रुपया 90 के पार: क्या मोदी सरकार की आर्थिक नीतियाँ देश को महँगाई के गहरे कुएँ में धकेल रही हैं?

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Ajit Kumar

भारत
रुपया 90 के पार: क्या मोदी सरकार की आर्थिक नीतियाँ देश को महँगाई के गहरे कुएँ में धकेल रही हैं?

सुप्रिया श्रीनेत के X पोस्ट के हवाले से विस्तृत विश्लेषण

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,3 दिसंबर 2025— बीते एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों से गुज़री है, लेकिन 2025 का साल रुपये की गिरावट के लिए खास तौर पर दर्ज किया जा रहा है. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत (@SupriyaShrinate) ने अपने हालिया X (Twitter) पोस्ट में प्रधानमंत्री और उनकी आर्थिक नीतियों पर कड़ा प्रहार किया है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार न केवल रुपये को बचाने में विफल रही है, बल्कि इसकी गिरावट पर भ्रामक तर्क देकर आम जनता को भ्रमित कर रही है.

उनका दावा है कि 2014 में रुपये का मूल्य 58.86 प्रति डॉलर था, जिसे वर्तमान सरकार ने 90 के पार पहुँचा दिया है. यह न केवल आर्थिक विफलता है बल्कि देश की वैश्विक साख पर भी गहरा असर डालने वाली स्थिति है.

2014 में मिला था 58.86 का रुपया, 2025 में पहुँचा 90+ पर

सुप्रिया श्रीनेत याद दिलाती हैं कि स्वयं प्रधानमंत्री ने कहा था कि,
रुपया गिरता है तो प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा भी गिरती है.

अगर यही कसौटी लागू की जाए, तो आज रुपये की हालत चिन्ता पैदा करती है.डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहा रुपया सिर्फ संख्या का खेल नहीं है; यह देश की आर्थिक स्थिरता, नीति-सक्षम क्षमता और अंतरराष्ट्रीय भरोसे का सूचक भी है.

2025 में रूपया 90 के पार, यानी ऐतिहासिक गिरावट दर्ज कर चुका है. सरकार की नीतियाँ इस कमजोरी को रोकने में असफल दिखती हैं.

विदेशी निवेशकों का भरोसा क्यों टूट रहा है?

सुप्रिया श्रीनेत द्वारा साझा किए गए आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि विश्व बाजार में भारत की स्थिति कितनी अस्थिर हो चुकी है.

2025 में FPIs ने भारत से $23.5 बिलियन (लगभग ₹2 लाख करोड़) निकाल लिए.

यह भारत की वित्तीय सेहत पर निवेशकों के घटते भरोसे को दर्शाता है.

भारत में नीतिगत अस्थिरता, बढ़ती महंगाई, राजनीतिक जोखिम और वैश्विक व्यापार तनाव निवेशकों के नुकसान की मुख्य वजह हैं.

जब विदेशी निवेशक पैसे निकालते हैं, तो मुद्रा पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है, और यही रुपये के गिरने का एक बड़ा कारण है.

अमेरिकी टैरिफ और असफल ट्रेड डील: झटका अर्थव्यवस्था को

अमेरिका द्वारा कई भारतीय उत्पादों पर बढ़ाए गए टैरिफ ने व्यापार संतुलन को बिगाड़ दिया है.
इसके साथ ही भारत-अमेरिका व्यापार समझौता लंबे समय से अधर में है.

इन दोनों कारणों से.

निर्यात कमजोर हुआ

आयात महंगा पड़ा

डॉलर की मांग और बढ़ी

और इस सबका सीधा असर रुपये की कीमत पर दिखाई दिया

साधारण शब्दों में—ट्रेड पॉलिसी का फेलियर रुपये की गिरावट का बड़ा कारण है.

