दलितों की आवाज़ और संसद की चुप्पी: क्या लोकतंत्र का यह भी एक चेहरा है?

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Ajit Kumar

भारत
दलितों की आवाज़ और संसद की चुप्पी: क्या लोकतंत्र का यह भी एक चेहरा है?

(Supriya Shrinate के X पोस्ट के हवाले से) जब सवाल हकीकत से टकराते हैं

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,9 दिसंबर 2025 — भारत का लोकतंत्र अपने आपको विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, लेकिन क्या यह लोकतंत्र हर नागरिक को समान अधिकार और समान सम्मान देता है?
Supriya Shrinate के एक X (Twitter) पोस्ट ने इसी प्रश्न को तीखा, स्पष्ट और असहज तरीके से सामने ला दिया है.पोस्ट में उन्होंने राज्यसभा की बहस का उल्लेख किया है , जहां चेयरमैन ने मल्लिकार्जुन खरगे से पूछा कि, आपकी प्रॉब्लम क्या है?

यह सवाल जितना सरल दिखता है, उतना ही गंभीर भी है.और उससे भी ज़्यादा गंभीर है खरगे साहब का जवाब—एक समाज की पीड़ा, भेदभाव और दमन की लंबी सूची.

खरगे का जवाब: एक दर्द जिसे देश अनसुना करता रहा

Supriya Shrinate द्वारा उद्धृत खरगे के शब्द केवल राजनीतिक बयान नहीं थे, बल्कि दलित समाज के उन जख्मों की याद दिलाते हैं जो आज भी ताज़ा हैं,

मंदिर में प्रवेश न देना

शादी में घोड़े पर न बैठने देना

गांव के कुएं का पानी पीने से रोक देना

मारपीट, अपमान, बहिष्कार और जातीय प्रताड़ना

ये घटनाएँ इतिहास नहीं—आज भी भारत के कई गांवों में रोज़मर्रा की वास्तविकता हैं.

और जब खरगे ने संसद में यह कहा, तब चेयरमैन का जवाब आया,
Nothing will go on record.

यानी देश के उच्च सदन में भी उस दर्द को दर्ज करने की जगह नहीं!

भारत की सदियों पुरानी सामाजिक बीमारी

दलितों पर अत्याचार का इतिहास लंबा है, और यह दुखद है कि संविधान लागू होने के 75 साल बाद भी यह बीमारी खत्म नहीं हुई है. भारत आज डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्पेस टेक्नोलॉजी और AI के युग की बात करता है, लेकिन,

आज भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर बैठने से रोकने के लिए गांवों में तनाव हो जाता है.

मंदिर प्रवेश को लेकर झगड़े, मारपीट और बहिष्कार की खबरें रोज़ आती हैं.

स्कूलों में बच्चों को जाति के आधार पर अलग बैठाया जाता है.

पंचायतों में दलित प्रतिनिधियों को निर्णय लेने नहीं दिया जाता है.

ये सिर्फ isolated incidents नहीं, बल्कि systematic discrimination हैं.

संसद की भूमिका: सवाल उठाने की जगह या सवाल दबाने की?

संसद लोकतंत्र का मंदिर कहलाती है, लेकिन अगर यहीं दलितों की आवाज़, रद्द होने लगे, तो फिर देश के बाकी हिस्सों में न्याय की उम्मीद कहाँ से की जाए?
Supriya Shrinate ने अपने पोस्ट में जिस तरह इस मुद्दे को सामने रखा है , वह एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि,

क्या संसद केवल सत्ता की सुविधा के अनुसार सुनती है?

ऐसा लगता है कि जब किसी वर्ग के दर्द की बात आती है, तब decorum, rules और parliamentary procedure अचानक ज़रूरी हो जाते हैं. लेकिन जब सत्ता या राजनीति के हित की बात होती है, तब वही नियम ढीले पड़ जाते हैं.

दलितों पर अत्याचार: क्या हम संवेदनशीलता खो चुके हैं?

डेटा और रिपोर्ट्स इस बात की पुष्टि करता हैं कि दलितों के खिलाफ अपराध लगातार बढ़ रहे हैं. जमीन पर कब्जा, सामाजिक बहिष्कार, बलात्कार, मारपीट और हत्या—ये सब आज भी समाज में हो रहे हैं.
लेकिन असली समस्या सिर्फ अपराध नहीं है. असली समस्या है सिस्टम का मौना.

पुलिस में FIR दर्ज नहीं होती है.

पंचायत पक्षपाती होती है.

समाज दबाव बनाता है.

न्याय वर्षों तक टलता रहता है.

ऐसी परिस्थितियों में जब संसद में आवाज़ उठाई जाती है और कहा जाता है— Nothing will go on record
तो यह उन करोड़ों लोगों की आवाज़ को दबाने जैसा है, जो पहले से ही समाज में दबे हुए हैं.

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क्या अब समय आ गया है नए सामाजिक सुधारों का?

भारत को जरूरत है,

नई सामाजिक संवेदनशीलता की,

जातिगत भेदभाव पर सख्त कानूनों के क्रियान्वयन की,

पंचायत स्तर पर जाति-भेद के खिलाफ निगरानी की,

स्कूलों, मंदिरों और सामाजिक संस्थाओं में समानता पर आधारित नए नियमों की,

और सबसे महत्वपूर्ण—सत्ता और संसद में दलित मुद्दों को गंभीरता से सुनने की,

सिर्फ कानून बनाकर समाधान नहीं होगा, जब तक समाज बदलता नहीं.
लेकिन समाज तभी बदलता है जब संसद और सरकार दिशा तय करें.

निष्कर्ष: एक पोस्ट जिसने छिपी हुई सच्चाई को उजागर कर दिया

Supriya Shrinate द्वारा साझा किया गया यह संवाद केवल एक पोस्ट नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र का आईना है.
यह सवाल उठाता है कि,

क्या दलितों की पीड़ा राजनीति के रिकॉर्ड में दर्ज होने लायक नहीं?

क्या लोकतंत्र में सभी की आवाज़ बराबर है, या केवल सत्ता की?

क्या संविधान में लिखे समानता के अधिकार का ज़मीनी अस्तित्व है?

भारत को डिजिटल प्रगति से पहले सामाजिक प्रगति की जरूरत है.
और सामाजिक प्रगति तभी होगी, जब हर आवाज़—चाहे दलित की हो, गरीब की हो या कमजोर की—सिर्फ सुनी ही न जाए बल्कि दर्ज भी की जाए.

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