चीन विरोध की राजनीति पर अखिलेश यादव का सवाल, BJP की नीति पर उठी बहस
तीसरा पक्ष ब्यूरो 14 जनवरी नई दिल्ली: भारतीय राजनीति में चीन और भाजपा को लेकर एक बार फिर बहस तेज़ हो गया है. समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भाजपा और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच हुई बैठक को लेकर तीखा हमला बोला है.अखिलेश यादव का यह बयान ऐसे समय आया है जब भाजपा लगातार चीन से आयात के विरोध और चीनी सामान के बहिष्कार की बात करता रहा है.
अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया बयान में सवाल उठाया कि,भाजपा और उनके संगी-साथी स्वदेशी करते-करते परदेसी हो गए क्या? उन्होंने कहा कि जो पार्टी सार्वजनिक मंचों से चीन के विरोध की बात करती रही, वही अब चीन की पार्टी का स्वागत कर रही है. उनके मुताबिक यह विरोधाभास सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि वैचारिक भी है.
अखिलेश यादव का सीधा बयान
अखिलेश यादव ने लिखा कि, कहाँ तो चीन से आयात का विरोध कर रहे थे, यहाँ तो साक्षात स्वागत कर रहे हैं. लगता है भाजपा के वैचारिक उस्ताद पड़ोसी देश से एकदलीय व्यवस्था का मास्टर क्लास ले रहे हैं.उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिन लोगों से मुलाक़ात की जा रही है, उनका भारत में कोई पंजीकरण तक नहीं है.
बहिष्कार बनाम मुलाक़ात: सवाल क्या हैं?
सपा प्रमुख ने इस मुलाक़ात को भाजपा की पुरानी राजनीति से जोड़ते हुए पूछा कि अगर आज बात मुलाक़ात तक पहुँच गई है, तो इसकी तैयारी कई सालों से चल रही होगी.ऐसे में सवाल यह उठता है कि चीन के खिलाफ बहिष्कार का अभियान क्या सिर्फ समर्थकों की भावनाओं से खेलने के लिए था?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का यह बयान भाजपा के उस नैरेटिव को चुनौती देता है, जिसमें राष्ट्रवाद और स्वदेशी को प्रमुख मुद्दा बनाया जाता रहा है.चीन के साथ किसी भी तरह के संवाद या संपर्क को लेकर पहले भी विपक्ष सवाल उठाता रहा है, लेकिन इस बार हमला सीधे भाजपा के समर्थक आधार पर किया गया है.
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समर्थकों की भूमिका पर तंज
अखिलेश यादव ने अपने बयान में भाजपा समर्थकों का भी ज़िक्र किया है.उन्होंने कहा कि वे समर्थक, जो कभी चीनी सामान के बहिष्कार के लिए घर-घर जाते थे, आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे होंगे.उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में लिखा कि ऐसे समर्थक अब व्हाट्सएप संदेशों में कह रहे हैं कि,सुना तो था कि भाजपा किसी की सगी नहीं है, पर हमको ही धोखा दे दिया.
रंगे सियार का संदर्भ
अपने बयान के अंत में अखिलेश यादव ने रंगे सियार की कहानी का उदाहरण देते हुए कहा कि सच्चाई ज़्यादा दिन छिप नहीं सकती है.जैसे बारिश में रंग उतर जाता है, वैसे ही राजनीति में भी समय आने पर असलियत सामने आ जाती है. यह टिप्पणी सीधे तौर पर भाजपा की कथित दोहरी राजनीति पर कटाक्ष मानी जा रही है.
राजनीतिक असर और आगे की बहस
यह बयान ऐसे समय आया है जब लोकसभा चुनावों की तैयारियों के बीच विदेशी नीति, राष्ट्रवाद और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे मुद्दे फिर से चर्चा में हैं. विपक्ष के लिए यह मौका है कि वह भाजपा के पुराने बयानों और मौजूदा कदमों के बीच विरोधाभास को उजागर करे. वहीं, भाजपा की ओर से इस पर क्या प्रतिक्रिया आती है, यह भी सियासी हलकों में ध्यान से देखा जा रहा है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के बयान इसलिए भी अहम हो जाता हैं क्योंकि वे सीधे पब्लिक इंटरेस्ट, विचारधारा और राष्ट्रीय नीति से जुड़े सवाल उठाते हैं.
निष्कर्ष: अखिलेश यादव का हमला सिर्फ एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि भाजपा की नीति, नीयत और नैरेटिव पर सवाल है.आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है.

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