का. दीपंकर बोले – किसान आंदोलन की तरह होगा संघर्ष
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 12 फरवरी — केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के आह्वान पर आयोजित देशव्यापी आम हड़ताल के समर्थन में आज पटना के सड़कों पर मजदूर, किसान, छात्र और नौजवान बड़ी संख्या में उतरे है. इस दौरान भाकपा (माले) के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य भी स्वयं प्रदर्शन में शामिल हुए और डाकबंगला चौराहे पर आयोजित सभा को संबोधित किया. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिस तरह किसानों के ऐतिहासिक आंदोलन ने तीन कृषि कानूनों को वापस लेने के लिए केंद्र सरकार को मजबूर किया था, उसी तरह मजदूरों के संयुक्त संघर्ष से चारों श्रम संहिताएं (लेबर कोड) भी वापस कराया जायेगा.
देशव्यापी हड़ताल को व्यापक समर्थन
यह हड़ताल ऐक्टू सहित केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त आह्वान पर आयोजित किया गया था.पटना में इसका व्यापक असर देखने को मिला ह्यै. बुद्ध स्मृति पार्क से निकला जुलूस शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए डाकबंगला चौराहे पर सभा में परिवर्तित हुआ.प्रदर्शन में सैकड़ों की संख्या में मजदूरों, किसानों, छात्र-नौजवानों और विभिन्न स्कीम वर्कर्स ने भाग लिया है.
का. दीपंकर ने अपने संबोधन में कहा कि मजदूरों की यह एकजुटता सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बढ़ते असंतोष का प्रतीक है. उन्होंने कहा कि आज देश का मेहनतकश वर्ग अपने अधिकारों की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर है.
4 श्रम कोड पर सरकार को घेरा
सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा लाया गया चार श्रम कोडों को मजदूर-विरोधी बताया है . उनके अनुसार ये श्रम कोड श्रमिकों के मौजूदा अधिकारों को कमजोर करता हैं और कॉरपोरेट हितों को प्राथमिकता देता हैं.
उन्होंने कहा कि , यह कानून मजदूरों को संगठित होने और सामूहिक रूप से अपने अधिकारों की मांग करने की क्षमता को कमजोर करता हैं. सरकार पूंजीपतियों को अधिक छूट देना चाहती है, जबकि मजदूरों की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा के प्रावधानों को सीमित किया जा रहा है.
उन्होंने दोहराया कि जैसे किसान आंदोलन ने तीन कृषि कानूनों को निरस्त कराया, वैसे ही संगठित और व्यापक मजदूर आंदोलन चारों श्रम कोडों को वापस लेने के लिए सरकार को बाध्य करेगा.
मनरेगा और ग्रामीण रोजगार का मुद्दा
का. दीपंकर ने अपने भाषण में मनरेगा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया. उन्होंने कहा कि मनरेगा कानून का मूल उद्देश्य ग्रामीण गरीबों और खेत मजदूरों को रोजगार की गारंटी देना था.लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में न तो पर्याप्त कार्य दिवस उपलब्ध कराया जा रहा हैं और न ही मजदूरी दर संतोषजनक है.
मजदूर संगठनों ने मांग किया है कि मनरेगा के तहत कम से कम 200 दिनों का रोजगार सुनिश्चित किया जाए और न्यूनतम 600 रुपये प्रतिदिन मजदूरी तय किया जाये. उन्होंने आरोप लगाया है कि सरकार की वर्तमान नीतियां ग्रामीण बेरोजगारी को और बढ़ावा दे रहा हैं, जिससे गांवों की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रहा है.
कृषि और विदेशी दबावों का सवाल
सभा में कृषि क्षेत्र से जुड़े मुद्दों पर भी सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया है.उन्होंने आरोप लगाया है कि देश की खेती-किसानी को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी दबावों के लिए खोला जा रहा है.
उनके अनुसार कृषि क्षेत्र में बाहरी हस्तक्षेप देश के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी आज भी खेती पर निर्भर है, ऐसे में कृषि नीति में किसी भी प्रकार का असंतुलन सीधे करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करेगा.
नई शिक्षा नीति पर सवाल
का. दीपंकर ने नई शिक्षा नीति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है. उन्होंने आरोप लगाया है कि इससे शिक्षा महंगी होगी और गरीब व मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुंच कठिन हो जाएगी.
उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा प्रणाली में वैचारिक हस्तक्षेप और संघीय ढांचे को कमजोर करने के प्रयास देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ हैं.
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जुलूस और संयुक्त नेतृत्व
इस मार्च का नेतृत्व ऐक्टू के आर.एन. ठाकुर, स्कीम वर्कर्स की नेता शशि यादव, खेग्रामस के धीरेन्द्र झा, किसान महासभा के उमेश सिंह, रसोइया संघ की सरोज चौबे, आपदा मित्र के रौशन कुमार, ऐक्टू के रणविजय कुमार, टेंपो चालक नेता मुर्तजा अली और जितेन्द्र कुमार सहित कई नेताओं ने किया.
पार्टी के राज्य सचिव कुणाल, अमर, मीना तिवारी, के.डी. यादव, संतोष शहर, शिवसागर शर्मा, कमलेश शर्मा, शहजादे आलम, पूर्व विधायक महबूब आलम, मनोज मंजिल, राजेंद्र पटेल, संजय कुमार, पुनीत पाठक, विनय कुमार और प्रमोद यादव सहित बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और समर्थक भी उपस्थित रहे.
सभा को सरोज चौबे, रौशन कुमार और शिवसागर शर्मा सहित अन्य नेताओं ने भी संबोधित किया.
ऑटो चालक संघ की भागीदारी
मुख्य कार्यक्रम से पहले सुबह 9 बजे ऑटो चालक संघ के नेतृत्व में स्टेशन रोड से एक जुलूस निकाला गया. यह जुलूस शहर के विभिन्न इलाकों से गुजरते हुए डाकबंगला चौराहे पर मुख्य कार्यक्रम में शामिल हुआ. इससे हड़ताल को और व्यापक समर्थन मिला.
निष्कर्ष: संघर्ष की नई शुरुआत?
पटना में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक दिन का विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि मजदूर वर्ग की एक व्यापक राजनीतिक और सामाजिक चेतना का संकेत माना जा रहा है. मजदूर संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे श्रम अधिकारों, ग्रामीण रोजगार, कृषि नीति और शिक्षा जैसे मुद्दों पर संघर्ष को जारी रखेंगे.
अब देखना यह होगा कि सरकार इन मांगों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है.फिलहाल इतना तय है कि मजदूर, किसान, छात्र और नौजवानों की एकजुटता ने राजधानी पटना में एक मजबूत संदेश दिया है,अधिकारों की लड़ाई जारी रहेगी.

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