यह अदृश्य तनाव कहीं न कहीं सरकारी मशीनरी को भी प्रभावित कर रहा है!
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 28 नवंबर 2025— बिहार की राजनीति में एक बार फिर सत्ता के खेल ने तेज़ी पकड़ ली है. एनडीए सरकार बनने के बाद राज्य की दो प्रमुख सत्ताधारी पार्टियों—भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU)—के बीच रस्साकशी अब साफ दिखाई देने लगी है.
राजद के प्रदेश प्रवक्ता एजाज अहमद ने इस स्थिति को सीधे तौर पर शह और मात का खेल बताया है और आरोप लगाया है कि सरकार में बैठे दोनों दल जनता के वास्तविक मुद्दों से भटककर केवल क्रेडिट लेने में व्यस्त हैं.
एनडीए सरकार में बढ़ती खींचतान
एजाज अहमद के अनुसार, सरकार बनने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि राज्य के विकास, रोजगार और कानून-व्यवस्था पर तुरंत ध्यान दिया जाएगा. लेकिन इसके विपरीत, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के बीच,कौन ज्यादा काम कर रहा है और,किसे ज्यादा श्रेय मिले —इस पर राजनीतिक घमासान मचा हुआ है.
जदयू जहां नौकरी, रोजगार और विकास की घोषणा कर रही है, वहीं भाजपा अपराधियों के खिलाफ 400 माफियाओं की सूची जारी कर कार्रवाई का दावा कर रही है. राजद प्रवक्ता के मुताबिक, यह स्थिति सरकार की भीतरूनी खींचतान को उजागर करती है.
सुशासन मॉडल पर सवाल
भाजपा द्वारा 400 अपराधियों की सूची जारी करने को लेकर एजाज अहमद ने बड़ा सवाल उठाया— जबकि पिछले 20 वर्षों से नीतीश कुमार खुद गृह मंत्री रहे, तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि अपराध और माफियाओं की सूची बनानी पड़ रही है?
उनके अनुसार, भाजपा के इस कदम ने नीतीश कुमार के ही सुशासन मॉडल को कटघरे में ला दिया है, क्योंकि यह स्पष्ट संकेत है कि या तो सुशासन पहले था ही नहीं, या अब सिर्फ राजनीतिक संदेश देने के लिए यह दावा किया जा रहा है.
क्रेडिट की राजनीति बनाम “जनता के मुद्दे
नई सरकार से जनता को उम्मीद थी कि,
बेरोज़गारी पर ठोस कदम उठाए जाएंगे
उद्योग और निवेश को गति मिलेगी
कानून-व्यवस्था में मजबूती आएगी
शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था सुधरेगी
लेकिन एजाज अहमद का कहना है कि अभी तक सरकार की किसी पहलकदमी से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि इन मुद्दों को प्राथमिकता दी जा रही है.
इसके बजाय, दोनों दलों के नेता जनहित के मुद्दों से हटकर केवल यह दिखाने में लगे हैं कि किसकी पहल अधिक प्रभावी है और किसका प्रभाव अधिक है.
उन्होंने कहा कि,
नई सरकार बनने के बाद सिर्फ होड़ और क्रेडिट की राजनीति चल रही है, जनता के हितों का नुकसान हो रहा है.
निरीक्षणों की राजनीति और मंत्रियों में अविश्वास
राजद प्रवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब प्रतिदिन सुबह पटना में निरीक्षण अभियान चला रहे हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में भाजपा कोटे के मंत्रियों को कोई जानकारी नहीं दी जाती.
इसके साथ ही उन्होंने कहा कि,
निरीक्षण टीम में वही अधिकारी होते हैं जो पहले से सीएम के विश्वासपात्र माने जाते हैं.
इससे सरकार के अंदर तालमेल की कमी और विश्वास संकट साफ झलकता है.
भाजपा और जदयू के बीच यह अदृश्य तनाव कहीं न कहीं सरकारी मशीनरी को भी प्रभावित कर रहा है.
इस स्थिति को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि राज्य की पूरी व्यवस्था राजनीतिक दिखावे, अंदरूनी मुकाबले, और व्यक्तिगत छवि सुधार में उलझकर रह गई है.
जनता की उम्मीदों पर पानी
जनता के बीच इस सरकार से काफी उम्मीदें थीं,
वे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़े ठोस निर्णय चाहती थी.
लेकिन एजाज अहमद का कहना है कि,
सरकार बनने के लगभग दो महीने बाद भी कोई ठोस नीति नहीं दिखाई देती.
न नई योजनाओं की घोषणा हो रही है
न पुराने वादों पर काम हो रहा है
न ही जनता से जुड़े मसलों पर ध्यान दिया जा रहा है.
इस कारण बिहार की जनता में असंतोष बढ़ रहा है, और लोग यह सवाल करने लगे हैं कि क्या सरकार सच में जनता के लिए काम कर रही है या सिर्फ राजनीतिक छवि बचाने में लगी है.
क्या सरकार अपना मिशन स्पष्ट करेगी?
बिहार की राजनीति में यह पहली बार नहीं है कि गठबंधन की अंदरूनी खींचतान सुर्खियों में हो.लेकिन इस बार स्थिति गंभीर इसलिए है क्योंकि,
जनता पहले ही बेरोज़गारी, पलायन और महंगाई से परेशान है.
बिहार निवेश और रोजगार के मामलों में पहले से ही पीछे है.
ऐसे समय में राजनीतिक अस्थिरता से विकास की गति और धीमी हो सकती है.
राजद प्रवक्ता के अनुसार,
नई सरकार के पास जनता के लिए कोई स्पष्ट विज़न और मिशन नहीं है. मंत्री केवल बयानबाज़ी और क्रेडिट लेने में लगे हैं, जबकि जनता की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं.
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निष्कर्ष
एनडीए सरकार के गठन के बाद से ही बिहार में सियासी जंग तेज़ हो गई है.भाजपा और जदयू के बीच चल रही शह-मात की यह लड़ाई न सिर्फ सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाती है, बल्कि जनता में भी बेचैनी पैदा करती है.
लोकतंत्र में सत्ता का उद्देश्य सेवा, विकास, और जनहित होना चाहिए,
लेकिन बिहार की मौजूदा राजनीति में यह लक्ष्य पीछे छूटता दिखाई दे रहा है.
एजाज अहमद का आरोप है कि सरकार अपने भीतरूनी संघर्ष में उलझी है और जनता के हितों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर रही है.अब यह देखना होगा कि क्या सरकार इस आलोचना को गंभीरता से लेकर जनहित के मुद्दों पर फोकस करती है या फिर राजनीतिक टकराव ही आगे भी सुर्खियों में छाया रहेगा.

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