हाईकोर्ट की रोक के बाद MBBS-BDS काउंसलिंग दोबारा शुरू, चंद्रशेखर आजाद ने स्थायी कानूनी संरक्षण की मांग की
तीसरा पक्ष ब्यूरो :उत्तर प्रदेश के चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में SC/ST विद्यार्थियों के लिए सीट व्यवस्था को लेकर विवाद एक बार फिर सामने आ गया है. अंबेडकरनगर, कन्नौज, जालौन और सहारनपुर स्थित सरकारी मेडिकल कॉलेजों में NEET-UG 2026-27 दाखिले की आरक्षण व्यवस्था पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के अंतरिम आदेश के बाद काउंसलिंग प्रक्रिया में बदलाव किया गया है. इसी बीच आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद ने राज्य सरकार से इन कॉलेजों में SC/ST विद्यार्थियों के लिए विशेष सीट व्यवस्था को स्थायी कानूनी संरक्षण देने की मांग की है.
हाईकोर्ट के आदेश के बाद बदली काउंसलिंग व्यवस्था
16 सितंबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने चार सरकारी मेडिकल कॉलेजों में NEET-UG दाखिले के लिए करीब 91 प्रतिशत आरक्षण वाली व्यवस्था के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगाई.अदालत ने हालांकि काउंसलिंग पूरी तरह रोकने के बजाय इसे राज्य के अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू आरक्षण प्रतिशत के आधार पर आगे बढ़ाने की अनुमति दी.
अंतरिम व्यवस्था के तहत SC के लिए 21 प्रतिशत, ST के लिए 2 प्रतिशत और OBC के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के आधार पर काउंसलिंग आगे बढ़ाने की बात सामने आई है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया के तहत होने वाले दाखिले मामले के अंतिम परिणाम के अधीन रहेंगे.
इसके बाद उत्तर प्रदेश में MBBS और BDS की प्रथम चरण की काउंसलिंग को नए सिरे से आयोजित करने की प्रक्रिया शुरू हुई.उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार पहले घोषित सीट आवंटन को रद्द कर पात्र अभ्यर्थियों को दोबारा काउंसलिंग में शामिल होना और विकल्प भरना होगा.
चार मेडिकल कॉलेजों की सीट व्यवस्था क्यों बनी विवाद का विषय?
मामला केवल मौजूदा काउंसलिंग तक सीमित नहीं है. इसकी पृष्ठभूमि में इन चार मेडिकल कॉलेजों में राज्य कोटे की सीटों के लिए लागू विशेष सीट मैट्रिक्स को लेकर पुराना कानूनी विवाद भी है.
अगस्त 2025 के Sabra Ahmad बनाम State of Uttar Pradesh मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष चारों कॉलेजों की राज्य कोटा सीटों का एक विशेष मैट्रिक्स दर्ज किया गया था. प्रत्येक कॉलेज में 85 राज्य कोटा MBBS सीटों में 62 SC, 5 ST, 11 OBC और 7 अनारक्षित सीटें थीं. चारों कॉलेजों को मिलाकर यह 340 सीटों का मैट्रिक्स था, जिसमें 248 SC, 20 ST, 44 OBC और 28 अनारक्षित सीटें थीं.
अदालत के रिकॉर्ड में राज्य सरकार की ओर से यह भी बताया गया था कि इन संस्थानों की स्थापना से संबंधित सरकारी आदेशों और Special Component Plan के तहत प्राप्त धनराशि का संदर्भ इस विशेष व्यवस्था से जुड़ा था.
हालांकि मौजूदा विवाद में अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह है कि वर्तमान शैक्षणिक सत्र में लागू की गई विशेष आरक्षण व्यवस्था वैधानिक प्रावधानों और पूर्व में अदालत के समक्ष दिए गए आश्वासन के अनुरूप है या नहीं. इसलिए 2026-27 की अंतरिम स्थिति को अंतिम कानूनी फैसला नहीं माना जा सकता.
चंद्रशेखर आजाद ने क्या कहा?
चंद्रशेखर आजाद ने 19 सितंबर को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि हाईकोर्ट की अंतरिम रोक के बाद MBBS और BDS की प्रथम चरण की काउंसलिंग रद्द कर नए सिरे से शुरू की गई है. उन्होंने कहा कि जिन अभ्यर्थियों को पहले सीट मिल चुकी थी, उन्हें भी दोबारा विकल्प भरकर सीट लॉक करनी होगी.
