5 साल तक इतना बड़ा गोरखधंधा चलता रहा, सरकार को खबर क्यों नहीं लगी?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,24 दिसंबर— उत्तर प्रदेश में एक बार फिर कानून-व्यवस्था और सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया हैं. कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत द्वारा X (पूर्व में ट्विटर) पर उठाए गए सवालों ने उस कथित 500 करोड़ के गोरखधंधे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है, जो कथित रूप से योगी सरकार की नाक के नीचे वर्षों तक फलता-फूलता रहा.
यह मामला सिर्फ एक अपराधी के फरार होने का नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक विफलता, राजनीतिक संरक्षण और निष्पक्ष जांच पर भी सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है.
5 साल तक चलता रहा गोरखधंधा, सरकार अनजान कैसे?
सुप्रिया श्रीनेत का पहला सवाल सबसे बुनियादी है कि,
अगर यह गोरखधंधा जौनपुर, गाजीपुर, कानपुर, गाजियाबाद जैसे जिलों से होते हुए अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क तक फैल चुका था, तो फिर 5 साल तक यूपी सरकार को इसकी भनक क्यों नहीं लगी?
उत्तर प्रदेश में जब छोटी-सी घटना पर तत्काल कार्रवाई का दावा किया जाता है, तब इतना बड़ा नेटवर्क कैसे प्रशासन की नजरों से ओझल रहा?
क्या यह सिर्फ लापरवाही थी या जानबूझकर आंखें मूंद ली गई थीं?
500 करोड़ कमाने वाला आरोपी देश से कैसे भागा?
दूसरा और सबसे गंभीर सवाल यह है कि,
शुभम जायसवाल, जिस पर 500 करोड़ के अवैध कारोबार का आरोप है, उसका नाम सामने आते ही वह देश छोड़कर फरार कैसे हो गया?
यह महज़ संयोग है या फिर उसे भागने का मौका दिया गया?
जब आम नागरिकों को छोटी धाराओं में भी एयरपोर्ट पर रोक लिया जाता है, तब इतना बड़ा आरोपी कैसे सिस्टम से बच निकलता है?
यही सवाल इस केस को और संदिग्ध बना देता है.
500 करोड़ की कमाई, इनाम सिर्फ 50 हजार क्यों?
कानून व्यवस्था की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि
500 करोड़ के अवैध कारोबार के आरोपी पर महज़ 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया गया है.
क्या यह इनाम किसी मज़ाक से कम है?
या फिर यह संकेत है कि आरोपी को पकड़ने में सरकार वास्तव में गंभीर नहीं है?
आम अपराधियों पर लाखों के इनाम घोषित करने वाली सरकार इस मामले में इतनी नरमी क्यों दिखा रही है?
STF जांच पर सवाल: निष्पक्षता कैसे संभव?
सरकार का दावा है कि इस पूरे मामले की जांच UP STF कर रही है.
लेकिन सुप्रिया श्रीनेत का सवाल सीधा है कि,
जब इस गोरखधंधे के तमाम तार उसी सिस्टम से जुड़ा हैं, तो STF निष्पक्ष जांच कैसे कर सकती है?
क्या जांच एजेंसी राजनीतिक दबाव से मुक्त है?
क्या जांच ऊपर तक जाएगी या फिर निचले स्तर पर ही सीमित रह जाएगी?
छोटी मछलियां गिरफ्तार, बड़ी मछलियां सुरक्षित?
अब तक की कार्रवाई में ज्यादातर छोटे-मोटे लोगों की गिरफ्तारी सामने आई है.
सवाल यह है कि,
असली मास्टरमाइंड कौन हैं?
500 करोड़ का नेटवर्क बिना राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण के संभव कैसे है?
धनंजय सिंह जैसे नामों पर कार्रवाई कब होगी?
जनता यह जानना चाहती है कि बड़ी मछलियों को कब पकड़ा जाएगा.
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जवाबदेही तय होगी या मामला दबा दिया जाएगा?
यह मामला केवल अपराध का नहीं, बल्कि सत्ता की जवाबदेही का भी है.
अगर इतने बड़े स्तर पर अवैध कारोबार हुआ है, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है,
कौन-कौन अधिकारी जिम्मेदार हैं?
किस स्तर पर चूक हुई?
क्या राजनीतिक संरक्षण मिला?
अगर इन सवालों के जवाब नहीं मिले, तो यह मामला भी उन फाइलों में दफन हो जाएगा जिनका सच कभी बाहर नहीं आता है .
निष्कर्ष: सवाल जिंदा हैं, जवाब कब?
सुप्रिया श्रीनेत द्वारा उठाए गए ये सवाल सिर्फ विपक्षी राजनीति नहीं हैं, बल्कि जनहित के सवाल हैं.
लोकतंत्र में सरकार का काम सवालों से भागना नहीं, बल्कि पारदर्शी जवाब देना होता है.
अब देखना यह है कि,
क्या योगी सरकार इन सवालों का स्पष्ट जवाब देगी,
या फिर 500 करोड़ का यह गोरखधंधा भी समय के साथ सुर्खियों से गायब हो जाएगा?

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