बीजेपी की राजनीति, UGC बिल और सामाजिक न्याय पर हमला

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Ajit Kumar

भारत
बीजेपी की राजनीति, UGC बिल और सामाजिक न्याय पर हमला

धर्म, जाति और शिक्षा के ज़रिए देश को बाँटने की साज़िश?

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 2 फ़रवरी 2026 — देश की राजनीति में शिक्षा, सामाजिक न्याय और संविधान अब सबसे बड़े संघर्ष के केंद्र बनता जा रहा हैं.आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद संजय आज़ाद ने बीजेपी और आरएसएस की राजनीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि बीजेपी हमेशा से धर्म को धर्म से और जाति को जाति से लड़ाने की राजनीति करते आई है. उनका आरोप है कि हाल में लाया गया UGC से जुड़ा बिल केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों पर सीधा हमला है.

संजय आज़ाद के इस बयान ने देशभर में एक नई बहस छेड़ दिया है कि,क्या शिक्षा को भी अब वैचारिक नियंत्रण और सामाजिक वर्चस्व का औज़ार बनाया जा रहा है?

धर्म और जाति की राजनीति: बीजेपी का पुराना मॉडल

बीजेपी पर यह आरोप नया नहीं है कि वह धार्मिक ध्रुवीकरण और जातीय विभाजन के सहारे राजनीति करती है.संजय आज़ाद का कहना है कि बीजेपी ने हमेशा समाज को जोड़ने के बजाय तोड़ने का काम किया है.

कभी धर्म के नाम पर समाज को बाँटा गया.

कभी जाति के आधार पर वोट बैंक खड़ा किया गया.

और अब शिक्षा व्यवस्था को नियंत्रण में लेकर सामाजिक संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश किया जा रहा है .

यह राजनीति सीधे-सीधे संविधान की आत्मा,समानता, सामाजिक न्याय और बंधुत्व, के खिलाफ जाती है.

UGC बिल: सुधार या साज़िश?

संजय आज़ाद ने जिस UGC बिल की ओर इशारा किया है, उस पर देश के शिक्षाविदों, छात्रों और सामाजिक संगठनों में गहरी चिंता है.आलोचकों का मानना है कि यह बिल, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को कमजोर करता है.

नियुक्तियों और नीतियों में केन्द्र सरकार का अत्यधिक हस्तक्षेप बढ़ाता है.

और सबसे गंभीर बात,आरक्षण व्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से खत्म करने का रास्ता खोलता है.

यदि विश्वविद्यालयों में नियुक्ति और प्रशासनिक फैसले सामाजिक प्रतिनिधित्व के बजाय वैचारिक निष्ठा के आधार पर होंगे, तो इसका सीधा नुकसान दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों को होगा.

विश्वविद्यालयों में आरक्षण पर हमला

संजय आज़ाद का स्पष्ट आरोप है कि बीजेपी ने विश्वविद्यालयों में आरक्षण को खत्म किया है. बीते वर्षों में यह देखा गया है कि,

रोस्टर सिस्टम में बदलाव , विभागवार आरक्षण की जगह संस्थान-स्तरीय गणना, संवैधानिक प्रावधानों की संकीर्ण व्याख्या

इन सभी कदमों का परिणाम यह हुआ कि उच्च शिक्षा संस्थानों में SC/ST/OBC समुदायों की हिस्सेदारी लगातार घटती गई. यह सिर्फ़ नौकरियों का सवाल नहीं, बल्कि सदियों से वंचित समुदायों की आवाज़ को दबाने की प्रक्रिया है.

आरएसएस और सामाजिक प्रतिनिधित्व का सच

संजय आज़ाद ने आरएसएस पर भी सीधा सवाल उठाया कि आरएसएस ने आज तक किसी दलित या आदिवासी को अपना प्रमुख क्यों नहीं बनाया?

यह सवाल सिर्फ़ प्रतीकात्मक नहीं है. यह उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें,

नेतृत्व कुछ खास वर्गों तक सीमित रहता है.

सामाजिक विविधता को स्वीकार नहीं किया जाता है,और सामाजिक समरसता सिर्फ़ नारा बनकर रह जाती है.

यदि कोई संगठन वास्तव में दलितों और आदिवासियों का हितैषी है, तो उसका प्रतिबिंब नेतृत्व संरचना में भी दिखना चाहिये.

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शिक्षा बनाम सत्ता: असली लड़ाई

आज की लड़ाई सिर्फ़ किसी एक बिल या कानून की नहीं है. यह लड़ाई है.:

संविधान बनाम मनुवाद

समान अवसर बनाम वर्चस्ववादी सोच

लोकतांत्रिक शिक्षा बनाम केंद्रीकृत नियंत्रण

विश्वविद्यालय किसी भी देश की वैचारिक प्रयोगशाला होता हैं. यदि उन्हें डर, दबाव और भेदभाव से चलाया जाएगा, तो देश का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा.

आम आदमी पार्टी का स्टैंड

AAP और उसके नेता लगातार यह कहते रहे हैं कि, शिक्षा सबका अधिकार है.

आरक्षण कोई कृपा नहीं, संवैधानिक हक़ है, और सामाजिक न्याय के बिना लोकतंत्र अधूरा है.

संजय आज़ाद का यह बयान उसी संघर्ष की कड़ी है, जिसमें शिक्षा को बचाने और संविधान को बचाने की बात की जा रही है.

निष्कर्ष

बीजेपी और आरएसएस की नीतियों पर संजय आज़ाद का यह हमला केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह देश की दिशा और दशा से जुड़ा सवाल है. UGC बिल, आरक्षण, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और सामाजिक प्रतिनिधित्व,ये सभी मुद्दे सीधे तौर पर भारत के लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़ा हैं.

आज ज़रूरत है कि देश यह तय करे कि उसे विभाजन की राजनीति चाहिए या समानता की राजनीति, नियंत्रण चाहिए या स्वतंत्र सोच,और संविधान चाहिए या विचारधारा का वर्चस्व.

स्रोत: X (Twitter) पर @AamAadmiParty द्वारा साझा संजय आज़ाद, राज्यसभा सांसद (AAP) का बयान के आधार पर आधारित एक विश्लेषण है .

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