गहलोत का सवाल: क्या भारत की विदेश नीति विफल हुई?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,6 जनवरी बांग्लादेश से आ रही हिंदू अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा, हत्या और महिलाओं पर अत्याचार की खबरों ने पूरे भारतीय समाज को झकझोर कर रख दिया है. महज 19 दिनों में 5 हिंदुओं की हत्या और लगातार सामने आ रही बर्बर घटनाये केवल किसी एक समुदाय पर हमला नहीं हैं, बल्कि यह मानवाधिकार, लोकतंत्र और सभ्यता पर सीधा आघात हैं.राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने इस विषय पर X (पूर्व में ट्विटर) पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार की विदेश नीति पर तीखे सवाल खड़ा किया है.
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक पहले से ही सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक असुरक्षा का सामना करते रहा हैं.हाल के दिनों में जिस तरह से हत्या, जबरन उत्पीड़न और महिलाओं के साथ अत्याचार की घटनाएं सामने आई हैं, वह स्थिति को और भयावह बना देती हैं.
अल्पसंख्यकों पर हिंसा केवल आंतरिक कानून-व्यवस्था का विषय नहीं होती है , बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों का उल्लंघन भी है. किसी भी लोकतांत्रिक देश की जिम्मेदारी होता है कि वह अपने सभी नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों, की सुरक्षा सुनिश्चित करे.
1971 की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आज का भारत
अशोक गहलोत ने अपने पोस्ट में 1971 के ऐतिहासिक दौर की याद दिलाई है, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने साहसिक और निर्णायक कदम उठाया था . उस समय भारत ने न केवल बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का समर्थन किया, बल्कि अमेरिका जैसी महाशक्ति के दबाव के बावजूद अपने फैसले पर अडिग रहा था.
अमेरिका द्वारा सातवां बेड़ा भेजे जाने के बावजूद भारत ने पीछे हटने से इनकार कर दिया और इतिहास व भूगोल दोनों बदल दिया. यह उदाहरण दर्शाता है कि सशक्त कूटनीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही बड़े संकटों का समाधान संभव है.
भारत ने बनाया, वही भारत के खिलाफ – कूटनीतिक विफलता?
गहलोत का यह बयान अत्यंत गंभीर है कि जिस देश के निर्माण में भारत की निर्णायक भूमिका रहा , वही आज भारत के खिलाफ रवैया अपना रहा है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ?
यदि पड़ोसी देश में भारत से जुड़े समुदाय, विशेषकर हिंदू अल्पसंख्यक, असुरक्षित हैं और वहां की सरकार प्रभावी कार्रवाई करने में विफल है, तो यह भारत की कूटनीतिक कमजोरी या उदासीनता की ओर भी संकेत करता है.
रस्मी बयानों से आगे बढ़ने की जरूरत
अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार के, गहरी चिंता जैसे बयानों को अपर्याप्त बताया है. वास्तव में, केवल चिंता व्यक्त करना पर्याप्त नहीं होता है .
भारत को चाहिए कि वह,
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार पर कूटनीतिक दबाव बनाये,
अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस मुद्दे को मजबूती से उठाये .
अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ठोस आश्वासन और समयबद्ध कार्रवाई की मांग करे.
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नैतिक और कूटनीतिक जिम्मेदारी
पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों के जीवन और सम्मान की रक्षा करना केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि भारत की नैतिक जिम्मेदारी भी है. भारत स्वयं को विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है और वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है. ऐसे में सीमापार हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर चुप्पी उसकी वैश्विक छवि को कमजोर करत है.
निर्णायक नेतृत्व बनाम खोखले नारे
इतिहास इस बात का साक्षी है कि केवल नारेबाजी से निर्दोषों की जान नहीं बचाया जा सकता है,निर्णायक नेतृत्व, स्पष्ट नीति और साहसिक फैसले ही बदलाव लाता हैं.
गहलोत का यह आग्रह कि प्रधानमंत्री को इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करना चाहिये , केवल राजनीतिक बयान नहीं बल्कि एक चेतावनी भी है कि देर होने पर हालात और बिगड़ सकता हैं.
निष्कर्ष
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार केवल एक देश का आंतरिक मामला नहीं हैं, बल्कि यह पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता और मानवता से जुड़ा सवाल है.अशोक गहलोत के X पोस्ट ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने का काम किया है.अब आवश्यकता है कि भारत सरकार इतिहास से सबक लेते हुए मजबूत, संवेदनशील और निर्णायक कूटनीति अपनाए, ताकि निर्दोषों की जान और सम्मान की रक्षा हो सके.
न्यूज़ स्रोत : Ashok Gehlot के X पोस्ट के संदर्भ में विश्लेषणात्मक लेख

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