नफरत की राजनीति से कौन जीत रहा है और भारत क्या खो रहा है?
तीसरा पक्ष आलेख पटना,4 जनवरी 2026 — भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है, जिसकी पहचान विविधता, बहुलता और सहिष्णुता से रही है. यहां अनेक धर्म, जातियां, भाषाएं और संस्कृतियां एक साथ मिलकर देश को मजबूत बनाती हैं. लेकिन हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति का स्वर तेजी से बदला है. विकास, शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की जगह नफरत, डर और विभाजन ने राजनीतिक विमर्श में प्रमुख स्थान ले लिया है.चुनावी भाषणों से लेकर सोशल मीडिया तक, हम बनाम वे ,की भाषा सामान्य होते जा रहा है.ऐसे में यह समझना जरूरी है कि नफरत की राजनीति आखिर है क्या, इससे किसे फायदा हो रहा है और इसका असर भारत के भविष्य पर कितना गंभीर है.
नफरत की राजनीति क्या होती है?
नफरत की राजनीति या हेट पॉलिटिक्स वह रणनीति है जिसमें राजनीतिक लाभ के लिए समाज के किसी एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खिलाफ खड़ा किया जाता है. इसमें धर्म, जाति, समुदाय, भाषा या क्षेत्र के आधार पर लोगों को बांटा जाता है. अल्पसंख्यक समुदायों को अक्सर,खतरा, घुसपैठिया या राष्ट्र विरोधी बताकर बहुसंख्यक समाज को डर और असुरक्षा की भावना से जोड़ा जाता है. यह राजनीति तर्क और नीति के बजाय भावनाओं को भड़काने पर आधारित होता है, ताकि वोट बैंक मजबूत किया जा सके.
भारत में नफरत की राजनीति का ऐतिहासिक संदर्भ
भारत में विभाजन की राजनीति कोई नई बात नहीं है. औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश शासन ने, फूट डालो और राज करो, की नीति अपनाई, जिससे समाज में धार्मिक और सामाजिक दरारें गहरी हुईं. आज़ादी के बाद भी समय-समय पर कुछ राजनीतिक ताकतों ने इन दरारों का इस्तेमाल सत्ता हासिल करने के लिये किया.1980 और 1990 के दशक में सांप्रदायिक राजनीति ने धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमाईं, लेकिन पिछले एक दशक में यह राजनीति हाशिये से निकलकर मुख्यधारा में आ गया है. अब यह केवल चुनावी समय तक सीमित नहीं, बल्कि रोजमर्रा के सामाजिक जीवन का हिस्सा बनता जा रहा है.
वर्तमान परिदृश्य: हेट स्पीच का बढ़ता प्रभाव
आज नफरत की राजनीति का सबसे बड़ा माध्यम सोशल मीडिया है. फेसबुक, एक्स और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर भड़काऊ भाषण, फर्जी वीडियो और नफरत फैलाने वाले संदेश तेजी से फैलते हैं.हेट स्पीच अब केवल कट्टर संगठनों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई बार राजनीतिक मंचों से खुलेआम सुनाई देता है. इसका सीधा असर समाज पर पड़ता है, जहां यह शब्द हिंसा में बदल जाता हैं. मॉब लिंचिंग, सांप्रदायिक तनाव और सामाजिक बहिष्कार जैसी घटनाएं इसी प्रवृत्ति का परिणाम हैं.
नफरत की राजनीति से किसे फायदा होता है?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस राजनीति से लाभार्थी कौन हैं.सबसे पहले राजनीतिक दल, जो धार्मिक या जातीय ध्रुवीकरण के जरिए स्थायी वोट बैंक तैयार करता हैं. जब जनता भावनात्मक मुद्दों में उलझी रहती है, तब बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे असली सवाल पीछे छूट जाता हैं. दूसरा बड़ा लाभार्थी मीडिया का एक हिस्सा है, जिसे सनसनीखेज बहसों और विवादों से टीआरपी और क्लिक मिलता हैं.नफरत भरा कंटेंट जल्दी वायरल होता है, जिससे विज्ञापन का खेल चलता रहता है. इसके अलावा संगठित ट्रोल समूह और आईटी सेल भी इस माहौल में फलते-फूलते हैं, जिन्हें राजनीतिक संरक्षण और पहचान मिलता है.
सामाजिक ताने-बाने पर प्रभाव
नफरत की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान समाज को होता है. इससे समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ता है और आपसी संबंध कमजोर होता हैं.अल्पसंख्यक समुदायों में डर और असुरक्षा की भावना गहराती है, जबकि बहुसंख्यक समाज को लगातार किसी काल्पनिक खतरे से डराया जाता है. इसका असर बच्चों और युवाओं पर भी पड़ता है, जो नफरत को सामान्य मानने लगता हैं.समाज में संवाद की जगह संदेह और टकराव ले लेता है, जो किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.
अर्थव्यवस्था पर पड़ता असर
नफरत की राजनीति का असर केवल सामाजिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है. सांप्रदायिक तनाव के कारण व्यापार और निवेश प्रभावित होता हैं.जब किसी समुदाय के खिलाफ बहिष्कार की अपील किया जाता है, तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचता है. हिंसा और अस्थिरता से पर्यटन घटता है और निवेशक भरोसा खोता हैं. लंबे समय में इसका परिणाम रोजगार के अवसरों में कमी और आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी होने के रूप में सामने आता है.
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लोकतंत्र और संस्थाओं के लिए खतरा
जब नफरत राजनीति का केंद्र बनता है, तब लोकतांत्रिक संस्थाएं भी कमजोर पड़ जाती हैं. असहमति को देशद्रोह कहकर दबाने की कोशिश होता है. पत्रकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता निशाने पर आते हैं.सवाल पूछने की संस्कृति खत्म होने लगता है, जिससे सत्ता की जवाबदेही घटती है. इतिहास गवाह है कि जब लोकतंत्र में नफरत हावी होता है, तो संविधान और कानून का सम्मान भी कमजोर पड़ता है.
समाधान: नफरत के खिलाफ रास्ता
नफरत की राजनीति का मुकाबला आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं है. सबसे पहले हेट स्पीच के खिलाफ कानूनों का सख्ती से पालन होना चाहिये. मीडिया को जिम्मेदार भूमिका निभाना होगा और सनसनी के बजाय तथ्य और संतुलन को महत्व देना होगा. शिक्षा प्रणाली में संवैधानिक मूल्य, वैज्ञानिक सोच और सामाजिक सद्भाव को मजबूत किया जाना चाहिये, नागरिकों को भी सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों और झूठ से सावधान रहना होगा.
निष्कर्ष: चुनाव नफरत से नहीं, भविष्य से
भारत की असली ताकत उसकी विविधता और एकता में है. नफरत की राजनीति से भले ही कुछ राजनीतिक और आर्थिक हित पूरे हो जाये , लेकिन इसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है.अगर भारत को एक मजबूत, न्यायपूर्ण और समावेशी राष्ट्र बनाना है, तो राजनीति को नफरत से निकालकर विकास, समानता और संवाद की राह पर लाना होगा.यही लोकतंत्र की रक्षा और देश के उज्ज्वल भविष्य का एकमात्र रास्ता है.

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