आजाद ने अपने बयान में दावा किया कि 1 सितंबर को उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इन चार मेडिकल कॉलेजों में पूर्व की सीट व्यवस्था जारी रखने का फैसला विद्यार्थियों के संघर्ष और एकजुटता का परिणाम था.उन्होंने यह भी कहा कि वह पिछले वर्ष से इस मुद्दे को उठाते रहे हैं.
उनका मुख्य आग्रह यह है कि उत्तर प्रदेश सरकार इन चार मेडिकल कॉलेजों में SC/ST विद्यार्थियों की विशेष सीट व्यवस्था को केवल शासनादेश तक सीमित न रखे, बल्कि इसके लिए स्थायी कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाए.
आजाद ने कहा कि विद्यार्थियों के शैक्षणिक अधिकारों से जुड़ी व्यवस्था को अनिश्चितता में नहीं छोड़ा जाना चाहिए और उन्होंने इस मुद्दे पर संघर्ष कर रहे विद्यार्थियों के समर्थन की बात कही है.
सरकार और अदालत के सामने क्या सवाल हैं?
इस पूरे विवाद में तीन अलग-अलग पहलुओं को समझना महत्वपूर्ण है.
पहला, काउंसलिंग का तत्काल प्रभाव है.हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद 2026-27 की प्रवेश प्रक्रिया में बदलाव हुआ है और पहले चरण की काउंसलिंग दोबारा कराई जा रही है.
दूसरा, आरक्षण व्यवस्था की वैधानिक स्थिति है. अदालत ने करीब 91 प्रतिशत वाली व्यवस्था पर फिलहाल रोक लगाते हुए अन्य सरकारी मेडिकल कॉलेजों में लागू प्रतिशतों के आधार पर काउंसलिंग की अनुमति दी है.
तीसरा, विशेष सीट व्यवस्था का दीर्घकालिक कानूनी आधार है.विद्यार्थियों और उनके समर्थकों का तर्क है कि इन संस्थानों की स्थापना और Special Component Plan से जुड़े प्रावधानों को देखते हुए विशेष व्यवस्था पर अलग से विचार होना चाहिए. वहीं वर्तमान न्यायिक कार्यवाही का अंतिम परिणाम अभी सामने नहीं आया है.
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विद्यार्थियों पर तत्काल असर
काउंसलिंग दोबारा शुरू होने का सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ता है, जिन्हें पहले चरण में सीट आवंटित की जा चुकी थी. उन्हें नई व्यवस्था के अनुसार फिर से विकल्प भरने और सीट लॉक करने की प्रक्रिया से गुजरना होगा। इससे प्रवेश प्रक्रिया की समयसीमा और अभ्यर्थियों की प्राथमिकताओं पर असर पड़ सकता है.
इसलिए विवाद अब केवल आरक्षण प्रतिशत का मामला नहीं रह गया है. इसके साथ हजारों NEET-UG अभ्यर्थियों की प्रवेश प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है. उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में करीब 34 हजार अभ्यर्थियों ने पहले चरण की काउंसलिंग के लिए पंजीकरण कराया था.
आगे क्या हो सकता है?
फिलहाल चारों मेडिकल कॉलेजों में विशेष आरक्षण व्यवस्था को लेकर कानूनी स्थिति अंतिम रूप से तय नहीं हुई है. हाईकोर्ट का 16 सितंबर का आदेश अंतरिम प्रकृति का है और मामले की आगे की सुनवाई में सीट व्यवस्था तथा संबंधित सरकारी निर्णयों की वैधानिकता पर और स्पष्टता आ सकती है.
चंद्रशेखर आजाद की मांग है कि राज्य सरकार अध्यादेश लाकर विशेष सीट व्यवस्था को स्थायी कानूनी आधार दे। दूसरी ओर, अदालत के आदेश के तहत फिलहाल काउंसलिंग वैधानिक आरक्षण प्रतिशत के आधार पर आगे बढ़ाई जा रही है.
इस पूरे मामले में अंतिम स्थिति अदालत में चल रही कार्यवाही, राज्य सरकार के अगले कदम और 2026-27 की प्रवेश प्रक्रिया पर आने वाले आगामी आदेशों से स्पष्ट होगी.
न्यूज़ स्रोत/विश्लेषण का आधार: चंद्रशेखर आजाद के आधिकारिक X पोस्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश और उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के आधार पर

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