लोकतंत्र, इतिहास और गरीबों के अधिकार की लड़ाई
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,17 दिसंबर 2025— लोकसभा में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) का नाम बदले जाने को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गया है. कांग्रेस पार्टी ने इसे केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि इतिहास, लोकतांत्रिक सहमति और गरीबों के संवैधानिक अधिकारों पर हमला बताया है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जय प्रकाश (जेपी) द्वारा लोकसभा में दिए गए वक्तव्य को पार्टी ने अपने आधिकारिक X (Twitter) हैंडल से साझा करते हुए केंद्र की भाजपा सरकार पर तीखा हमला बोला है.
यह लेख उसी वक्तव्य के हवाले से मनरेगा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इसके सामाजिक-आर्थिक महत्व और नाम परिवर्तन को लेकर उठे सवालों का तथ्यात्मक व विश्लेषणात्मक विवरण प्रस्तुत करता है.
मनरेगा: 2005 में शुरू हुई ऐतिहासिक पहल
मनरेगा योजना वर्ष 2005 में यूपीए सरकार के दौरान लागू किया गया था. यह केवल एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि एक कानूनी अधिकार था, जिसने ग्रामीण भारत के करोड़ों लोगों को रोजगार की गारंटी दी थी.इस कानून के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को वर्ष में कम से कम 100 दिन का रोजगार देने का प्रावधान किया गया था.
जब यह बिल संसद में लाया गया, तब इसे सीधे पारित नहीं किया गया, बल्कि संसदीय समिति को भेजा गया. वहां सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने इस पर गहन चर्चा की और व्यापक सहमति के बाद इसे संसद में अंतिम रूप से पेश किया गया. यही वजह है कि कांग्रेस इसे भारतीय लोकतंत्र में सहमति से बने कानून का उदाहरण मानती है.
संसद में विरोध और नरेंद्र मोदी का रुख
कांग्रेस का आरोप है कि जब 2005 में मनरेगा पर संसद में चर्चा हो रही थी, तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इस योजना के विरोध में थे.जय प्रकाश के अनुसार, आज वही विचारधारा सत्ता में आकर इस योजना के नाम और स्वरूप को बदलने की कोशिश कर रही है.
कांग्रेस इसे राजनीतिक विरोध से आगे बढ़कर वैचारिक टकराव के रूप में देखती है.जहां एक ओर रोजगार को अधिकार मानने की सोच है, वहीं दूसरी ओर इसे केवल एक सरकारी खर्च के रूप में देखा जा रहा है.
महात्मा गांधी के नाम पर आपत्ति क्यों?
भाजपा सरकार द्वारा मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाने की चर्चा पर कांग्रेस ने कड़ा ऐतराज जताया है. पार्टी का कहना है कि महात्मा गांधी केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सत्य और अहिंसा के प्रतीक हैं.
कांग्रेस के अनुसार, योजना का नाम महात्मा गांधी के नाम पर इसलिए रखा गया था ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि यह योजना गरीबों, दलितों, वंचितों और शोषितों के सम्मान और अधिकार से जुड़ी है.नाम बदलना उस विचारधारा को कमजोर करने की कोशिश है, जो गांधी जी के नाम से जुड़ी हुई है.
जय प्रकाश ने इसे सबसे बड़ा अपराध करार देते हुए कहा कि गांधी जी का नाम हटाना केवल इतिहास से छेड़छाड़ नहीं, बल्कि गरीबों की पहचान और उनके संघर्ष को मिटाने जैसा है.
रोजगार की गारंटी: दुनिया में अनोखा कानून
कांग्रेस का दावा है कि 2005 में मनरेगा लागू होने से पहले पूरी दुनिया में ऐसा कोई कानून नहीं था, जो रोजगार की कानूनी गारंटी देता हो.यह कानून भारत को वैश्विक स्तर पर एक अलग पहचान देता है.
उस समय ग्रामीण भारत में बेरोजगारी चरम पर थी, गांवों से शहरों की ओर तेज पलायन हो रहा था.मनरेगा ने गांवों में ही काम उपलब्ध कराकर इस पलायन को रोकने में अहम भूमिका निभाई.
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मजदूरी और बेरोजगारी भत्ता का प्रावधान
मनरेगा की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि इसमें सिर्फ काम ही नहीं, बल्कि समय पर मजदूरी और बेरोजगारी भत्ता का भी प्रावधान किया गया. यदि किसी व्यक्ति को 15 दिनों के भीतर काम नहीं मिलता था, तो सरकार को बेरोजगारी भत्ता देना पड़ता था.
कांग्रेस का आरोप है कि मौजूदा सरकार इन प्रावधानों को धीरे-धीरे कमजोर कर रही है. भुगतान में देरी, काम के दिनों में कटौती और बजट में कमी को पार्टी गरीब विरोधी नीति का उदाहरण मानती है.
धन्ना सेठों की सरकार का आरोप
जय प्रकाश ने अपने वक्तव्य में भाजपा सरकार को धन्ना सेठों की सरकार बताते हुए कहा कि मौजूदा सत्ता को गरीबों की परेशानियों से कोई मतलब नहीं है. कांग्रेस का आरोप है कि केंद्र सरकार की नीतियां बड़े उद्योगपतियों के हित में हैं, जबकि ग्रामीण मजदूर और गरीब वर्ग उपेक्षित हो रहे हैं.
कांग्रेस का मानना है कि मनरेगा जैसे कानून कमजोर होंगे, तो इसका सीधा असर गांवों की अर्थव्यवस्था, सामाजिक संतुलन और संविधान में निहित समानता के सिद्धांत पर पड़ेगा.
निष्कर्ष: नाम नहीं, सोच का सवाल
मनरेगा का नाम बदलने का मुद्दा केवल शब्दों का विवाद नहीं है, बल्कि यह सोच और दिशा का सवाल है.कांग्रेस इसे गरीबों के अधिकार, गांधीवादी विचारधारा और लोकतांत्रिक सहमति की रक्षा की लड़ाई बता रही है.
लोकसभा में उठी यह बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है, क्योंकि मनरेगा सिर्फ एक योजना नहीं, बल्कि करोड़ों ग्रामीण परिवारों के जीवन और सम्मान से जुड़ा कानून है. सवाल यही है कि,क्या भारत रोजगार को अधिकार के रूप में देखता रहेगा, या इसे धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में धकेल दिया जाएगा?
नोट: यह लेख कांग्रेस @INCIndia के X पोस्ट में साझा किए गए जय प्रकाश के वक्तव्य के आधार पर तैयार किया गया है.

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