महिला आरक्षण कानून को जनगणना और परिसीमन से अलग कर तुरंत लागू करने की मांग तेज
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना16 अप्रैल 2026: महिला आरक्षण कानून को लेकर एक बार फिर देश की राजनीति और सामाजिक संगठनों में बहस तेज हो गई है.संसद में चल रहे विशेष सत्र के बीच अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) ने स्पष्ट रूप से मांग की है कि महिला आरक्षण कानून को बिना किसी शर्त के तुरंत लागू किया जाए। संगठन का कहना है कि जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं को इससे जोड़ना महिलाओं के अधिकारों को टालने की रणनीति है.
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा पहले पारित किए गए नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में महिला आरक्षण को लागू करने के लिए 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन को आधार बनाया गया था. अब सरकार इस कानून में संशोधन करने के लिए संसद में नया विधेयक लेकर आई है.
ऐपवा का आरोप है कि यह संशोधन महिलाओं को तत्काल लाभ देने के बजाय राजनीतिक गणित साधने की कोशिश है.संगठन का मानना है कि अगर सरकार चाहती तो 2024 के चुनाव से ही महिला आरक्षण लागू किया जा सकता था.
जनगणना और परिसीमन को जोड़ना क्यों विवादित?
ऐपवा के अनुसार, महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ना पूरी तरह से अनुचित है.
जनगणना एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका सीधा संबंध प्रतिनिधित्व से नहीं है.
परिसीमन एक जटिल राजनीतिक प्रक्रिया है, जिसमें सीटों का पुनर्निर्धारण होता है.
संगठन का तर्क है कि इन दोनों को महिला आरक्षण से जोड़ने का मतलब है कि कानून को अनिश्चितकाल तक टालना.
सीटों में 50% बढ़ोतरी का क्या मतलब?
सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन विधेयक के तहत संसद और विधानसभाओं की सीटों में लगभग 50% तक बढ़ोतरी की बात कही जा रही है.
ऐपवा का कहना है कि इससे देश के संघीय ढांचे पर असर पड़ेगा. विशेष रूप से,
दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों का प्रतिनिधित्व घट सकता है.
जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण से क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ेगा.
राजनीतिक शक्ति का झुकाव कुछ राज्यों की ओर हो सकता है.
इस वजह से दक्षिण भारत के कई हिस्सों में इसका विरोध भी सामने आ रहा है.
महिलाओं के लिए 33% आरक्षण बनाम 50% सीट वृद्धि
एक और बड़ा सवाल यह उठाया गया है कि जब कुल सीटों में 50% तक वृद्धि की जा रही है, तो महिलाओं को केवल 33% आरक्षण ही क्यों दिया जा रहा है?
ऐपवा के अनुसार, यह असंतुलन सरकार की नीयत पर सवाल खड़ा करता है. संगठन का मानना है कि महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए अधिक व्यापक और स्पष्ट नीति की जरूरत है.
केंद्र शासित प्रदेशों पर भी चिंता
सरकार द्वारा लाए गए केंद्र शासित प्रदेश विधेयक को लेकर भी संगठन ने चिंता जताई है.
ऐपवा का आरोप है कि इस प्रस्ताव के जरिए केंद्र सरकार नए केंद्र शासित क्षेत्रों का निर्माण कर सकती है, जिससे राजनीतिक और सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है.
संगठन ने इसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि इस तरह के निर्णय व्यापक सहमति और पारदर्शिता के साथ ही लिए जाने चाहिए.
30 साल का संघर्ष और आज की मांग
महिला आरक्षण का मुद्दा कोई नया नहीं है.पिछले करीब 30 वर्षों से देशभर में महिलाएं और विभिन्न संगठन इसके लिए संघर्ष कर रहे हैं.
ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी और राष्ट्रीय अध्यक्ष ई रति राव ने कहा कि,
महिला आरक्षण लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम है.
नीति निर्धारण संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी जरूरी है.
यह सिर्फ प्रतिनिधित्व नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा है.
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सांसदों से अपील
ऐपवा ने देश के सभी सांसदों से अपील की है कि वे महिला आरक्षण कानून को जनगणना और परिसीमन से अलग कर तुरंत लागू करवाएं.
संगठन का कहना है कि,
यह महिलाओं के अधिकारों का सवाल है.
इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए.
संसद को इस ऐतिहासिक अवसर का सही उपयोग करना चाहिए.
निष्कर्ष
महिला आरक्षण कानून को लेकर जारी यह बहस केवल एक विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़ा सवाल है. एक तरफ सरकार इसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ सामाजिक संगठन इसे तुरंत लागू करने की मांग कर रहे हैं.
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संसद में चल रही बहस का अंतिम परिणाम क्या निकलता है—क्या महिलाओं को उनका अधिकार बिना शर्त मिलेगा, या फिर यह मुद्दा फिर से लंबी प्रक्रिया में उलझ जाएगा.

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