.

यह बयान ऐसे समय में आया है, जब UGC से जुड़े हालिया घटनाक्रम और अदालतों की भूमिका को लेकर देशभर में चर्चाएं तेज़ हैं.

सवर्ण विरोध बनाम बहुजन आंदोलन: दोहरा मापदंड?

Dr. Kanchana Yadav ने अपने पोस्ट में साफ़ शब्दों में लिखा है कि BJP समर्थक सवर्णों के विरोध प्रदर्शनों को सरकार और प्रशासन ने बिना किसी बाधा के होने दिया. इसके विपरीत, जब OBC, SC, ST समुदायों ने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई, तो पुलिस बल का इस्तेमाल कर उन्हें दबाने की कोशिश की गई.

यह सवाल केवल कानून-व्यवस्था का नहीं है, बल्कि संवैधानिक समानता का भी है.क्या विरोध प्रदर्शन का अधिकार जाति देखकर तय किया जा रहा है? क्या लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकार उनके सामाजिक वर्ग पर निर्भर होने लगा हैं?

UGC पर अदालत का फैसला और राजनीतिक संकेत

UGC से जुड़े हालिया फैसले को लेकर भी Dr. Kanchana Yadav ने तीखा सवाल उठाया है.उनका दावा है कि अदालतों के फैसलों के पीछे भी वही सत्ता संरचना काम कर रहा है, जो सरकार और प्रशासन को नियंत्रित कर रहा है.

उनके शब्दों में,सरकार भी उनकी, अदालत भी उनकी, पुलिस भी उनकी , तो OBC/SC/ST और अल्पसंख्यकों का क्या?

यह कथन देश की संस्थागत निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है. अगर न्यायपालिका, कार्यपालिका और पुलिस,तीनों पर किसी एक वर्ग या विचारधारा का प्रभाव माना जाने लगा , तो लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा खतरा पैदा होता है.

बहुजन समाज में बढ़ता असंतोष

OBC, SC, ST और अल्पसंख्यक समुदायों के बीच यह भावना लगातार मजबूत हो रहा है कि उनकी आवाज़ को न सिर्फ अनसुना किया जा रहा है, बल्कि जब वे सड़कों पर उतरता हैं तो उन्हें दमन का सामना करना पड़ता है.

पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे उदाहरण सामने आया हैं, जहाँ बहुजन आंदोलनों पर लाठीचार्ज, गिरफ्तारी और मुकदमों का सहारा लिया गया, जबकि प्रभावशाली वर्गों के आंदोलनों को लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति कहकर देखा गया.

यह असंतोष केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक भी है.

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लोकतंत्र बनाम सत्ता केंद्रीकरण

Dr. Kanchana Yadav का बयान इस बड़े सवाल को सामने लाता है कि क्या भारत का लोकतंत्र धीरे-धीरे सत्ता के केंद्रीकरण की ओर बढ़ रहा है? जब सरकार, पुलिस और अदालतों को लेकर एक ही तरह का आरोप सामने आता है, तो यह चिंता स्वाभाविक है.

लोकतंत्र की बुनियाद समान अधिकार, समान न्याय और समान अवसर पर टिकी होती है. यदि किसी समुदाय को बार-बार यह महसूस कराया जाए कि उसकी आवाज़ का मूल्य कम है, तो सामाजिक विभाजन और गहराता है.

राजनीतिक प्रतिक्रिया और चुप्पी

अब तक इस बयान पर BJP या सरकार की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. लेकिन सोशल मीडिया पर यह पोस्ट तेजी से वायरल हो रहा है और बहुजन समाज से जुड़े कई लोग इसे अपनी आवाज़ बता रहे हैं.

विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू कर दी है, जिससे आने वाले दिनों में यह मामला और राजनीतिक तूल पकड़ सकता है.

निष्कर्ष: सवाल जो अनसुने नहीं रह सकते

Dr. Kanchana Yadav का यह बयान केवल एक ट्वीट नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक चेतावनी है.यह सवाल करता है कि देश के हाशिए पर खड़े समुदायों के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा, अगर सत्ता की सभी संस्थाएँ एक ही दिशा में झुकी हुई नज़र आएँ.

आज जरूरत है कि विरोध के अधिकार को जाति और वर्ग से ऊपर उठकर देखा जाए, और लोकतंत्र को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी समान बनाया जाएं .

स्रोत:X (Twitter) पोस्ट — Dr. Kanchana Yadav (@Kanchanyadav000)

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