राजधानी लखनऊ में गर्भवती महिलाओं की अनदेखी

| BY

Ajit Kumar

भारत
राजधानी लखनऊ में गर्भवती महिलाओं की अनदेखी

चुनावी वादों और वास्तविकता के बीच की खाई

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,28 नवंबर 2025 — राजधानी लखनऊ का हाल यह साफ़ कर रहा है कि कई भाजपा सरकारों के बहनों के प्रति कथित संवेदनशीलता केवल चुनावी मौसम तक ही सीमित है हाल ही में Aazad Samaj Party – Kanshi Ram ने ट्विटर (X) पर साझा किया कि लखनऊ के अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं को न तो पर्याप्त नाश्ता मिल रहा है, न पोषणयुक्त भोजन और न ही सरकारी वेंडर के भोजन की सुविधा मिल रही है.

यह स्थिति न केवल समाज के कमजोर वर्ग के लिए गंभीर चिंता का विषय है, बल्कि यह चुनावी वादों और वास्तविकता के बीच की बड़ी खाई को भी उजागर करती है.सरकारी वेंडर द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले भोजन के बजाय, गर्भवती महिलाओं को कोचिंग हॉस्टल की कैंटीन से बचे-खुचे भोजन परोसा जा रहा है.

चुनावी वादों और वास्तविकता में अंतर

भाजपा सरकार ने समय-समय पर महिलाओं और लड़कियों के लिए कई योजनाओं की घोषणा की है, जैसे कि लाड़ली बहना योजना, बड़की बहना योजना और जीविका दीदी योजना.इन योजनाओं के तहत चुनाव से ठीक पहले बड़ी धनराशि बांटने और सामाजिक सुरक्षा के संदेश देने का दावा किया गया.अक्सर देखा गया कि चुनाव के दौरान हर शुक्रवार को दस-दस हजार रुपए बांटने का प्रचार किया जाता है.

लेकिन जब असली बहनें, यानी गर्भवती महिलाएं और अस्पताल में भर्ती अन्य महिला रोगी, सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में जाती हैं, तो उन्हें रोटी, पोषण और सुरक्षित भोजन जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं मिल पाती. यह साफ़ संकेत है कि योजनाओं का क्रियान्वयन केवल प्रचार के लिए है, वास्तविक जरूरतमंदों तक यह लाभ नहीं पहुँच रहा.

समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था पर असर

गर्भावस्था के दौरान सही पोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से न केवल महिलाओं की सेहत पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, बल्कि नए जन्म लेने वाले बच्चों की भी सेहत प्रभावित होती है. यह स्थिति सामाजिक असमानता और स्वास्थ्य प्रशासन की कमजोरी की पहचान कराती है.

अस्पतालों में गर्भवती महिलाओं को पर्याप्त भोजन नहीं मिलने से उनका मानसिक और शारीरिक तनाव बढ़ता है. पोषण की कमी, विटामिन और आयरन की कमी, और असुरक्षित भोजन का सेवन, सभी गर्भावस्था में जटिलताओं का कारण बन सकते हैं.

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राजनीतिक संदेश और आलोचना

Aazad Samaj Party – Kanshi Ram ने ट्वीट के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि चुनावी राज्यों में विभिन्न योजनाओं का प्रचार केवल दिखावे के लिए होता है. वास्तविकता में, गर्भवती महिलाओं की देखभाल में गंभीर कमी है.इस मुद्दे को उजागर करना आवश्यक है ताकि सरकार अपनी नीतियों और योजनाओं के कार्यान्वयन में सुधार करे.

यह स्थिति यह भी दिखाती है कि केवल चुनावी घोषणाएं करना पर्याप्त नहीं है. सरकारों को स्थायी और प्रभावी नीतियाँ बनानी होंगी, जिनके परिणाम सीधे जरूरतमंदों तक पहुँचें.गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण की जिम्मेदारी केवल प्रशासनिक आदेशों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.

निष्कर्ष

राजनीति और चुनावी वादों के बीच इस अंतर को पाटने के लिए नागरिक समाज, मीडिया और राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है. गर्भवती महिलाओं के पोषण और स्वास्थ्य के लिए दी जाने वाली योजनाओं का सही और पारदर्शी क्रियान्वयन ही सच्ची संवेदनशीलता का परिचायक होगा.

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