ग्वालियर में अंबेडकर की तस्वीर जलाने का आरोप, दलित संगठनों में आक्रोश
तीसरा पक्ष ब्यूरो मध्य प्रदेश,1 जनवरी 2026 — भारत के संविधान निर्माता और सामाजिक न्याय के महानायक बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का नाम भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा हुआ है. ऐसे में यदि उनके सम्मान से जुड़ी कोई घटना सामने आती है, तो उसका असर केवल एक शहर या समुदाय तक सीमित नहीं रहता है. मध्य प्रदेश के ग्वालियर से सामने आई एक घटना ने पूरे देश में राजनीतिक और सामाजिक बहस को जन्म दे दिया है.आरोप है कि सार्वजनिक स्थान पर बाबा साहेब की तस्वीर जलाने की घटना हुई, जिसके बाद विभिन्न संगठनों और राजनीतिक दलों में तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं है.

क्या है ग्वालियर की घटना?
ग्वालियर में सामने आए इस मामले में आरोप लगाया गया है कि कुछ असामाजिक और सामंतवादी सोच रखने वाले तत्वों ने डॉ. अंबेडकर की तस्वीर को सार्वजनिक रूप से जलाया.और वीडियो में साफ तौर पर जलाते हुये देखा गया है.यह घटना सामने आते ही स्थानीय स्तर पर तनाव की स्थिति बनने लगी है. हालांकि प्रशासन की ओर से प्रारंभिक स्तर पर सीमित जानकारी सामने आई, लेकिन सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानों के बाद यह मुद्दा तेजी से राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया.
राजनीतिक प्रतिक्रिया और बयानबाज़ी
इस घटना को लेकर बहुजन समाज पार्टी (BSP) सहित कई राजनीतिक दलों और नेताओं ने कड़ा रुख अपनाया.राज्यसभा सांसद इंजीनियर रामजी गौतम ने इस मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि बाबा साहेब का अपमान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान है. उन्होंने प्रशासन की चुप्पी पर भी सवाल उठाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है .
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की घटनाएँ समाज में पहले से मौजूद तनाव को और गहरा करती हैं और प्रशासन के लिए कानून-व्यवस्था बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बन जाती है.
दलित संगठनों में आक्रोश
ग्वालियर में अंबेडकर की तस्वीर जलाने का आरोप सामने आने के बाद विभिन्न दलित और सामाजिक संगठनों में भारी आक्रोश देखने को मिला है.कई संगठनों ने इसे सुनियोजित साजिश बताते हुए कहा कि बाबा साहेब के विचारों से डरने वाली ताकतें जानबूझकर ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रही हैं.
कुछ संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि दोषियों की पहचान कर उनके खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन और आंदोलन करने को मजबूर होंगे.
प्रशासन की भूमिका पर उठते सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल शासन-प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है. जानकारों का कहना है कि संवेदनशील मामलों में त्वरित कार्रवाई न होने से अफवाहें फैलती हैं और सामाजिक तनाव बढ़ता है.
यदि किसी सार्वजनिक स्थान पर संविधान निर्माता की तस्वीर जलाने जैसी घटना होती है, तो यह सीधे तौर पर कानून-व्यवस्था और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा मामला बन जाता है.
सामाजिक प्रभाव और बढ़ता तनाव
डॉ. अंबेडकर की तस्वीर जलाने का मामला सामने आने के बाद ग्वालियर में तनाव बढ़ने की खबरें भी सामने आईं. कुछ इलाकों में पुलिस की निगरानी बढ़ाई गई और प्रशासन को एहतियातन कदम उठाना पड़ा.
समाजशास्त्रियों के अनुसार, इस तरह की घटनाये, सामाजिक विभाजन को गहरा करता हैं,
वंचित समुदायों में असुरक्षा की भावना पैदा करता हैं, और लोकतांत्रिक संवाद की जगह टकराव को बढ़ावा देती हैं.
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बाबा साहेब अंबेडकर: केवल व्यक्ति नहीं, विचारधारा
बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं हैं, बल्कि वे समानता, न्याय और अधिकारों की विचारधारा का प्रतीक हैं. उनकी तस्वीर का अपमान उन मूल्यों को चुनौती देने जैसा है, जिन पर भारत का संविधान आधारित है.
यही कारण है कि अंबेडकर से जुड़ी किसी भी घटना को केवल कानून-व्यवस्था का मामला न मानकर सामाजिक संवेदनशीलता के दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिये .
कानूनी पहलू और कार्रवाई की ज़रूरत
भारतीय कानून में सार्वजनिक शांति भंग करने, धार्मिक या सामाजिक भावनाओं को आहत करने और राष्ट्रीय प्रतीकों या महापुरुषों के अपमान से जुड़े प्रावधान मौजूद हैं.विशेषज्ञों का कहना है कि,
दोषियों की जल्द पहचान, निष्पक्ष जांच, और सख्त कानूनी कार्रवाई, ही ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगा सकता है.
निष्कर्ष
ग्वालियर में बाबा साहेब अंबेडकर की तस्वीर जलाने का आरोप केवल एक स्थानीय घटना नहीं रह गया है. यह मामला अब राजनीतिक, सामाजिक और संवैधानिक बहस का केंद्र बन चुका है.
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हम संविधान निर्माता के सम्मान की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम हैं.
समय की मांग है कि प्रशासन निष्पक्ष और सख्त कार्रवाई करे, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि संविधान और उसके शिल्पकारों का अपमान किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

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