चुनाव आयोग की नीयत पर सवाल, दीपंकर भट्टाचार्य का बड़ा आरोप

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Ajit Kumar

बिहार
चुनाव आयोग की नीयत पर सवाल, दीपंकर भट्टाचार्य का बड़ा आरोप

वोट चोर गद्दी छोड़: पटना से उठी जनसुनवाई की हुंकार

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 25 अगस्त 2025 —चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और एसआईआर, प्रक्रिया को लेकर आज पटना में एक बड़ा राजनीतिक हमला देखने को मिला है. जब भाकपा-माले के महासचिव का. दीपंकर भट्टाचार्य ने एक संवाददाता सम्मेलन में चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने का गंभीर आरोप लगाया है.

वोट चोर गद्दी छोड़: पटना से उठी जनसुनवाई की हुंकार

भट्टाचार्य ने स्पष्ट कहा है कि, आयोग ने अदालत के समक्ष जानबूझकर आधे-अधूरे तथ्य रखे हैं.उनके साथ मंच पर मौजूद थे माले राज्य सचिव कुणाल, पोलित ब्यूरो सदस्य धीरेन्द्र झा, एमएलसी शशि यादव, और समकालीन लोकयुद्ध के संपादक संतोष सहर.

आयोग की भूमिका पर सवाल

22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का हवाला देते हुए भट्टाचार्य ने कहा कि आयोग ने यह बताकर अदालत को गुमराह किया कि राजनीतिक दलों के बीएलए, निष्क्रिय हैं.आयोग के अनुसार, एक बीएलए प्रतिदिन 10 आपत्तियाँ दर्ज कर सकता है और प्रदेश भर में 1.6 लाख बीएलए हैं,तो संभावित रूप से प्रतिदिन 16 लाख आपत्तियाँ हो सकता हैं.

सच्चाई यह है कि 18 अगस्त को ही राजनीतिक दलों को विलोपन सूची उपलब्ध कराया गया था.भट्टाचार्य ने कहा कि, तो चार दिन में लाखों आपत्तियाँ दर्ज करने की उम्मीद रखना असंभव है.

भाजपा के बीएलए सबसे अधिक, फिर आपत्तियाँ क्यों नहीं?

आंकड़ों के अनुसार, भाजपा के पास लगभग 60,000 बीएलए हैं.भट्टाचार्य ने चुभता हुआ सवाल उठाया है कि — क्या इन लाखों में से भाजपा को एक भी नाम आपत्तिजनक नहीं लगा? या फिर एसआईआर की पूरी प्रक्रिया भाजपा को ही फायदा पहुँचाने के लिए गढ़ी गई है?

उन्होंने यह भी बताया कि माले के पास करीब 2,500 बीएलए हैं.जिनमें से 1,000 अब भी पेंडिंग रखे गए हैं — यानी उन्हें मान्यता नहीं मिला है.

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गड़बड़ियों की फेहरिस्त: एक कवि का नाम त्रिशंकु में

भोजपुर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है — कृष्ण दयाल सिंह, एक वरिष्ठ भोजपुरी कवि, जिन्होंने 2024 में मतदान किया था, न विलोपित सूची में हैं. न ही ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में. उनका नाम ही गायब है. जबकि उनका वैध वोटर ID (EPIC No. MTH1209998) मौजूद है.

भट्टाचार्य ने इसे त्रिशंकु मतदाता की नई श्रेणी बताया और चुनाव आयोग से इस पर स्पष्टता की मांग किये.

महिलाओं का वोट ज्यादा कटा — मंशा पर सवाल

चौंकाने वाला एक और आंकड़ा सामने आया है — ‘स्थायी रूप से शिफ्टेड’ श्रेणी में विलोपित नामों में महिलाओं की संख्या पुरुषों से 7 लाख अधिक है. भट्टाचार्य ने कहा कि यह आंकड़ा अविश्वसनीय और अस्वाभाविक है.क्या यह मान लिया जाए कि महिलाओं का माइग्रेशन पुरुषों से ज्यादा हो गया है? या फिर कहीं गुप्त रूप से पुरुषों के नाम पहले ही हटा लिए गए थे और अब बारी महिलाओं की है?

आंदोलन की दो बड़ी जीतें, पर खतरा बरकरार

भट्टाचार्य ने माना कि दस्तावेज की मांग रोकना और 98% लोगों के दस्तावेज मिलना आंदोलन की दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं. फिर भी 2% यानी करीब 15 लाख मतदाताओं के दस्तावेज आज भी अधूरे हैं.

इसके अलावा, आयोग यह स्पष्ट नहीं कर रहा कि जो लगभग 3 लाख फॉर्म-6 भरे गए हैं. वे नए मतदाताओं के हैं या हटाए गए लोगों की पुनः प्रविष्टि के लिए.

समयसीमा बढ़ाने की मांग

18 अगस्त को जब विलोपन सूची जारी किया गया और 31 अगस्त अंतिम तिथि तय कर दिया गया.तब सवाल उठता है कि प्रवासी मजदूर या ग्रामीण इलाकों के लोग आपत्ति कैसे दर्ज करेंगे?

भट्टाचार्य ने इस समयसीमा को अपर्याप्त और असंवेदनशील करार देते हुए इसे बढ़ाने की मांग किया है .

25 सितंबर को फिर एक ड्राफ्ट लिस्ट — सिर्फ 5 दिन की मोहलत

अगली सूची 25 सितंबर को आएगी और केवल 5 दिनों के अंदर आपत्ति दर्ज करनी होगी. इतनी बड़ी जनसंख्या और इतने व्यापक क्षेत्र में फैली विसंगतियों के लिए यह समय बेहद कम है.

वोट चोर गद्दी छोड़: आंदोलन की अगली पुकार

भट्टाचार्य ने दो टूक कहा —पूरे बिहार से लेकर देशभर में एक नारा गूंज रहा है — वोट चोर गद्दी छोड़ .
लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह लड़ाई एक दिन की नहीं है — हमें हर मोर्चे पर, हर स्तर पर, हर नागरिक को साथ लेकर लड़ना होगा.

निष्कर्ष

चुनाव आयोग की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर माले ने जो सवाल खड़े किए हैं. वे न केवल बिहार बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र को झकझोरते हैं.
अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इन गंभीर आरोपों और तथ्यों पर क्या रुख अपनाते हैं — और क्या वाकई आम मतदाता का अधिकार सुरक्षित रह पाएगा.

जनता से अपील
भाकपा-माले ने सभी मतदाताओं से सजग और सतर्क रहने की अपील की है —
यह सिर्फ वोट की लड़ाई नहीं, यह लोकतंत्र की असल परीक्षा है.

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