मल्लिकार्जुन खड़गे का आरोप: राज्यसभा में भाषण के हिस्से हटाने पर उठा विवाद

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Ajit Kumar

भारत
राज्यसभा में भाषण के अंश हटाने के मुद्दे पर मल्लिकार्जुन खड़गे

संसदीय रिकॉर्ड से भाषण के अंश हटाने पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर विवाद गहराया

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 13 फ़रवरी— कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष Mallikarjun Kharge ने संसद के रिकॉर्ड से अपने भाषण के कुछ हिस्से हटाए जाने को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है.उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान दिया गया उनके भाषण का बड़ा भाग बिना उचित कारण के expunge कर दिया गया या रिकॉर्ड से हटा दिया गया. खड़गे का यह बयान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर सामने आया है , जिसने संसदीय प्रक्रिया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर नई बहस छेड़ दिये है.

भाषण हटाने का आरोप और लोकतंत्र पर सवाल

खड़गे ने कहा कि 4 फरवरी 2026 को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उन्होंने स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों को उठाया था.उनके अनुसार, सामाजिक न्याय, संसदीय तंत्र और सरकार की नीतियों से जुड़े कई तथ्यात्मक बिंदु उन्होंने अपने भाषण में रखा था. लेकिन जब उन्होंने राज्यसभा की वेबसाइट पर अपलोड भाषण की समीक्षा किया , तो पाया कि उनके वक्तव्य के कई हिस्से रिकॉर्ड से हटा दिया गया हैं.

उनका आरोप है कि जिन हिस्सों को हटाया गया, वे वही थे जिनमें उन्होंने वर्तमान सरकार के कार्यकाल में संसदीय कामकाज की स्थिति पर आलोचनात्मक टिप्पणियां की थीं और प्रधानमंत्री की कुछ नीतियों पर सवाल उठाए थे.उन्होंने इसे लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ बताया है.

संसदीय परंपरा और पांच दशक का अनुभव

खड़गे ने अपने बयान में यह भी उल्लेख किया कि उनका संसदीय जीवन पांच दशक से अधिक लंबा रहा है. विधायक और सांसद के रूप में उन्होंने सदन की गरिमा, नियमों और परंपराओं का हमेशा पालन किया है. उनका कहना है कि उन्हें पूरी तरह जानकारी है कि किन शब्दों या बयानों को सदन की कार्यवाही से हटाया जा सकता है.

उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनके हटाए गए अंशों में कोई भी असंसदीय या मानहानिकारक शब्द नहीं थे और न ही नियम 261 का उल्लंघन किया गया था. उनके अनुसार, उनके सभी विचार चर्चा के विषय से सीधे जुड़े थे और धन्यवाद प्रस्ताव के दायरे में आते था.इसलिए भाषण के बड़े हिस्से को हटाना न केवल अनुचित है बल्कि संसदीय परंपराओं के विपरीत भी है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान का हवाला

अपने बयान में खड़गे ने संविधान के अनुच्छेद 105(1) का हवाला देते हुए कहा है कि सांसदों को संसद के भीतर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है. उनका कहना है कि यदि नेता प्रतिपक्ष के तौर पर सरकार की नीतियों पर तथ्यात्मक आलोचना भी रिकॉर्ड से हटाया जाता है, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक संकेत है.

उन्होंने इस मामले में पुनर्विचार की मांग करते हुए कहा कि हटाए गए अंशों को बहाल किया जाना चाहिये . उनका मानना है कि संसद में बहस का उद्देश्य केवल प्रशंसा करना नहीं, बल्कि नीति और शासन की कमियों पर सवाल उठाना भी होता है. यही लोकतंत्र की आत्मा है.

अनरिकॉर्डेड वर्जन साझा करने की चेतावनी

खड़गे ने अपने पोस्ट में यह भी कहा कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे जनता के बीच अपने भाषण का अनरिकॉर्डेड वर्जन साझा करने को बाध्य होंगे. उन्होंने संकेत दिया है कि ऐसा करना उन्हें नियमों के उल्लंघन के आरोपों का सामना करवा सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए वे यह कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगे.

यह बयान राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे संसद की कार्यवाही में रिकॉर्डिंग और संपादन की पारदर्शिता पर सवाल उठ रहा हैं.विपक्षी दल इसे लोकतांत्रिक संस्थाओं के कमजोर होने का संकेत बता सकता हैं, जबकि सरकार और सभापति कार्यालय इस पर प्रक्रिया और नियमों का हवाला दे सकता हैं.

संसदीय रिकॉर्ड से अंश हटाने की प्रक्रिया क्या है?

संसद की कार्यवाही से कुछ शब्द या हिस्से हटाने की प्रक्रिया कोई नई बात नहीं है.यदि किसी सदस्य के बयान में असंसदीय, आपत्तिजनक या नियमों के खिलाफ टिप्पणी होती है, तो सभापति या पीठासीन अधिकारी उन्हें expunge कर सकता हैं. लेकिन विवाद तब पैदा होता है जब हटाए गए अंशों की प्रकृति को लेकर असहमति सामने आती है.

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि हटाए गए हिस्से तथ्यात्मक आलोचना या नीति पर टिप्पणी से जुड़ा हों और उनमें कोई असंसदीय भाषा न हो, तो यह बहस का विषय बन सकता है कि क्या ऐसा कदम उचित था.यही कारण है कि खड़गे का यह आरोप केवल व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बन गया है.

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राजनीतिक प्रतिक्रिया और संभावित प्रभाव

खड़गे के इस बयान के बाद विपक्षी राजनीति में इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मुद्दे के रूप में उठाया जा सकता है. विपक्ष का तर्क हो सकता है कि संसद में सरकार की आलोचना लोकतंत्र का मूल तत्व है, और यदि ऐसी आलोचनाएं रिकॉर्ड से हटाई जाती हैं तो यह संस्थागत संतुलन पर असर डाल सकता है.

वहीं सत्तापक्ष की ओर से यह कहा जा सकता है कि संसद के नियमों और परंपराओं के अनुसार ही संपादन या expunction की प्रक्रिया होती है और यह पूरी तरह संस्थागत अधिकारों के तहत किया जाता है. इस तरह यह विवाद आने वाले दिनों में संसद की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर बड़ी बहस का कारण बन सकता है.

लोकतंत्र, संसद और पारदर्शिता का प्रश्न

यह पूरा विवाद एक बड़े सवाल की ओर इशारा करता है,क्या संसद की कार्यवाही में पारदर्शिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन सही तरीके से बना हुआ है? खड़गे का कहना है कि लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज को रिकॉर्ड से हटाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. वहीं संसदीय नियमों का पालन भी उतना ही आवश्यक है.

आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सभापति या संबंधित संसदीय प्राधिकरण इस मामले पर क्या रुख अपनाते हैं.यदि हटाए गए अंशों की समीक्षा कर उन्हें बहाल किया जाता है, तो यह संसदीय पारदर्शिता की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है.लेकिन यदि ऐसा नहीं होता, तो यह मुद्दा राजनीतिक और संवैधानिक बहस को और तेज कर सकता है.

कुल मिलाकर, यह मामला केवल एक भाषण के संपादन का नहीं, बल्कि संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक परंपराओं और विपक्ष की भूमिका के व्यापक प्रश्न से जुड़ा हुआ है.यही कारण है कि यह विवाद आने वाले दिनों में राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में बना रह सकता है.

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