बढ़ता इंपोर्ट बिल और ट्रेड डेफिसिट

श्रीनेत बताती हैं कि April–October 2025 के बीच भारत का इंपोर्ट बिल $650 बिलियन (लगभग ₹58 लाख करोड़) पहुँच चुका है, जो पिछले वर्ष से 10% अधिक है.

ट्रेड डेफिसिट बढ़ने के असर.

देश को अधिक डॉलर की आवश्यकता

विदेशी मुद्रा भंडार पर लगातार दबाव

रुपया और कमजोर

सरकार यह दावा करती है कि सभी करेंसी गिर रही हैं, लेकिन तथ्य यह है कि,
भारतीय रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली करेंसी बन चुका है.

RBI के दखल का भी नहीं पड़ा असर

रुपये को बचाने के लिए RBI ने इस साल $40–42 बिलियन खर्च किए.
परंतु रुपये की गिरावट लगातार जारी है.

इसका मतलब है कि,

मौद्रिक हस्तक्षेप सीमित प्रभाव दे रहा हैं

समस्या की जड़ आर्थिक नीति में है, न कि केवल मार्केट उतार-चढ़ाव में

रुपये की गिरावट का असर आम जनता की जेब पर

सरकार अक्सर यह संदेश देती है कि रुपये की कमजोरी से घबराने की ज़रूरत नहीं है.
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है.

महंगा होगा कच्चा तेल — महंगी होगी रोजमर्रा की जिंदगी

    देश कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है

    तेल महंगा होगा तो सब्ज़ी, फल, परिवहन, बिजली—सबकी कीमतें बढ़ेंगी

    EMI बढ़ जाएगी

      महंगाई बढ़ने पर RBI ब्याज दरें बढ़ाता है.
      इसका मतलब है कि,

      आपकी होम लोन EMI,कार/बाइक EMI,पर्सनल लोन EMI सब बढ़ेंगे.

      विदेश में पढ़ाई और यात्रा महंगी

        रुपये के कमजोर होने से,,विश्वविद्यालय फीस,स्टूडेंट रहने का खर्च

        टिकट , होटल , सबकी लागत बढ़ जाएगी.

        आयातित सामान महंगा

          मशीनें, इलेक्ट्रॉनिक्स, गैजेट, मोबाइल, दवाइयाँ—सबका दाम बढ़ेगा.

          संक्षेप में,
          रुपया गिरता है तो आम आदमी की ज़िंदगी महंगी हो जाती है.

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          क्या सरकार वास्तविकता से भाग रही है?

          सुप्रिया श्रीनेत का आरोप है कि सरकार, उसके अर्थशास्त्री और मीडिया रुपये की गिरावट को अच्छी बात बताने पर तुले हुए हैं.
          लेकिन डेटा उल्टा सच दिखाता है.

          रुपया सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली एशियाई करेंसी

          बढ़ता ट्रेड डेफिसिट

          घटता विदेशी निवेश

          महंगाई का दबाव

          RBI के हस्तक्षेप का भी सीमित असर

          इन परिस्थितियों में रुपये की कमजोरी को सब ठीक बताना जनता को भ्रमित करना है.

          निष्कर्ष: रुपया गिर रहा है, और असर जनता पर पड़ रहा है

          सुप्रिया श्रीनेत का पोस्ट सिर्फ राजनीतिक कटाक्ष नहीं है—यह भारत की आर्थिक वास्तविकता का कड़वा सच भी उजागर करता है.
          रुपये की गिरावट सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार की हलचल नहीं है; यह सरकार की आर्थिक नीतियों की दिशा और परिणामों पर गंभीर सवाल उठाती है.

          अगर समय रहते नीतिगत बदलाव नहीं हुए, तो,

          महंगाई और बढ़ेगी

          EMI और बढ़ेंगी

          आयात और महंगे होंगे

          और आम आदमी की जेब और खाली होती जाएगी

          रुपये की कमजोरी राष्ट्र की आर्थिक सेहत का आईना है—इसे अनदेखा करना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है.

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