जहरीली हवा और सामाजिक असमानता: क्या साफ हवा भी अमीरों का अधिकार है?

| BY

Ajit Kumar

बिहार
जहरीली हवा में सांस लेते गरीब लोग और एयर प्यूरीफायर से सुरक्षित अमीर परिवार

वायु प्रदूषण का खतरा सबके लिए है, लेकिन इससे बचाव के साधन हर किसी के पास नहीं हैं। गरीब और वंचित तबकों के सामने यह चुनौती और गंभीर हो जाती है

तीसरा पक्ष ब्यूरोः जहरीली हवा से बचने के लिए अमीर लोग अपने घरों और दफ्तरों में एयर प्यूरीफायर लगा सकते हैं, महंगे मास्क खरीद सकते हैं और जरूरत पड़ने पर प्रदूषण से प्रभावित इलाकों से दूर भी जा सकते हैं. लेकिन उस गरीब परिवार का क्या, जिसके पास न एयर प्यूरीफायर खरीदने की क्षमता है और न ही प्रदूषण से बचने के लिए अपना घर बदलने का विकल्प?

वायु प्रदूषण का संकट केवल पर्यावरण और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है.यह सामाजिक और आर्थिक असमानता का भी गंभीर सवाल है. हवा सबके लिए एक जैसी दिखाई देती है, लेकिन उससे बचने के संसाधन सबके पास समान नहीं हैं. यही अंतर इस समस्या को और चिंताजनक बनाता है.

प्रियंका भारती ने उठाया साफ हवा पर सामाजिक असमानता का सवाल

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) से जुड़ी प्रियंका भारती ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट X पर जहरीली हवा और सामाजिक असमानता को लेकर सवाल उठाया है.

उन्होंने लिखा, जहरीली हवा से बचने के लिए पैसे वाले Air Purifier खरीद लेंगे, मगर गरीबों के लिए जहरीली हवा से बचने का क्या उपाय है?

अपने संदेश में उन्होंने साफ हवा को जाति और आर्थिक स्थिति से जोड़ते हुए कहा कि जाति के पिरामिड में नीचे जाने के साथ गरीबी बढ़ती जाती है. ऐसे में शुद्ध हवा भी जाति और अमीरी देखकर मिलने जैसी स्थिति बन रही है.

प्रियंका भारती की इस टिप्पणी का मूल सवाल यह है कि जब प्रदूषण से बचने के निजी साधन बाजार में उपलब्ध हैं, तो क्या स्वच्छ हवा पाने की क्षमता भी व्यक्ति की आर्थिक हैसियत पर निर्भर होती जा रही है?

एयर प्यूरीफायर समाधान है, लेकिन सबकी पहुंच में नहीं

एयर प्यूरीफायर प्रदूषित हवा से बचाव का एक निजी साधन हो सकता है.कमरे के आकार और उपकरण की क्षमता के अनुसार यह घर के भीतर मौजूद कुछ हानिकारक कणों को कम करने में मदद करता है. हालांकि, इसकी खरीद, फिल्टर बदलने और बिजली के खर्च को भी ध्यान में रखना पड़ता है.

मध्यम और उच्च आय वाले परिवारों के लिए इन खर्चों को उठाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है.लेकिन कम आय वाले परिवारों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक बोझ है.

इसके अलावा, हर व्यक्ति पूरे दिन बंद कमरे में नहीं रह सकता.दिहाड़ी मजदूर, निर्माण श्रमिक, सड़क किनारे दुकान लगाने वाले, रिक्शा चालक, ठेला संचालक और खुले वातावरण में काम करने वाले लाखों लोगों को रोजी-रोटी के लिए प्रदूषित हवा के बीच रहना और काम करना पड़ता है.

ऐसे लोगों के सामने केवल एयर प्यूरीफायर खरीदने का सवाल नहीं, बल्कि रोजगार और स्वास्थ्य के बीच चुनाव करने की मजबूरी भी होती है.

वायु प्रदूषण का बोझ सब पर समान नहीं पड़ता

प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और अन्य हानिकारक प्रदूषक सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं.इनके संपर्क में आने से सांस संबंधी बीमारियों, हृदय रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है.

लेकिन प्रदूषण का वास्तविक असर व्यक्ति की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है। जिन लोगों को सड़क किनारे, औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास या अधिक प्रदूषण वाले इलाकों में रहना और काम करना पड़ता है, उनके लिए जोखिम अधिक हो सकता है.

