क्रिसमस पर हमला, जमानत पर जश्न — लोकतंत्र के लिए खतरा
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,3 जनवरी— छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से सामने आई एक घटना ने देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़ा कर दिया हैं.क्रिसमस जैसे पवित्र और शांतिपूर्ण पर्व के दिन एक मॉल में जबरन घुसकर तोड़फोड़ करने वाले छह आरोपियों को न केवल जमानत मिल गई, बल्कि जमानत के बाद उनका ढोल-नगाड़ों, मालाओं और पटाखों के साथ हीरो जैसा स्वागत किया गया है. इस स्वागत के दौरान खुलेआम ,ईसाई मिशनरी मुर्दाबाद जैसे नारे भी लगाया गया.
इस पूरे घटनाक्रम पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका भारती ने X (Twitter) पर कड़ा और तथ्यपरक बयान जारी करते हुए प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्रियों और सत्ता प्रतिष्ठान की चुप्पी पर सवाल उठाये हैं.
क्या यह सिर्फ़ एक घटना है या एक पैटर्न?
प्रियंका भारती के अनुसार, यह घटना किसी एक शहर या एक दिन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक और वैचारिक माहौल को दर्शाती है, जिसमें अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफरत को सामान्य बनाया जा रहा है.
सबसे चिंताजनक बात यह है कि हिंसा केवल की नहीं जा रही, बल्कि उसे सेलिब्रेट भी किया जा रहा है.जब कानून तोड़ने वालों का सार्वजनिक रूप से स्वागत हो और नफरत भरे नारों को सामाजिक स्वीकृति मिले, तब यह लोकतंत्र के लिए बेहद ख़तरनाक संकेत होता है.

सत्ता से सीधे सवाल
प्रियंका भारती ने अपने पोस्ट में सीधे प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों से सवाल किया है कि,
प्रधानमंत्री कब तक चुप रहेंगे?
वे केंद्रीय मंत्री, जो स्वयं ईसाई संस्थानों के पूर्व छात्र रहा हैं,जेपी नड्डा, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण, अश्विनी वैष्णव, ज्योतिरादित्य सिंधिया—क्या वे इस पर कुछ कहेंगे?
यह सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक भी हैं.क्या सत्ता में बैठे लोगों की जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे नफरत और हिंसा के खिलाफ स्पष्ट स्टैंड लें?
ईसाई संस्थानों का भारत में योगदान: तथ्य जो नज़रअंदाज़ किया जा रहा हैं
प्रियंका भारती ने अपने पोस्ट में कुछ ऐसे ठोस आंकड़े साझा किये हैं, जिन्हें अक्सर जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता है.
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
भारत में हर साल 54,000 से अधिक ईसाई शैक्षणिक संस्थानों में करीब 6 करोड़ छात्रों का दाखिला होता है.
इनमें से हर चार में से कम से कम तीन छात्र गैर-ईसाई होते हैं — हिंदू, मुस्लिम, सिख, जैन और बौद्ध है.
यह साफ़ दिखाता है कि ये संस्थान किसी एक धर्म के लिए नहीं, बल्कि समावेशी शिक्षा के लिए काम करता हैं.
स्वास्थ्य सेवा में भूमिका
ईसाई संस्थान भारत की लगभग 2% आबादी को हेल्थकेयर सेवाएं प्रदान करता हैं.
दूरदराज़ और आदिवासी इलाकों में, जहां सरकारी सुविधाएं नहीं पहुंच पातीं, वहां ये संस्थान जीवन रेखा बनता हैं.
Covid-19 महामारी के दौरान
1,000 से अधिक अस्पतालों में, लगभग 60,000 मरीजों को बेड उपलब्ध कराए गए
कैथोलिक हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया
3,500 से अधिक संस्थानों के साथ
भारत का सबसे बड़ा गैर-सरकारी हेल्थकेयर नेटवर्क
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नफरत का राजनीतिक इस्तेमाल
प्रियंका भारती के अनुसार, आज जो लोग ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ ज़हर फैला रहा हैं, वे न केवल देश के भीतर सामाजिक सौहार्द को तोड़ रहा हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को भी नुकसान पहुँचा रहा हैं.
धर्म के नाम पर किया जा रहा यह राजनीतिक प्रोपेगेंडा अब हिंसा के स्तर तक पहुँच चुका है, और उससे भी खतरनाक यह है कि उस हिंसा को धर्म रक्षा के नाम पर जायज़ ठहराया जा रहा है.
धर्म के रक्षक या आतंकवादी सोच ?
अपने बयान के अंत में प्रियंका भारती एक बेहद तीखा सवाल उठाती हैं कि,
अब इन कथित धर्म के रक्षकों में और आतंकवादियों में कोई फ़र्क़ नहीं लगता.
यह कथन किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि हिंसा, नफरत और डर की राजनीति के खिलाफ एक चेतावनी है.जब कानून हाथ में लेने वालों को सामाजिक सम्मान मिलने लगे, तब यह पूरे समाज के लिए खतरा बन जाता है.
निष्कर्ष
रायपुर मॉल की घटना केवल कानून-व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक एकता की परीक्षा है.
प्रियंका भारती का X पोस्ट हमें याद दिलाता है कि ईसाई समुदाय ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के क्षेत्र में भारत के लिए जो योगदान दिया है, उसे नफरत की राजनीति से मिटाया नहीं जा सकता.
अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि दोषियों को जमानत क्यों मिली, बल्कि यह है कि हिंसा का महिमामंडन करने वाले माहौल पर सत्ता कब बोलेगी?

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