क्या भारतीय चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,7 दिसंबर 2025 — भारतीय लोकतंत्र की मजबूती चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर निर्भर करता है. लेकिन Rashtriya Janata Dal (RJD) द्वारा किए गए एक X (Twitter) पोस्ट ने इस लोकतांत्रिक ढांचे की नींव को हिला देने वाले सवाल खड़ा कर दिया हैं. पोस्ट में तेजस्वी यादव ने आरोप लगाया कि पूरा विपक्ष Level Playing Field से वंचित है, क्योंकि चुनाव आयोग, मीडिया, पूंजीपति, संवैधानिक संस्थाएं और अधिकारी,सब सत्ता पक्ष के साथ खड़े दिखाई देता हैं.
तेजस्वी यादव के तीखे शब्दों ने सिर्फ राजनीतिक बहस नहीं छेड़ी, बल्कि भारतीय निर्वाचन प्रणाली की पारदर्शिता और जनता के भरोसे पर गंभीर चिंताएँ खड़ी कर दी हैं.
तेजस्वी यादव के आरोप: Level Playing Field गायब?
RJD के पोस्ट के अनुसार, तेजस्वी यादव ने कहा है कि,
विपक्ष को बराबरी का राजनीतिक मंच नहीं मिलता.
Election Commission सत्ता पक्ष की तरफ झुका हुआ दिखाई देता है.
मीडिया और बड़े कॉर्पोरेट सत्ता पक्ष के पक्ष में माहौल बनाते हैं.
संवैधानिक संस्थाएं और नौकरशाही भी दबाव में काम कर रही हैं.
उनका कहना है कि जब चुनाव के दौरान 10,000 रुपये की रिश्वत बंटी और किसी ने कार्रवाई नहीं की, तो यह तो साफ संकेत है कि सत्ता में आने के बाद पाँच साल अधिकारी और मंत्री रिश्वत से काम चलाएंगे.
यह बयान लोकतंत्र की उस बुनियादी धारणा को चुनौती देता है कि चुनाव जनता की इच्छा का प्रतिबिंब होता है.
CAG रिपोर्ट का मामला: 71,000 करोड़ का कोई हिसाब नहीं?
RJD ने अपने पोस्ट में CAG की उस रिपोर्ट का भी हवाला दिया है जिसमें कथित रूप से 71,000 करोड़ रुपये का लेखा-जोखा स्पष्ट नहीं बताया गया है.
अगर यह आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि वित्तीय अपारदर्शिता और संस्थागत कमजोरी का संकेत है.
CAG रिपोर्ट का जिक्र यह समझाता है कि तेजस्वी यादव क्यों कह रहे हैं कि,
जब चुनाव में खुलेआम 10,000 रुपये देकर वोट खरीदे गए और EC चुप रहा, तो भ्रष्टाचार को रोजमर्रा की घटना बनाने का रास्ता खुद सरकार और संस्थाओं ने मिलकर तैयार किया है.
क्या भारतीय चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं?
भारतीय चुनाव आयोग (ECI) दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का संचालन करता है.लेकिन विपक्ष का आरोप है कि,
EC चुनावी अनियमितताओं पर कार्रवाई नहीं करता है .
EC शिकायतों को नजरअंदाज करता है.
EC जांच और निगरानी में ढील देता है.
EC सरकार के दबाव में फैसले लेता है.
RJD का दावा है कि बिहार चुनाव में संस्थागत तरीके से रिश्वत संस्कृति को मौन स्वीकृति मिली है.
अगर विपक्ष का यह शिकायतें सच हैं, तो यह चुनाव आयोग के लिए भी गंभीर प्रश्न खड़ा करती हैं.
क्या EC चुनाव की निष्पक्षता बनाए रखने में असफल हो रहा है?
मीडिया और पूंजीपतियों की भूमिका: एकतरफा नैरेटिव का आरोप
तेजस्वी यादव का अनुमान है कि,
मीडिया सत्ता के पक्ष में विस्तृत प्रचार करता है
विपक्ष की आवाज़ को दबा दिया जाता है
न्यूज़ चैनल सवाल उठाने के बजाय सरकार का बचाव करते नजर आते हैं
बड़ी कंपनियाँ राजनीतिक पक्षपात को बढ़ावा देती हैं
जब मीडिया और कॉर्पोरेट दोनों एक तरफ झुक जाते हैं, तो चुनावी नैरेटिव भी प्रभावित होता है.
विपक्ष इसे सिस्टमेटिक पावर इम्बैलेंस बता रहा है.
नौकरशाही और संस्थागत ढांचे पर आरोप
पोस्ट में यह भी कहा गया है कि,
पूरी संवैधानिक संस्थाएं और अधिकारी सत्ता पक्ष के साथ खड़े हैं.
इसका मतलब यह है कि, प्रशासनिक अधिकारी, सुरक्षा तंत्र
चुनावी कर्मी, विभिन्न वैधानिक निकाय,सब एक तरह का एकतरफा माहौल बना रहा हैं जिसमें विपक्ष आवाज़ उठाने में कमजोर पड़ता है.
यदि यह सच है, तो यह चुनाव प्रक्रिया को सीधे प्रभावित करता है.
क्या चुनाव के बाद रिश्वतखोरी नॉर्मल हो सकती है?
RJD द्वारा की गई सबसे गंभीर टिप्पणी यह है कि बिहार चुनाव में रिश्वत बांटने पर EC की चुप्पी से यह संकेत गया कि भ्रष्टाचार को संस्थागत मंजूरी मिल चुकी है.
जब चुनाव आयोग किसी अनियमितता पर कार्रवाई नहीं करता है , तो राजनीतिक संदेश यही जाता है कि,
चुनाव जीतने के लिए पैसे का इस्तेमाल ठीक है
सत्ता मिलते ही अधिकारियों के बीच रिश्वतखोरी बढ़ेगी
जनता की आवाज़ की ताकत कम होगी
लोकतंत्र की असली भावना कमजोर होगी
यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक स्थिति है.
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विपक्ष की भूमिका और लोकतंत्र का भविष्य
विपक्ष का कहना है कि उन्हें चुनाव में बराबरी का मौका नहीं मिलता है.
एक मजबूत लोकतंत्र में,
सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को समान अधिकार
निष्पक्ष मीडिया
स्वतंत्र चुनाव आयोग
सक्षम संस्थागत ढांचा
जरूरी होते हैं. परन्तु तेजस्वी यादव के बयान इन सब पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं.
अगर विपक्ष दबाव में होगा, तो लोकतंत्र का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है.
निष्कर्ष
RJD के X पोस्ट और तेजस्वी यादव के आरोप भारतीय लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी के रूप में सामने आए हैं.
चुनाव आयोग, मीडिया, नौकरशाही और संस्थागत ढाँचों की निष्पक्षता पर उठे सवालों ने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता को चुनौती दी है.
चाहे राजनीतिक बयानबाज़ी हो या वास्तविक चिंता—इस पूरे विवाद ने यह साफ कर दिया है कि भारत की चुनावी व्यवस्था को पारदर्शिता, जवाबदेही और विश्वास की जरूरत पहले से कहीं अधिक है.
लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं—वह जनता के भरोसे पर टिका होता है.
और जब यह भरोसा हिलने लगता है, तो सबसे बड़ा खतरा राष्ट्र को होता है.

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