एजाज अहमद बोले—पहले स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारें, फिर ऐसे फैसले लें
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 16 जनवरी —बिहार सरकार द्वारा सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने की घोषणा के बाद राज्य की राजनीति और स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस फैसले पर बिहार प्रदेश राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने सवाल उठाए हैं. पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा है कि सरकार को ऐसे निर्णय लेने से पहले राज्य की मौजूदा स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था की स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए.
राजद का आरोप: व्यवस्था पहले से ही चरमराई
पटना में 16 जनवरी को जारी बयान में राजद प्रवक्ता एजाज अहमद ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार बिहार का स्वास्थ्य विभाग लंबे समय से अव्यवस्था और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है.उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के प्रमुख सरकारी अस्पतालों की स्थिति इस बात का स्पष्ट संकेत है कि स्वास्थ्य सेवाएं कितनी दबाव में हैं.
एजाज अहमद के अनुसार,
पीएमसीएच (पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल)
एनएमसीएच (नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल)
डीएमसीएच (दरभंगा मेडिकल कॉलेज अस्पताल)
श्रीकृष्णा मेडिकल कॉलेज, मुजफ्फरपुर
भागलपुर मेडिकल कॉलेज
जैसे बड़े संस्थानों में भी मरीजों को समय पर इलाज, जांच और जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं.उन्होंने कहा कि जब राजधानी और बड़े शहरों के मेडिकल कॉलेजों की यह स्थिति है, तो छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों की हालत का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है.
पहले भी हो चुकी है ऐसी घोषणा
राजद प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह पहली बार नहीं है जब नीतीश कुमार सरकार ने सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक लगाने की घोषणा की हो.सूत्रों के मुताबिक, इससे पहले भी इसी तरह के निर्णय लिए गए थे, लेकिन कुछ समय बाद व्यवस्था फिर ढीली पड़ गई.
एजाज अहमद ने सवाल उठाया कि एक ही सरकार बार-बार ऐसे फैसले क्यों लेती है और फिर कुछ समय बाद वही स्थिति दोबारा कैसे बन जाती है. उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि पिछली बार लागू किए गए प्रतिबंध क्यों टिक नहीं पाए और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी रही.
सरकार से पारदर्शिता की मांग
राजद ने इस मुद्दे पर एनडीए सरकार से पारदर्शिता की मांग की है.एजाज अहमद ने कहा कि अगर बार-बार प्रतिबंध लगाने के बावजूद प्राइवेट प्रैक्टिस फिर से शुरू हो जाती है, तो यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं.उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि नियमों के पालन में कौन-सी बाधाएं आती हैं और उन्हें दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं.
डॉक्टरों को सुविधाएं देना भी जरूरी
राजद प्रवक्ता ने कहा कि केवल प्रतिबंध लगाना किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता.उनका कहना था कि यदि सरकार चाहती है कि सरकारी डॉक्टर पूरी निष्ठा से सरकारी अस्पतालों में सेवाएं दें, तो उन्हें काम करने के लिए जरूरी सुविधाएं भी उपलब्ध करानी होंगी.
उन्होंने बताया कि सरकारी अस्पतालों में,पर्याप्त दवाओं की उपलब्धता
आधुनिक जांच सुविधाएं, तकनीकी उपकरण और मशीनें, बेहतर कार्य वातावरण
जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करना सरकार की जिम्मेदारी है. रिपोर्ट के अनुसार, कई अस्पतालों में इन सुविधाओं की कमी के कारण डॉक्टरों को मरीजों के इलाज में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.
गरीब मरीजों पर सीधा असर
एजाज अहमद ने कहा कि स्वास्थ्य व्यवस्था की खामियों का सीधा असर गरीब और कमजोर वर्ग के मरीजों पर पड़ता है. उन्होंने बताया कि यदि सरकारी अस्पतालों में जांच और इलाज की समुचित व्यवस्था हो, तो निजी अस्पतालों पर निर्भरता कम की जा सकती है.लेकिन मौजूदा हालात में मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है.
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विश्लेषण: क्यों अहम है यह मुद्दा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक तभी प्रभावी हो सकती है, जब सरकारी अस्पतालों में बुनियादी ढांचा मजबूत हो.बिना संसाधन और समर्थन के लिए गए फैसले अक्सर व्यवहारिक स्तर पर टिक नहीं पाते. बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही डॉक्टरों की कमी, संसाधनों की असमान उपलब्धता और बढ़ते मरीज दबाव जैसी चुनौतियों से जूझ रही है.
निष्कर्ष
सरकारी डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक का उद्देश्य सरकारी अस्पतालों में सेवाओं को मजबूत करना हो सकता है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि केवल घोषणाओं से व्यवस्था नहीं सुधरेगी। राजद प्रवक्ता एजाज अहमद के अनुसार, सरकार को स्वास्थ्य ढांचे में ठोस सुधार, पारदर्शिता और संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए. तभी ऐसे फैसलों का वास्तविक लाभ मरीजों तक पहुंच पाएगा और राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में भरोसा बहाल हो सकेगा.

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