कांग्रेस के लोकतंत्र बचाओ अभियान पर भाजपा की रैलियों को लेकर गहलोत ने उठाए सवाल, पुराने आरोपों और राजनीतिक अनुभव पर भी दी सफाई
तीसरा पक्ष ब्यूरोः राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से आयोजित की जा रही लोकतंत्र बचाओ, अराजकता मिटाओ रैलियों पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि देश के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार देखने को मिल रहा है कि सत्तारूढ़ दल विपक्ष की रैलियों के जवाब में खुद काउंटर रैलियां कर रहा है.गहलोत के मुताबिक, अब तक विपक्ष ही सरकार के खिलाफ धरने, प्रदर्शन और रैलियां आयोजित करता रहा है, लेकिन मौजूदा राजनीतिक स्थिति में तस्वीर बदली हुई दिखाई दे रही है.
एक सवाल के जवाब में गहलोत ने कहा कि कांग्रेस लंबे समय से लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर खतरे का मुद्दा उठा रही है.अब भाजपा भी लोकतंत्र बचाने की बात करते हुए देशभर में रैलियां कर रही है. उन्होंने इसे राजनीतिक रूप से असामान्य स्थिति बताते हुए सवाल किया कि क्या लोकतंत्र में विपक्ष को अपनी बात रखने और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं होना चाहिए?
भाजपा की काउंटर रैलियों पर गहलोत ने उठाए सवाल
अशोक गहलोत ने आरोप लगाया कि भाजपा की रैलियों में केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य, मुख्यमंत्री और पार्टी के पदाधिकारी देशभर में घूम रहे हैं.उन्होंने कहा कि इन कार्यक्रमों के कारण वीआईपी रूट बनाए जाते हैं, यातायात डायवर्ट होता है और व्यापारियों को परेशानी उठानी पड़ती है.
गहलोत ने कांग्रेस की रैली को लेकर भाजपा की ओर से उठाई गई आपत्तियों का भी जिक्र किया. उनके अनुसार, व्यापारियों को होने वाली परेशानी का हवाला देकर कांग्रेस से रैली स्थगित करने को कहा गया था. इस पर राहुल गांधी ने जवाब दिया था.गहलोत ने सवाल उठाया कि जब भाजपा खुद देशभर में रैलियां कर रही है, तब वही परेशानी उसके कार्यक्रमों में क्यों नजरअंदाज की जा रही है?
उनका कहना था कि विपक्ष के कार्यक्रमों के जवाब में सत्ताधारी दल की ओर से काउंटर रैलियां आयोजित करना राजनीतिक रूप से कई सवाल खड़े करता है.
भाजपा की रैलियों में भीड़ को लेकर भी किया दावा
बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या भाजपा की लोकतंत्र बचाओ रैलियों में अपेक्षित भीड़ नहीं जुट पा रही है, तो गहलोत ने जोधपुर का उदाहरण दिया.
उन्होंने दावा किया कि जोधपुर में भाजपा की रैली में मुश्किल से चार-पांच सौ लोग पहुंचे थे.गहलोत के मुताबिक, भाजपा के नेताओं को अपनी पार्टी के नेतृत्व से नाराजगी जतानी चाहिए थी कि जयपुर से आने के बावजूद पर्याप्त भीड़ नहीं जुटाई जा सकी, लेकिन उन्होंने अपना गुस्सा उनके ऊपर निकाल दिया.
यह गहलोत का व्यक्तिगत आकलन और दावा है.रैली में शामिल लोगों की वास्तविक संख्या की स्वतंत्र पुष्टि के लिए अलग से आधिकारिक आंकड़ों या अन्य विश्वसनीय रिपोर्टों की आवश्यकता होगी.
45 साल पुराने आरोपों का भी किया जिक्र
बातचीत में अशोक गहलोत ने अपने लंबे राजनीतिक जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वह दशकों से इस तरह के आरोपों का सामना करते आए हैं.
