तेजस्वी यादव ने बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई की मांग उठाई
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना:बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने के बाद दल-बदल कानून को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने दोनों नवनिर्वाचित विधान पार्षदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है. उनका आरोप है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करना संविधान की दसवीं अनुसूची का उल्लंघन है.
विवाद के केंद्र में तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित बंशीधर ब्रजवासी और सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से निर्वाचित डॉ. राहुल राज हैं. दोनों ने हालिया विधान परिषद चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत दर्ज की थी. 31 अक्टूबर 2026 को पटना स्थित भाजपा कार्यालय में दोनों के पार्टी में शामिल होने की खबर सामने आई.इस घटनाक्रम के बाद बिहार में राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है.
तेजस्वी यादव ने संविधान की दसवीं अनुसूची का दिया हवाला
तेजस्वी यादव ने इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना दल-बदल विरोधी कानून के दायरे में आता है.
उनके अनुसार, संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े बिना यानी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित होता है और चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो वह सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य हो सकता है.
तेजस्वी यादव ने इसी प्रावधान के आधार पर बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई की मांग की है.उनका कहना है कि दोनों के भाजपा में शामिल होने के मामले में संविधान के प्रावधानों के अनुसार तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए.
क्या कहता है संविधान का अनुच्छेद 191(2)?
संविधान का अनुच्छेद 191(2) राज्य विधानमंडल के सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित है. इसके अनुसार, यदि किसी सदस्य को संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य घोषित किया जाता है, तो वह राज्य के विधानमंडल का सदस्य बने रहने के योग्य नहीं होगा.
वहीं, दसवीं अनुसूची के पैरा 6(1) के अनुसार, दल-बदल के आधार पर किसी सदस्य की अयोग्यता से जुड़े प्रश्न पर निर्णय लेने का अधिकार संबंधित सदन के सभापति या अध्यक्ष को होता है.
इस मामले में बिहार विधान परिषद के सभापति को शिकायत और संबंधित तथ्यों के आधार पर निर्णय लेना होगा.हालांकि, अभी दोनों विधान पार्षदों की सदस्यता रद्द होने का कोई अंतिम संवैधानिक निर्णय सामने नहीं आया है.
राहुल राज का 15 दिन वाला तर्क भी चर्चा में
इस पूरे विवाद में राहुल राज का पक्ष भी महत्वपूर्ण है.PTI की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल राज ने दावा किया कि नियमों के तहत चुनाव के 15 दिनों के भीतर किसी राजनीतिक दल की सदस्यता लेने पर निर्दलीय एमएलसी को उस दल का अधिकृत उम्मीदवार माना जा सकता है.
हालांकि, संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 2(2) के मूल पाठ में निर्दलीय निर्वाचित सदस्य के लिए ऐसी 15 दिनों की छूट का स्पष्ट उल्लेख नहीं है.इसलिए इस दावे की संवैधानिक और कानूनी व्याख्या भी विवाद का अहम हिस्सा बन सकती है.
बीजेपी पर संविधान और लोकतंत्र को लेकर तेजस्वी का हमला
तेजस्वी यादव ने इस मामले को केवल दो विधान पार्षदों के भाजपा में शामिल होने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बीजेपी पर संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ मनमानी करने का आरोप लगाया है.
उन्होंने अपने बयान में कहा कि जब भाजपा के किसी विधायक को अदालत से सजा होती है, तब उसकी सदस्यता समाप्त करने के मामले में अलग रवैया अपनाया जाता है. उन्होंने साहेबगंज के विधायक राजू सिंह का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि विपक्षी दलों के विधायकों को अपने पाले में लाने के मामलों में भी लिखित शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं की जाती.
तेजस्वी यादव का आरोप है कि बीजेपी सत्ता और राजनीतिक लाभ के अनुसार संवैधानिक नियमों की व्याख्या करती है. उन्होंने भाजपा और आरएसएस को संविधान तथा लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुश्मन बताया है.
यह उनके राजनीतिक बयान और आरोप हैं। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का जवाब और संबंधित मामलों के आधिकारिक रिकॉर्ड भी महत्वपूर्ण होंगे.
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बिहार की राजनीति में क्यों अहम है यह विवाद?
बिहार विधान परिषद में दो निर्दलीय सदस्यों का भाजपा के साथ आना राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. दोनों ने उन निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की थी, जहां एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू के उम्मीदवार भी चुनाव मैदान में थे.
ऐसे में इस घटनाक्रम से दो स्तरों पर सवाल उठ रहे हैं.
- क्या निर्दलीय निर्वाचित विधान पार्षदों का किसी राजनीतिक दल में शामिल होना दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता का आधार बनेगा?
- क्या विधान परिषद के सभापति इस मामले में तेजस्वी यादव की मांग पर कार्रवाई करेंगे?
- राहुल राज के 15 दिनों वाले तर्क का संवैधानिक आधार क्या है?
- क्या इस विवाद से बिहार में बीजेपी और जेडीयू के बीच राजनीतिक संबंधों पर भी असर पड़ेगा?
इन सवालों का जवाब संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और सभापति के निर्णय से ही स्पष्ट होगा.
निष्कर्ष
बंशीधर ब्रजवासी और राहुल राज के भाजपा में शामिल होने के बाद बिहार की राजनीति में दल-बदल कानून को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस शुरू हो गई है.तेजस्वी यादव ने दोनों की सदस्यता रद्द करने की मांग उठाकर इस मुद्दे को राजनीतिक और कानूनी चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बिहार विधान परिषद के सभापति इस मामले में क्या फैसला लेते हैं। क्या संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दोनों विधान पार्षदों के खिलाफ अयोग्यता की कार्रवाई होगी या उनके पक्ष में कोई अलग कानूनी व्याख्या सामने आएगी? इस पर सबकी नजर रहेगी.

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