शिक्षकों की योग्यता पर संकट: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठे सवाल

| BY

Ajit Kumar

भारत
शिक्षकों की योग्यता पर संकट: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठे सवाल

शिक्षा पात्रता परीक्षा अनिवार्य करने के प्रभाव

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,3 दिसंबर 2025 — सितंबर 2025 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाया, जिसके तहत कक्षा 1 से 8 तक पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों के लिए टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) को अनिवार्य कर दिया गया है.यह निर्णय शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया, लेकिन इसके दूरगामी असर देशभर में कार्यरत लगभग 20 लाख शिक्षकों पर पड़ते दिख रहा हैं.
लोकसभा में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए शिक्षकों की अनिश्चितता और तनाव पर चिंता जताई है. उनका कहना है कि इस फैसले को लागू करने से पहले ऐसे उपाय अनिवार्य रूप से किए जाएं, जिससे पहले से कार्यरत शिक्षकों की सेवा और दर्जा सुरक्षित रह सके.

Supreme Court का फैसला और उसका दायरा

TET को अनिवार्य करने का उद्देश्य

इस निर्णय का मूल आधार यह है कि देश में स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता को एक मानक प्रणाली के तहत बेहतर बनाया जाए.TET को शिक्षा योग्यता का न्यूनतम मानक माना जाता है, जिससे शिक्षण स्तर में समानता सुनिश्चित हो सके.

किसे होगा सबसे अधिक प्रभाव?

यह निर्णय मुख्य रूप से निम्नलिखित शिक्षकों पर प्रभाव डालता है.:

राज्य सरकारों द्वारा वर्षों पहले नियुक्त शिक्षक

संविदा और अतिथि शिक्षक

वे शिक्षक जो नियुक्त तो हो चुके हैं, लेकिन TET पास नहीं है

वे शिक्षक जो आयु सीमा के करीब हैं व नए सिरे से परीक्षा देना उनके लिए मुश्किल है

20 लाख शिक्षकों पर संकट क्यों?

सेवा का दर्जा खत्म होने का डर

    देशभर में लगभग 20 लाख शिक्षक ऐसे हैं जो पहले से सेवा में हैं लेकिन उनके पास TET प्रमाणपत्र नहीं है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू होने के बाद उनकी नियुक्ति असुरक्षित हो सकती है.

    लंबी सेवा करने वाले शिक्षक सबसे अधिक प्रभावित

      कई शिक्षक 10–20 वर्षों से पढ़ा रहे हैं. अब अचानक परीक्षा देना और क्वालिफ़ाई करना उनके लिए मानसिक दबाव का विषय बन गया है.

      परीक्षा प्रक्रिया में अनिश्चितता

        अधिकांश राज्यों में TET परीक्षा साल में एक या दो बार ही होती है.इतने बड़े पैमाने पर शिक्षकों को परीक्षा दिलवाना भी एक चुनौती है.

        नौकरी खोने की आशंका

          इमरान मसूद ने कहा है कि शिक्षकों में डर है कि योग्य न माने जाने पर उनकी नौकरी पर सीधा खतरा मंडरा सकता है.

          कांग्रेस सांसद इमरान मसूद की मांग: शिक्षकों का दर्जा सुरक्षित रखा जाए

          लोकसभा में अपनी बात रखते हुए @Imranmasood_Inc ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हुए सरकार को ऐसे कदम उठाने चाहिए जो शिक्षकों को राहत दें सके .

          उनकी मुख्य मांगें इस प्रकार हैं.

          प्रभावी अधिसूचना से पहले नियुक्त शिक्षकों को संरक्षण

            जो शिक्षक इस निर्णय से पहले सेवा में आ चुके हैं, उन्हें क्वालिफाइड का दर्जा बरकरार रखा जाए.

            TET के विकल्प पर विचार

              उनके लिए विशेष प्रशिक्षण, ब्रिज कोर्स या सेवा अनुभव को योग्यता के तौर पर मानने जैसे विकल्प लागू किए जा सकते हैं.

