हुल दिवस :आदिवासी वीरों के इतिहास को कोई मिटा नहीं सकता:तेजस्वी

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kmSudha

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हुल दिवस :आदिवासी वीरों के इतिहास को कोई मिटा नहीं सकता:तेजस्वी

चकाई में सिदो-कान्हू प्रतिमा का अनावरण,किया आदिवासी वीरों को नमन

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना :बिहार के जमुई जिले का चकाई प्रखंड में सोमवार को एक ऐतिहासिक क्षण का गवाह बना, जहां हुल दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में सिदो-कान्हू की प्रतिमा का अनावरण किया गया. इस अवसर पर बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने शिरकत कर जनसभा को संबोधित किया और आदिवासी क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि दी.

चकाई में सिदो-कान्हू प्रतिमा का अनावरण,किया आदिवासी वीरों को नमन

कार्यक्रम का माहौल बेहद जोश और सम्मान से भरा हुआ था. हजारों की संख्या में स्थानीय लोग, आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधि और युवा वर्ग मौजूद था. हर चेहरा गौरव से भरा हुआ था — अपने पूर्वजों के बलिदान की याद में.सिदो और कान्हू दो ऐसे नाम हैं, जो भारत के प्रथम आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम (1855 – संथाल विद्रोह) के नायक रहे.उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ जनआंदोलन छेड़ा और आदिवासी समाज को संगठित कर अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई लड़ी.

आदिवासी वीरों को नमन

तेजस्वी यादव ने अपने संबोधन में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की और कहा कि सिदो-कान्हू जैसे वीरों के संघर्ष और बलिदान को भुलाया नहीं जा सकता. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जब राजद की सरकार बनेगी, तो “हुल दिवस” को राजकीय मान्यता देते हुए भव्य मेला आयोजित किया जाएगा, जिससे आदिवासी संस्कृति को उचित सम्मान मिल सके.

सिदो-कान्हू जैसे वीरों ने इतिहास नहीं, भविष्य लिखा

सिदो-कान्हू जैसे वीरों ने इतिहास नहीं, भविष्य लिखा

अपने भाषण में तेजस्वी यादव ने कहा,
ब्रिटिश हुकूमत के अन्याय और शोषण के खिलाफ सबसे पहले आवाज़ उठाने वाले सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसे वीरों को हम कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने सिर्फ विद्रोह नहीं किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को सम्मान से जीने का हक दिलाया.

तेजस्वी ने यह भी याद दिलाया कि उनके पिता, श्री लालू प्रसाद यादव, ने इन वीरों के सम्मान में दुमका में सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, और कई जगह उनकी प्रतिमाएं लगवाकर इतिहास को जीवित रखने का प्रयास किया था.

सिदो-कान्हू: जिनके गर्जन से हिल गया था ब्रिटिश साम्राज्य

तेजस्वी यादव ने सभा को संबोधित करते हुए कहा,
ब्रिटिश हुकूमत के अत्याचार के खिलाफ पहली संगठित जनक्रांति करने वाले सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और फूलो-झानो जैसे वीरों की कुर्बानी इतिहास की अमूल्य धरोहर है.ये सिर्फ नाम नहीं, हमारे स्वाभिमान की पहचान हैं.उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज ने स्वतंत्रता संग्राम में सबसे पहले अपनी जान की बाज़ी लगाई, लेकिन उनके योगदान को लंबे समय तक नजरअंदाज़ किया गया.

हमारी सरकार बनी तो हुल दिवस पर होगा राजकीय मेला

सभा के दौरान तेजस्वी यादव ने यह महत्वपूर्ण घोषणा की कि राजद की सरकार बनने पर हुल दिवस के मौके पर जमुई में राजकीय मेला आयोजित किया जाएगा, ताकि आदिवासी समाज की संस्कृति, इतिहास और योगदान को राज्य स्तर पर उचित मान्यता दी जा सके.

सिदो-कान्हू विश्वविद्यालय का उल्लेख

सिदो-कान्हू विश्वविद्यालय का उल्लेख

इस अवसर पर उन्होंने लालू प्रसाद यादव द्वारा स्थापित ‘सिदो-कान्हू विश्वविद्यालय’ की भी चर्चा की, जो आदिवासी शिक्षा और चेतना के क्षेत्र में एक मील का पत्थर माना जाता है। तेजस्वी ने कहा कि यह विश्वविद्यालय राजद की आदिवासी हितैषी नीतियों का प्रमाण है.

चकाई: आदिवासी स्वाभिमान का प्रतीक

अब चकाई न सिर्फ एक भौगोलिक स्थान है, बल्कि यह आदिवासी स्वाभिमान और चेतना का प्रतीक बनकर उभरा है. तेजस्वी यादव की यह पहल राज्य में आदिवासी समाज की भूमिका और पहचान को मजबूती देने की दिशा में एक ठोस कदम के रूप में देखी जा रही है.

जनसैलाब और सांस्कृतिक उत्सव

जनसैलाब और सांस्कृतिक उत्सव

कार्यक्रम में हजारों की संख्या में स्थानीय लोग शामिल हुए। पारंपरिक आदिवासी गीत, नृत्य और नाटक के माध्यम से सिदो-कान्हू और अन्य वीरों की गाथा प्रस्तुत की गई, जिसने उपस्थित लोगों को भावविभोर कर दिया.

कार्यक्रम की झलकियाँ
प्रतिमा अनावरण के समय पारंपरिक आदिवासी वाद्ययंत्रों की गूंज और लोगों की भावनात्मक प्रतिक्रियाएं माहौल को और भी प्रभावशाली बना रही थीं। बुजुर्गों की आंखों में गर्व था और युवाओं की आंखों में प्रेरणा.

आयोजन की खास बातें

  • प्रतिमा का पारंपरिक विधि से अनावरण
  • आदिवासी युवाओं द्वारा सिदो-कान्हू पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुति
  • आदिवासी महिला समूहों की भागीदारी
  • स्थानीय स्तर पर वीरगाथाओं का पाठ
  • क्यों है हुल दिवस आज भी ज़रूरी?

हुल क्रांति (1855) अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ एक ऐसी चेतना थी, जो सदी भर पहले जगी लेकिन आज भी प्रासंगिक है. यह केवल इतिहास नहीं, आदिवासी समाज की पहचान, आत्मसम्मान और अस्तित्व की लड़ाई का प्रतीक है.

इसलिए जब नेता मंच से यह वादा करते हैं कि वे इस गौरव को सरकारी मान्यता दिलाएंगे, तो यह सिर्फ एक घोषणा नहीं — एक पीढ़ी के संघर्ष का सम्मान होता है.

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