अरावली सत्याग्रह 2026: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा जन आंदोलन

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Ajit Kumar

भारत
अरावली सत्याग्रह 2026: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा जन आंदोलन

कांग्रेस की 1000 किमी पदयात्रा से पर्यावरण संरक्षण की नई उम्मीद

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना 26 दिसंबर — भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में शामिल अरावली पर्वतमाला आज अस्तित्व के गंभीर संकट से गुजर रहा है. इसी चिंता को केंद्र में रखते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अरावली सत्याग्रह नाम से एक बड़े जन आंदोलन की घोषणा की है. यह अभियान 7 जनवरी 2026 से शुरू होकर लगभग 1000 किलोमीटर की पदयात्रा के रूप में गुजरात से दिल्ली तक पहुंचेगा.

कांग्रेस का कहना है कि यह केवल एक राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों को बचाने का पर्यावरणीय संकल्प है.

अरावली सत्याग्रह क्या है?

अरावली सत्याग्रह एक अहिंसक जन आंदोलन है, जिसका उद्देश्य अरावली पर्वतमाला को अवैध खनन, जंगल कटाई और अनियंत्रित शहरीकरण से बचाना है. इस पदयात्रा का नेतृत्व इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) करेगी और रास्ते में कई जिलों व राज्यों में जनसंवाद और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे.

यह यात्रा निम्न राज्यों से होकर गुजरेगी, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली

अरावली पर्वतमाला का पर्यावरणीय महत्व

अरावली पर्वतमाला को उत्तर भारत की ,जीवन रेखा कहा जाता है. इसकी पर्यावरणीय भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है.

रेगिस्तानीकरण रोकने में भूमिका

अरावली थार मरुस्थल को पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती है. यदि यह कमजोर होती है, तो राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में रेगिस्तानीकरण का खतरा बढ़ सकता है.

जल संरक्षण और भूजल रिचार्ज

अरावली की चट्टानें वर्षा जल को संचित कर भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करती हैं. लाखों लोगों की पेयजल आपूर्ति इससे जुड़ी है.

वायु प्रदूषण पर नियंत्रण

दिल्ली-एनसीआर में बढ़ते प्रदूषण के बीच अरावली एक प्राकृतिक फिल्टर का काम करती है, जो धूल और प्रदूषकों को रोकने में सहायक है.

जैव विविधता का संरक्षण

यह क्षेत्र कई दुर्लभ वनस्पतियों, वन्यजीवों और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक स्थलों का घर है.

अरावली विवाद की पृष्ठभूमि

नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई एक नई परिभाषा के बाद अरावली को लेकर विवाद गहरा गया. इस परिभाषा के अनुसार,

केवल वे पहाड़ियां जो स्थानीय भूमि से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हैं, अरावली मानी जाएंगी.

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि इससे 90% से अधिक अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता है, जिससे खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.

कांग्रेस की प्रमुख आपत्तियां और मांगें

कांग्रेस का आरोप है कि नई परिभाषा से खनन माफिया को लाभ पहुंचेगा और पर्यावरण को अपूरणीय क्षति होगी. पार्टी की प्रमुख मांगें हैं,

100 मीटर ऊंचाई की शर्त को समाप्त किया जाए

अरावली को क्रिटिकल इकोलॉजिकल जोन घोषित किया जाए

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की समीक्षा हो

अरावली क्षेत्र में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए

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गांधीवादी परंपरा और सत्याग्रह की भावना

सत्याग्रह, शब्द का चयन संयोग नहीं है. महात्मा गांधी द्वारा अपनाई गई अहिंसक संघर्ष की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस इस आंदोलन को जन आंदोलन का रूप देना चाहती है.

यात्रा के दौरान, जनसभाएं होंगी,

स्थानीय लोगों से संवाद किया जाएगा,

पर्यावरणीय जागरूकता फैलाई जाएगी,

आम नागरिक क्यों जुड़ें?

अरावली सिर्फ पहाड़ नहीं, बल्कि: किसानों के लिए जल सुरक्षा

शहरों के लिए स्वच्छ हवा, बच्चों के लिए सुरक्षित भविष्य, का आधार है. यदि आज आवाज़ नहीं उठाई गई, तो आने वाले वर्षों में जल संकट, प्रदूषण और जलवायु असंतुलन और गहराएगा.

निष्कर्ष

अरावली सत्याग्रह 2026 केवल एक राजनीतिक पहल नहीं, बल्कि पर्यावरण बचाने की सामूहिक पुकार है. यह अभियान याद दिलाता है कि पर्यावरण संरक्षण किसी एक दल का मुद्दा नहीं, बल्कि हम सभी की साझा जिम्मेदारी है.

अरावली को बचाना मतलब— स्वच्छ हवा, सुरक्षित पानी, संतुलित पर्यावरण

आइए, भविष्य को बचाने के लिए आज कदम बढ़ाएं.

यह समाचार भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आधिकारिक X (Twitter) हैंडल @INCIndia पर साझा की गई जानकारी और विभिन्न राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है

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