नफरत की राजनीति का खौफनाक अंजाम: संबलपुर में मज़दूर की हत्या
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 26 दिसंबर — ओडिशा के संबलपुर जिले में बुधवार शाम हुई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है.बांग्लादेशी होने के शक, में एक प्रवासी दिहाड़ी मज़दूर को पीट-पीटकर हत्या कर दिया गया है.यह घटना न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि उस बढ़ती नफरती मानसिकता को भी उजागर करता है, जिसमें भीड़ खुद को न्यायाधीश, पुलिस और जल्लाद समझने लगा है.
भीम आर्मी प्रमुख और सांसद चंद्र शेखर आज़ाद ने इस घटना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे देश में फैलती नफरत और भीड़तंत्र की सबसे भयावह तस्वीर बताया है.
क्या है पूरा मामला?
जानकारी के अनुसार, संबलपुर में चाय की दुकान पर बैठे कुछ प्रवासी दिहाड़ी मज़दूरों को असामाजिक तत्वों ने घेर लिया.उन पर अवैध रूप से भारत में रहने” और बांग्लादेशी होने का आरोप लगाया गया.हमलावरों ने मज़दूरों से पहचान पत्र मांगे.
मज़दूरों ने अपनी वैध सरकारी आईडी दिखाई, लेकिन भीड़ ने उन दस्तावेज़ों को भी फर्जी बताकर बेरहमी से हमला शुरू कर दिया.इस हिंसक हमले में तीन मज़दूर किसी तरह जान बचाकर भागने में सफल रहे, लेकिन पश्चिम बंगाल निवासी जुएल शेख को भीड़ ने पकड़ लिया.
जुएल शेख की मौके पर ही बेरहमी से पिटाई की गई, जिससे उनकी वहीं मौत हो गई. यह घटना महज एक हत्या नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक अधिकारों पर सीधा हमला है.
एक हफ्ते में दूसरी हत्या: बढ़ती चिंता
चंद्र शेखर आज़ाद ने अपने X पोस्ट में एक बेहद चिंताजनक तथ्य की ओर इशारा किया है— बांग्लादेशी होने के शक, में एक हफ्ते के भीतर यह दूसरी हत्या है.
यह आंकड़ा बताता है कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं, बल्कि एक खतरनाक ट्रेंड बनता जा रहा है, जहां अफवाह, नफरत और पहचान की राजनीति के आधार पर लोगों की जान ली जा रही है.
भीड़ को किसने दिया कानून हाथ में लेने का अधिकार?
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर सवाल यही है कि, किस कानून ने इन गुंडों को आईडी जांचने का अधिकार दिया?
किस संवैधानिक प्रावधान के तहत किसी आम नागरिक को यह हक मिला कि वह किसी की नागरिकता पर फैसला करे और उसे मौत के घाट उतार दे?
भारत का संविधान किसी भी नागरिक को यह अधिकार नहीं देता है. नागरिकता की जांच का अधिकार केवल संवैधानिक संस्थाओं और न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही हो सकता है, न कि सड़कों पर खड़ी उन्मादी भीड़ के जरिए.
मॉब लिंचिंग: लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा
यह घटना साफ तौर पर मॉब लिंचिंग की श्रेणी में आती है. मॉब लिंचिंग केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह राज्य की विफलता और सामाजिक ताने-बाने के टूटने का संकेत है.
जब भीड़ को यह भरोसा हो जाता है कि वह बिना सजा के किसी की जान ले सकती है, तब लोकतंत्र खोखला होने लगता है. मज़दूर वर्ग, प्रवासी समुदाय और अल्पसंख्यक ऐसे हमलों के सबसे बड़े शिकार बनते हैं.
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नफरत की राजनीति और उसका ज़हरीला असर
चंद्र शेखर आज़ाद ने इस हत्या को नफरत फैलाने वाली राजनीति का परिणाम बताया है. उन्होंने कहा कि यह ज़हर अब केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खुलेआम लोगों की जान ले रहा है.
जब समाज को हम और वे में बांटा जाता है,जब पहचान को हथियार बनाया जाता है, तब ऐसी घटनाएं जन्म लेती हैं.यह राजनीति समाज में डर, अविश्वास और हिंसा को बढ़ावा देती है.
ओडिशा सरकार से उठी ठोस मांगें
भीम आर्मी प्रमुख ने @CMO_Odisha से स्पष्ट मांगें रखी हैं कि,
इस घटना को स्पष्ट रूप से मॉब लिंचिंग घोषित किया जाये.
सभी दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी हो
आरोपियों पर हत्या की धाराओं में मुकदमा चलाया जाए
मृतक जुएल शेख के परिवार को मुआवज़ा, न्याय और सुरक्षा दी जाए
ये मांगें केवल एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश में कानून के राज को स्थापित करने के लिए ज़रूरी हैं.
निष्कर्ष
संबलपुर की यह घटना हमें आईना दिखाती है कि अगर समय रहते नफरत और भीड़तंत्र पर लगाम नहीं लगाई गई, तो कोई भी सुरक्षित नहीं रहेगा। आज एक प्रवासी मज़दूर मारा गया है, कल कोई और हो सकता है.
यह जरूरी है कि राज्य सरकारें सख्त कदम उठाएं, दोषियों को सजा मिले और समाज में यह स्पष्ट संदेश जाए कि कानून से ऊपर कोई नहीं,न भीड़, न नफरत और न ही अफवाह.
स्रोत: चंद्र शेखर आज़ाद, @BhimArmyChief के X / Twitter पोस्ट के हवाले से

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