सरकार की नीति पर सवाल—क्या डिलिमिटेशन बिना ताज़ा जनगणना के न्यायसंगत होगा?
तीसरा पक्ष ब्यूरो दिल्ली 13 अप्रैल : देश की राजनीति में इन दिनों जातिगत जनगणना और डिलिमिटेशन (सीमांकन) को लेकर बहस तेज हो गया है.कांग्रेस नेत्री Supriya Shrinate के बयान ने इस मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है. उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया कि Rahul Gandhi ने एक साल पहले ही देश में जातिगत जनगणना कराने का मुद्दा उठाया था, लेकिन केंद्र सरकार लगातार इससे बचती रही है.
Shrinate के अनुसार, सरकार ने पहले Supreme Court of India में हलफनामा देकर यह स्पष्ट किया था कि वह जातिगत जनगणना के पक्ष में नहीं है. इतना ही नहीं, Narendra Modi ने भी इसे अर्बन नक्सल सोच से जोड़कर आलोचना किया था. लेकिन अब हालात ऐसे बने कि सरकार को इस मांग को स्वीकार करना पड़ा.
जनगणना में देरी: क्या है बड़ा असर?
भारत में आखिरी जनगणना 2011 में हुई थी. इसके बाद 2021 में अगली जनगणना प्रस्तावित थी, लेकिन कई कारणों से यह अब तक नहीं हो पाई. अब कहा जा रहा है कि डिजिटल जनगणना की प्रक्रिया के चलते इसके अंतिम आंकड़े 2027 तक सामने आ सकते हैं.
यह देरी सिर्फ एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव भी गहरा हैं.जनगणना के आंकड़े ही यह तय करता हैं कि देश में किस वर्ग की आबादी कितनी है, और उसी आधार पर नीतियां बनती हैं,चाहे वह आरक्षण हो, संसाधनों का वितरण हो या राजनीतिक प्रतिनिधित्व.
डिलिमिटेशन पर उठते सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश के पास ताज़ा जनगणना के आंकड़े ही नहीं हैं, तो डिलिमिटेशन कैसे किया जाएगा?
डिलिमिटेशन का मतलब है,लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण. इसके तहत यह भी तय होता है कि कौन सी सीटें अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित होंगी.
Shrinate ने इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा है कि,
बिना नए आंकड़ों के सीमांकन कैसे होगा? SC/ST सीटों का निर्धारण किस आधार पर किया जाएगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अगर पुराने आंकड़ों के आधार पर सीमांकन होता है, तो यह वर्तमान जनसंख्या संरचना को सही तरीके से प्रतिबिंबित नहीं करेगा.
बिहार और तेलंगाना का उदाहरण
सुप्रिया श्रीनेत ने अपने बयान में Bihar और Telangana का उदाहरण भी दिया. इन राज्यों में हाल ही में कराए गए जातिगत सर्वे ने यह दिखाया कि पिछड़े वर्ग (OBC) की आबादी कितनी बड़ी है.
इन्हीं आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस पार्टी लंबे समय से मांग कर रही है कि OBC महिलाओं के लिए भी आरक्षण सुनिश्चित किया जाए. उनका तर्क है कि जब तक सही डेटा नहीं होगा, तब तक सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा.
राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप
सुप्रिया श्रीनेत ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि वह शकुनी चाल चलते हुए डिलिमिटेशन की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है, ताकि जातिगत जनगणना से बचा जा सके.
हालांकि, सरकार की ओर से यह तर्क दिया जाता रहा है कि जनगणना एक जटिल प्रक्रिया है और इसे सही तरीके से पूरा करने के लिए समय चाहिए. डिजिटल जनगणना को भविष्य की जरूरत बताते हुए सरकार इसे अधिक पारदर्शी और सटीक बताती है.
क्यों जरूरी है जातिगत जनगणना?
जातिगत जनगणना सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय का आधार मानी जाती है. इससे यह पता चलता है कि किस वर्ग की स्थिति क्या है और उन्हें किस प्रकार की नीतिगत सहायता की जरूरत है.
विशेषज्ञों का मानना है कि,
इससे आरक्षण नीति को अधिक सटीक बनाया जा सकता है.
सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचाया जा सकता है.
सामाजिक असमानता को कम करने में मदद मिल सकती है.
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आगे क्या?
आने वाले समय में यह मुद्दा और भी गर्माने वाला है.एक ओर विपक्ष जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय का मुद्दा बना रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार इसे प्रशासनिक प्रक्रिया और तकनीकी सुधार के नजरिए से देख रही है.
लेकिन असली सवाल वही है, क्या बिना ताज़ा जनगणना के आंकड़ों के देश का राजनीतिक भविष्य तय किया जा सकता है?
निष्कर्ष
जातिगत जनगणना और डिलिमिटेशन का यह विवाद सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक भी है. जब तक देश के पास सही और अद्यतन आंकड़े नहीं होंगे, तब तक किसी भी बड़े फैसले पर सवाल उठते रहेंगे.
अब देखना यह होगा कि सरकार इस चुनौती का समाधान कैसे निकालती है,क्या पहले जनगणना होगी या डिलिमिटेशन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी? यही आने वाले समय की सबसे बड़ी बहस बनने जा रही है.

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