प्राइवेट यूनिवर्सिटी में आरक्षण की कमी: रिसर्च और समानता पर बड़ा सवाल

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Ajit Kumar

भारत
प्राइवेट यूनिवर्सिटी में आरक्षण पर उठे सवाल और शिक्षा में समान अवसर की चर्चा

प्राइवेट यूनिवर्सिटी में आरक्षण और रिसर्च पर बहस तेज

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना 18 फ़रवरी: सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने वाली कार्यकर्ता Priyanka Bharti ने अपने X (Twitter) पोस्ट में एक अहम प्रश्न उठाया है, देश की प्राइवेट यूनिवर्सिटियों में आरक्षण लागू न होने से क्या शिक्षा और रिसर्च की गुणवत्ता प्रभावित हो रहा है? उनका तर्क है कि जब समाज के सभी वर्गों के छात्र समान रूप से उच्च शिक्षा में शामिल नहीं होंगे, तो न केवल रिसर्च का दायरा सीमित होगा बल्कि देश के समग्र विकास की गति भी धीमा पड़ सकता है. यह मुद्दा आज के भारत में उच्च शिक्षा, सामाजिक न्याय और वैज्ञानिक सोच से सीधे जुड़ा हुआ है.

प्राइवेट यूनिवर्सिटी और आरक्षण: एक असमान ढांचा

भारत में सरकारी विश्वविद्यालयों और केंद्रीय संस्थानों में आरक्षण व्यवस्था संविधानिक प्रावधानों के तहत लागू है, जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों को अवसर प्रदान करना है. लेकिन अधिकांश निजी विश्वविद्यालय इस व्यवस्था से बाहर हैं. उदाहरण के तौर पर Galgotias University और Amity University जैसे बड़े संस्थानों में प्रवेश का आधार मुख्यतः मेरिट और आर्थिक क्षमता होता है, जिससे समाज के कमजोर वर्गों के लिए उच्च शिक्षा तक पहुँच कठिन हो जाता है.

इस असमान ढांचे का परिणाम यह होता है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक विविधता कम हो जाता है.जब कक्षा, लैब और रिसर्च टीमों में विविध पृष्ठभूमि के छात्र नहीं होंगे, तो शोध का दृष्टिकोण भी सीमित रह जाएगा,विविधता किसी भी अकादमिक वातावरण की सबसे बड़ी ताकत होती है, क्योंकि अलग-अलग अनुभव और सोच नई खोजों को जन्म देता हैं.

रिसर्च ग्रोथ पर पड़ता असर

रिसर्च का मूल आधार केवल संसाधन नहीं, बल्कि विचारों की विविधता है. जब शिक्षा में केवल कुछ ही वर्गों की भागीदारी अधिक होती है, तो शोध का फोकस भी उन्हीं मुद्दों तक सीमित हो जाता है. ग्रामीण, दलित, पिछड़े या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्र कई बार उन जमीनी समस्याओं को सामने लाता हैं, जिन पर मुख्यधारा की रिसर्च कम ध्यान देती है.

अगर निजी विश्वविद्यालयों में आरक्षण या सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाये, तो देश में रिसर्च का दायरा व्यापक हो सकता है. इससे कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य और स्थानीय तकनीक जैसे विषयों पर ज्यादा उपयोगी और व्यावहारिक शोध सामने आ सकता हैं.

पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटी की भूमिका

प्रियांका भारती ने अपने पोस्ट में यह भी कहा है कि वर्तमान समय में पब्लिक फंडेड यूनिवर्सिटी को बढ़ावा देने की जरूरत है.यह बात काफी हद तक सही है.सरकारी विश्वविद्यालय अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं और वहाँ आरक्षण नीति लागू होने से समाज के सभी वर्गों को अवसर मिलता है.

यदि सरकार उच्च शिक्षा बजट का बड़ा हिस्सा रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर खर्च करे, तो न केवल सरकारी संस्थानों की गुणवत्ता सुधरेगी बल्कि निजी संस्थानों पर भी सकारात्मक प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बनेगा. इससे शिक्षा का लोकतंत्रीकरण संभव होगा, जहाँ प्रतिभा आर्थिक स्थिति से प्रभावित नहीं होगा.

वैज्ञानिक सोच और नीति निर्माण का संबंध

पोस्ट में यह आरोप भी लगाया गया है कि जब सरकार ही वैज्ञानिक टेम्परामेंट के विरुद्ध काम करती है, तो सुधार की उम्मीद कम हो जाती है.दरअसल, वैज्ञानिक सोच का अर्थ केवल लैब और प्रयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि नीतियों को डेटा, शोध और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर बनाना भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हिस्सा है.

यदि शिक्षा नीति बनाते समय सामाजिक असमानता, क्षेत्रीय अंतर और आर्थिक विषमता जैसे पहलुओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता, तो नीति अधूरी रह जाती है.ऐसे में शिक्षा प्रणाली समान अवसर देने के बजाय असमानता को और गहरा कर सकता है.

समस्या की जड़: अवसरों का असंतुलन

इस पूरे मुद्दे की जड़ अवसरों का असंतुलन है. एक तरफ महंगे निजी विश्वविद्यालय हैं, जहाँ पढ़ाई का खर्च लाखों में होता है; दूसरी तरफ सीमित सीटों वाले सरकारी संस्थान हैं, जहाँ प्रतिस्पर्धा अत्यधिक है। ऐसे में वंचित वर्गों के छात्र बीच में ही छूट जाते हैं.

अगर प्राइवेट यूनिवर्सिटियों में भी किसी न किसी रूप में सामाजिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था हो, जैसे स्कॉलरशिप, आरक्षण या विशेष कोटा, तो यह अंतर कम किया जा सकता है. इससे शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय दोनों को मजबूती मिलेगी.

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सुधार के लिए संभावित समाधान

निजी विश्वविद्यालयों में सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिए नीति बनाना.

सरकारी विश्वविद्यालयों के इंफ्रास्ट्रक्चर और रिसर्च फंडिंग को बढ़ाना.

आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए व्यापक स्कॉलरशिप कार्यक्रम लागू करना.

शिक्षा नीति में वैज्ञानिक और डेटा-आधारित निर्णय प्रक्रिया को प्राथमिकता देना.

इन कदमों से शिक्षा व्यवस्था अधिक समावेशी और शोध-उन्मुख बन सकती है.

निष्कर्ष

प्राइवेट यूनिवर्सिटियों में आरक्षण लागू न होना केवल एक प्रशासनिक या राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, रिसर्च की गुणवत्ता और देश के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है. जब तक उच्च शिक्षा में हर वर्ग की बराबर भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक Excellence की अवधारणा अधूरी रहेगी.

समस्या की जड़ पर गंभीर चर्चा और ठोस नीति सुधार ही वह रास्ता है, जिससे भारत की शिक्षा व्यवस्था अधिक समावेशी, वैज्ञानिक और प्रगतिशील बन सकती है.यही वह दिशा है, जो देश को वास्तविक अर्थों में ज्ञान-आधारित महाशक्ति बनने की ओर ले जा सकती है.

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