उन्होंने बताया कि वर्ष 1980 में वह पहली बार सांसद बने थे और 1981 में इंदिरा गांधी सरकार में उपमंत्री बने. इसके बाद राजीव गांधी के कार्यकाल में भी उन्हें पर्यटन और नागरिक उड्डयन विभाग में राज्य मंत्री के रूप में जिम्मेदारी मिली.
गहलोत ने कहा कि उस दौर में भी उनके खिलाफ बेंगलुरु में टाटा के साथ होटल खोलने, ग्रेनाइट फैक्ट्री लगाने, मुंबई में कारों का बेड़ा होने और चेन्नई में संपत्ति से जुड़े आरोप लगाए गए थे.
उन्होंने इन आरोपों को अपने राजनीतिक जीवन का पुराना हिस्सा बताते हुए कहा कि इसके बावजूद उनका राजनीतिक सफर लगातार आगे बढ़ता रहा. वह केंद्र में मंत्री रहे, राजस्थान में तीन बार मुख्यमंत्री बने और संगठन में भी कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं.
फेयरमोंट होटल के स्वामित्व के आरोपों पर दी सफाई
अशोक गहलोत ने जयपुर के फेयरमोंट होटल का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि इस होटल का मालिकाना हक उनके परिवार के पास होने के आरोप लगाए जाते हैं, जबकि उनका दावा है कि होटल में उनका एक नया पैसा भी निवेश नहीं है.
गहलोत ने बातचीत में बताया कि कई बार लोग उनसे होटल में शादी समारोह के लिए किराया कम करवाने की बात भी करते हैं. इस पर उन्हें स्पष्ट करना पड़ता है कि होटल में उनका कोई निवेश या मालिकाना हक नहीं है.उन्होंने कहा कि होटल उनके एक परिचित का है और उसके मालिक भी उनके पास मौजूद थे.
यहां भी गहलोत ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को गलत बताते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की.
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मुख्यमंत्री के बयान से पीड़ा होने की बात कही
बातचीत के अंतिम हिस्से में गहलोत ने राजस्थान के मुख्यमंत्री की ओर से की गई टिप्पणियों का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री की बातें सुनकर उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोई बड़ा धक्का नहीं लगा, लेकिन पीड़ा जरूर हुई.
गहलोत ने इसकी वजह बताते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के साथ उनका कुछ लगाव और प्रेम रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों का सम्मान किसी पार्टी विशेष तक सीमित नहीं होना चाहिए.
उनके मुताबिक, इन पदों पर बैठे व्यक्तियों का सम्मान करना प्रदेशवासियों की जिम्मेदारी है और वह आगे भी इस परंपरा का पालन करते रहेंगे.
लोकतंत्र की लड़ाई या राजनीतिक जवाबी अभियान?
अशोक गहलोत के इस बयान में दो प्रमुख राजनीतिक मुद्दे सामने आते हैं। पहला, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच जारी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप.दूसरा, विपक्ष के आंदोलनों के जवाब में सत्ताधारी दल की ओर से रैलियां आयोजित करने की रणनीति.
लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों को अपनी बात रखने, रैलियां करने और राजनीतिक अभियान चलाने का अधिकार है. लेकिन ऐसे आयोजनों के बीच असली सवाल यह भी है कि राजनीतिक दल लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं और जनता से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात तथ्यों और जवाबदेही के साथ कितनी मजबूती से रखते हैं.
गहलोत का बयान इसी राजनीतिक बहस को एक बार फिर चर्चा में लाता है. अब देखना होगा कि भाजपा इन सवालों पर क्या प्रतिक्रिया देती है और लोकतंत्र बचाने के नाम पर चल रही राजनीतिक रैलियों की यह प्रतिस्पर्धा आगे क्या मोड़ लेती है.
समाचार स्रोत का आधार: अशोक गहलोत के आधिकारिक X अकाउंट से साझा बयान एवं उपलब्ध बातचीत के मूल अंश. लेख में उनके आरोपों और दावों को उनके वक्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

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