धर्म, परंपरा और सत्ता की राजनीति में तेज़ होता टकराव
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 27 दिसंबर—उत्तर प्रदेश की राजनीति में धर्म, परंपरा और सत्ता का टकराव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा X (पूर्व में ट्विटर) पर साझा किया गया बयान इस बहस को एक बार फिर केंद्र में ले आया है. उनके अनुसार, सत्ता का अहंकार अब इस हद तक बढ़ चुका है कि सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं और संत-समाज के सम्मान को भी नजरअंदाज किया जा रहा है.
यह बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यशैली, धार्मिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है.
कुंभ और माघमेले की परंपरा: भारत की आत्मा
कुंभ और माघ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि ये भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक हैं. सदियों से इन आयोजनों में संत-महात्माओं, अखाड़ों और धार्मिक संस्थाओं की केंद्रीय भूमिका रहा है.
परंपरा यह रही है कि प्रशासन इन आयोजनों से पहले संत-समाज से संवाद करता है, उनका आशीर्वाद लेता है और आयोजन को सहयोगात्मक ढंग से संपन्न करता है. यह रिश्ता सम्मान और विश्वास पर आधारित रहा है.
अखिलेश यादव का आरोप: सत्ता का अहंकार बनाम धार्मिक मर्यादा
अखिलेश यादव ने अपने पोस्ट में आरोप लगाया कि आज की सत्ता व्यक्तिगत अहंकार में इस कदर डूबी हुई है कि वह संत-समाज को अस्थायी भूमि तक देने से इंकार कर रही है, जबकि कुछ लोग स्थायी रूप से भूमि पर कब्जा जमाए बैठा हैं.
उनका कहना है कि यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि धार्मिक परंपराओं का खुला अपमान है.
उन्होंने यह भी कहा कि कलयुग के वर्तमान शासन में हालात इतने बिगड़ गया हैं कि संत-महात्माओं को अधिकारियों के सामने जमीन पर लेटकर गिड़गिड़ाना पड़ रहा है,वह भी किसी निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि धर्मार्थ कार्य के लिये.
प्रशासन की भूमिका पर सवाल
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि अधिकारी किसके निर्देश पर काम कर रहा हैं?
अखिलेश यादव के अनुसार, कोई भी समझदार अधिकारी ऐसा कार्य नहीं करेगा जिससे समाज में आक्रोश फैले. यदि फिर भी ऐसा हो रहा है, तो इसके पीछे राजनीतिक दबाव और सत्ता का डर स्पष्ट दिखाई देता है.
यह स्थिति लोकतंत्र की उस बुनियादी भावना के खिलाफ है, जिसमें प्रशासन को निष्पक्ष, संवेदनशील और जनता-हितैषी माना जाता है.
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धर्म और राजनीति का टकराव
भारत में धर्म और राजनीति का संबंध हमेशा से जटिल रहा है. लेकिन जब सत्ता स्वयं को धर्म का रक्षक बताकर भी धार्मिक संस्थाओं का अपमान करे, तो यह विरोधाभास और भी गंभीर हो जाता है.
अखिलेश यादव का कहना है कि जो लोग खुद को सबसे ऊपर दिखाने के लिए दूसरों को नीचा दिखाता हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि अधर्म कभी विजयी नहीं होता और एकाधिकार की भावना अंततः पराजित होती है.
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गया है. विपक्ष इसे धार्मिक स्वतंत्रता और प्रशासनिक तानाशाही का मुद्दा बता रहा है, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष पर नैतिक और संवैधानिक दबाव बढ़ता दिख रहा है.
संत-समाज और आम जनता के बीच यह प्रश्न गूंज रहा है कि क्या धार्मिक परंपराओं का सम्मान अब सत्ता की प्राथमिकता नहीं रह गया है?
निष्कर्ष
अखिलेश यादव का यह बयान केवल एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, प्रशासनिक नैतिकता और धार्मिक परंपराओं पर एक गंभीर विमर्श है.
यदि सत्ता का अहंकार सचमुच संत-समाज के सम्मान से ऊपर रखा जा रहा है, तो यह स्थिति केवल एक वर्ग नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चिंताजनक है.
लोकतंत्र में शक्ति का वास्तविक परीक्षण यही है कि वह कमजोर और सम्मानित परंपराओं के प्रति कितनी संवेदनशील है. आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन और सरकार इस आलोचना को आत्ममंथन के अवसर के रूप में लेती है या नहीं.

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