शांतिपूर्ण विरोध पर FIR, न्याय की मांग को बताया लोकतांत्रिक अधिकार
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 15 फरवरी:फुलवारीशरीफ में छात्रा की निर्मम हत्या के मामले ने बिहार की राजनीति और समाज को गहराई से झकझोर कर रख दिया है.इस जघन्य घटना के खिलाफ न्याय की मांग को लेकर चल रहे जनआंदोलन पर अब मुकदमा दर्ज होने से विवाद और तेज हो गया है.भाकपा (माले) ने इस कार्रवाई को दमनकारी करार देते हुए सरकार और प्रशासन पर गंभीर सवाल खड़ा किया हैं. पार्टी के राज्य सचिव कुणाल ने पूर्व विधायक गोपाल रविदास सहित 65 लोगों पर दर्ज मुकदमे की कड़ी निंदा किया है और इसे लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया है.
घटना जिसने पूरे समाज को झकझोर दिया
फुलवारीशरीफ में कोचिंग पढ़ने वाली छात्रा के साथ हुई दरिंदगी और निर्मम हत्या की घटना ने पूरे राज्य में आक्रोश पैदा कर दिया है.यह मामला केवल एक आपराधिक घटना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़ा करता है. स्थानीय लोगों, छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर दोषियों की गिरफ्तारी और न्यायिक जांच की मांग किया है.
जनता का कहना है कि जब समाज की बेटियों की सुरक्षा पर हमला होता है, तब विरोध करना स्वाभाविक है. ऐसे में आंदोलनकारियों पर मुकदमा दर्ज करना लोगों के गुस्से को और भड़काने वाला कदम माना जा रहा है.
CPI(ML) का आरोप: सरकार आंदोलन को दबाना चाहती है
भाकपा (माले) के राज्य सचिव कुणाल ने अपने बयान में कहा कि शांतिपूर्ण ढंग से न्याय की मांग उठा रहे लोगों पर एफआईआर करना सरकार की दमनकारी मानसिकता को दर्शाता है.उनका कहना है कि असली अपराधियों पर कड़ी कार्रवाई करने के बजाय सरकार और प्रशासन जनआंदोलन को ही दबाने की कोशिश कर रहा हैं.
उन्होंने कहा है कि यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज की संवेदना से जुड़ा मामला है.जब जनता न्याय की मांग कर रहा है, तब उसे अपराध की तरह पेश करना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है.
लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला?
कुणाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जनप्रतिरोध के लोकतांत्रिक तरीकों को अपराध की तरह पेश करना संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों का उल्लंघन है.उनका आरोप है कि सरकार विरोध की आवाज को दबाकर अपनी जिम्मेदारियों से बचना चाहता है.
उनके मुताबिक, अगर जनता न्याय की मांग को लेकर सड़कों पर उतरता है तो यह लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होता है, न कि कानून-व्यवस्था के लिए खतरा है .इसलिए पूर्व विधायक गोपाल रविदास सहित 65 लोगों पर दर्ज मुकदमा अविलंब वापस लिया जाना चाहिए.
न्यायिक जांच और गिरफ्तारी की मांग
भाकपा (माले) ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय न्यायिक जांच कराने की मांग किया है. पार्टी का कहना है कि निष्पक्ष जांच के बिना पीड़ित परिवार को न्याय मिलना मुश्किल होगा. साथ ही दोषियों की जल्द गिरफ्तारी और कड़ी सजा सुनिश्चित करने की मांग भी दोहराई गई है.
पार्टी ने यह भी कहा है कि पीड़ित परिवार को समुचित मुआवजा, सुरक्षा और सरकारी सहायता दिया जाना चाहिये, ताकि उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में कोई बाधा न हो. समाज के कमजोर वर्गों के साथ होने वाले अपराधों में प्रशासन की संवेदनशीलता बेहद जरूरी है.
आंदोलन को व्यापक करने की चेतावनी
भाकपा (माले) ने साफ कहा है कि यदि सरकार दमन का रास्ता नहीं छोड़ता है, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा. पार्टी का मानना है कि न्याय के लिए उठी आवाज को दबाया नहीं जा सकता और जनता के समर्थन से यह आंदोलन और मजबूत होगा.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में बड़ा विवाद बन सकता है. क्योंकि यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और महिला सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है.
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समाज में बढ़ता आक्रोश और न्याय की उम्मीद
इस घटना के बाद पूरे क्षेत्र में गुस्सा और दुख का माहौल है.छात्र संगठनों, महिला समूहों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर न्याय की मांग किया है. लोगों का कहना है कि अगर ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो समाज में अपराधियों का मनोबल बढ़ेगा.
जनता की सबसे बड़ी मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों को जल्द गिरफ्तार कर सख्त सजा दी जाए और आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएं. इससे ही लोगों का कानून और लोकतंत्र पर विश्वास कायम रह सकेगा.
निष्कर्ष: न्याय बनाम दमन की लड़ाई
फुलवारीशरीफ छात्रा हत्याकांड अब केवल एक अपराध की घटना नहीं, बल्कि न्याय बनाम दमन की लड़ाई का रूप लेता जा रहा है. एक तरफ पीड़ित परिवार और जनता न्याय की मांग कर रही है, तो दूसरी तरफ आंदोलनकारियों पर मुकदमा दर्ज होने से राजनीतिक और सामाजिक विवाद गहराता जा रहा है.
ऐसे समय में सबसे जरूरी है कि प्रशासन निष्पक्षता दिखाए, दोषियों पर त्वरित कार्रवाई करे और लोकतांत्रिक विरोध को सम्मान दे.न्याय में देरी या आंदोलन को दबाने की कोशिश न केवल समाज में असंतोष बढ़ाएगी, बल्कि शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करेगी.
यदि सरकार संवेदनशीलता और न्यायिक पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ती है, तो यह पीड़ित परिवार को राहत देने के साथ-साथ समाज में विश्वास बहाल करने का काम करेगा.लेकिन यदि दमन का रास्ता जारी रहा, तो यह आंदोलन आने वाले समय में और व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है.

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