              चरणबद्ध तरीके से लागू हो नीति

                फैसले को एकदम से लागू करने के बजाय इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाए, ताकि शिक्षक तैयारी कर सकें.

                शिक्षकों की मनोवैज्ञानिक स्थिति पर ध्यान

                  इमरान मसूद ने यह भी कहा कि अचानक हुए इस बदलाव ने शिक्षकों में तनाव और असमंजस बढ़ा दिया है.ऐसी नीति लानी चाहिए जिससे शिक्षकों का मनोबल न गिरे.

                  सरकार के सामने क्या चुनौतियाँ हैं?

                  लाखों शिक्षकों की पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया

                    20 लाख शिक्षकों के लिए परीक्षा आयोजित करना, मूल्यांकन करना और रिजल्ट जारी करना एक बड़ा प्रशासनिक कार्य है.

                    स्कूलों में शिक्षा प्रभावित होने की आशंका

                      यदि बड़ी संख्या में शिक्षक अस्थायी रूप से अयोग्य की श्रेणी में चले जाते हैं, तो स्कूलों में शिक्षण कार्य प्रभावित होगा.

                      नीति के सामाजिक प्रभाव

                        अचानक हुए बदलाव से ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में शिक्षा प्रभावित हो सकती है, जहां पहले से शिक्षक की कमी है.

                        क्या शिक्षा सुधार जरूरी नहीं? बिल्कुल जरूरी है, लेकिन…

                        शिक्षा गुणवत्ता सुधार की दिशा में TET जैसी परीक्षाएँ आवश्यक हैं.
                        लेकिन एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी है कि,
                        किसी भी सुधार का प्रभाव सबसे पहले वर्तमान में कार्यरत कर्मियों पर नहीं पड़ना चाहिए.

                        दुनिया भर में शिक्षा प्रणालियों में सुधार करते समय पुरानी नियुक्तियों को (पुरानी सेवा को संरक्षण) के तहत सुरक्षित रखा जाता है.

                        ये भी पढ़े :मोदी सरकार में निजता पर बढ़ते खतरे: क्या लोकतांत्रिक भारत की निजी स्वतंत्रता सुरक्षित है?
                        ये भी पढ़े :जदयू के नीरज कुमार वास्कोडिगामा की तरह खोज में न भटकें : राजद

                        आगे का रास्ता: समाधान क्या?

                        पुरानी नियुक्तियों को SRO (Service Regularisation Order) के तहत सुरक्षित करना

                        इससे शिक्षकों की सेवा पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

                        विशेष TET (One-Time Eligibility Test)

                        केवल एक बार, आसान पैटर्न के साथ, पूर्व नियुक्त शिक्षकों के लिए विशेष TET आयोजित किया जा सकता है.

                        लंबी सेवा को योग्यता में शामिल करना

                        10–15 वर्षों का अनुभव शिक्षक की दक्षता को सिद्ध करता है.

                        TET पास करने के लिए अतिरिक्त समय

                        शिक्षकों को कम से कम 3 वर्ष की ग्रेस पीरियड मिलनी चाहिए.

                        निष्कर्ष

                        सुप्रीम कोर्ट का फैसला शिक्षा सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम है.लेकिन इस फैसले से पहले से कार्यरत लाखों शिक्षकों का भविष्य दांव पर नहीं लगना चाहिए.
                        लोकसभा में इमरान मसूद द्वारा उठाया गया मुद्दा बेहद संवेदनशील और समयानुकूल है.
                        सरकार को चाहिए कि फैसले को लागू करने से पहले व्यापक परामर्श, चरणबद्ध योजना और शिक्षकों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करे.

                        यदि शिक्षक सुरक्षित रहेंगे, तभी शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी — और तभी देश का भविष्य सुरक्षित होगा.

                        न्यूज़ स्रोत :यह जानकारी लोकसभा में मुद्दा उठाने वाले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद (@Imranmasood_Inc) के X (Twitter) पोस्ट से ली गई है.और Congress
                        @INCIndia पर से !
                        ·

                        Trending news

                        Leave a Comment