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पास बेहतर आवास, स्वास्थ्य सेवाओं, सुरक्षित कार्यस्थल और प्रदूषण से बचाव के साधनों तक पहुंच भी सीमित हो सकती है.इस कारण एक ही पर्यावरणीय संकट अलग-अलग सामाजिक वर्गों को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है.

जाति और गरीबी का सवाल क्यों महत्वपूर्ण है?

प्रियंका भारती ने अपनी टिप्पणी में जाति के पिरामिड का उल्लेख करके पर्यावरणीय असमानता को सामाजिक संरचना से जोड़ने की कोशिश की है.

भारत में जाति और आर्थिक स्थिति के बीच संबंधों पर चर्चा लंबे समय से होती रही है. ऐतिहासिक और सामाजिक वंचनाओं के कारण कुछ समुदायों को बेहतर शिक्षा, रोजगार, आवास और संसाधनों तक पहुंच बनाने में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

हालांकि, यह कहना उचित नहीं होगा कि हर गरीब व्यक्ति किसी एक जाति से है या हर वंचित समुदाय एक जैसी परिस्थितियों में रहता है. लेकिन यह सवाल जरूर महत्वपूर्ण है कि क्या सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों को स्वच्छ पर्यावरण और स्वास्थ्य सुविधाओं का समान लाभ मिल पा रहा है?

पर्यावरणीय न्याय का अर्थ भी यही है कि किसी व्यक्ति की जाति, आय, पेशे या रहने के स्थान के आधार पर उसके स्वच्छ हवा और सुरक्षित जीवन के अधिकार में अंतर नहीं होना चाहिए.

सरकार की जिम्मेदारी केवल प्रदूषण से बचाव के उपाय बताना नहीं

वायु प्रदूषण से निपटने के लिए लोगों को मास्क पहनने, घरों में एयर प्यूरीफायर लगाने या बाहर निकलने से बचने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है. ये व्यक्तिगत बचाव के उपाय हैं, जबकि प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान सामूहिक और सरकारी प्रयासों से ही संभव है.

सरकारों को प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण, सार्वजनिक परिवहन में सुधार, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, औद्योगिक उत्सर्जन की निगरानी और कचरा जलाने पर प्रभावी रोक जैसे कदम उठाने की जरूरत है.

इसके साथ ही गरीब बस्तियों, श्रमिकों और अधिक प्रदूषण वाले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक सुरक्षा के इंतजाम मजबूत करने होंगे.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वच्छ हवा को केवल बाजार से खरीदी जाने वाली सुविधा नहीं, बल्कि नागरिकों के लिए जरूरी सार्वजनिक संसाधन मानकर नीतियां बनाई जाएं.

ये भी पढ़े :CEC चयन विवाद पर खड़गे का हमला, मोदी सरकार पर उठाए सवाल
ये भी पढ़े :6 दिसंबर को लखनऊ चलो: बसपा ने शुरू की विशाल श्रद्धांजलि समारोह की तैयारी

साफ हवा पर सबका बराबर अधिकार होना चाहिए

प्रियंका भारती की टिप्पणी एक ऐसे मुद्दे को सामने लाती है, जिस पर अक्सर पर्यावरण प्रदूषण की चर्चा के दौरान पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता .प्रदूषण से बचने की जिम्मेदारी केवल नागरिकों पर नहीं डाली जा सकती, खासकर तब जब उनके पास बचाव के साधन खरीदने की आर्थिक क्षमता ही न हो.

सवाल यह नहीं है कि अमीर लोग एयर प्यूरीफायर क्यों खरीद रहे हैं.सवाल यह है कि गरीबों को स्वच्छ हवा में सांस लेने के लिए निजी उपकरणों और अपनी आर्थिक हैसियत पर निर्भर क्यों रहना पड़े?

लोकतंत्र में शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन की तरह स्वच्छ पर्यावरण भी हर नागरिक के लिए महत्वपूर्ण है.हवा किसी की निजी संपत्ति नहीं है और न ही उसे जाति या अमीरी के आधार पर बांटा जाना चाहिए.

आखिरकार, असली विकास तभी माना जाएगा, जब किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति यह तय न करे कि उसे साफ हवा मिलेगी या जहरीली हवा में ही जीवन गुजारना पड़ेगा.

समाचार स्रोत का आधार
प्रियंका भारती के आधिकारिक X अकाउंट (@priyanka2bharti) पर प्रकाशित पोस्ट.लेख में उनके बयान और उससे जुड़े सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय पहलुओं का विश्लेषण किया गया है.

Trending news

Leave a Comment