जीतन राम मांझी के बयान से उठा चुनावी धांधली का बड़ा सवाल: क्या यही है भारतीय लोकतंत्र?

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Ajit Kumar

बिहार
जीतन राम मांझी के बयान से उठा चुनावी धांधली का बड़ा सवाल: क्या यही है भारतीय लोकतंत्र?

क्या प्रशासनिक अधिकारी सत्ता के दबाव में निष्पक्षता से समझौता कर रहे हैं?

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,18 दिसंबर 2025— भारतीय लोकतंत्र की नींव निष्पक्ष चुनाव और संवैधानिक संस्थाओं की ईमानदारी पर टिका है.लेकिन जब सत्ता में बैठे नेता स्वयं चुनावी प्रक्रिया में हेरा-फेरी, प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग और कथित धांधली के तरीकों का सार्वजनिक मंच से खुलासा करें, तो यह केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह जाता है , बल्कि लोकतंत्र पर सीधा सवाल बन जाता है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के आधिकारिक X (Twitter) पोस्ट के अनुसार, केंद्रीय मंत्री और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बयान ने यही गंभीर बहस को छेड़ दिया है.

जीतन राम मांझी का बयान और उसका राजनीतिक अर्थ

RJD के अनुसार, जीतन राम मांझी ने खुले मंच से यह बताया कि किस प्रकार चुनावी नतीजों में कथित रूप से हेराफेरी कर सत्ता हासिल किया गया था . यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी विपक्षी नेता का आरोप नहीं, बल्कि स्वयं सत्ता पक्ष के एक वरिष्ठ नेता के कथित स्वीकारोक्ति जैसे प्रतीत होता है.

पोस्ट में दावा किया गया है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में टिकारी सीट पर हार के बावजूद प्रशासनिक सहयोग और कथित अनैतिक तरीकों से जीत सुनिश्चित की गई थी. यदि यह आरोप सही माने जाएं, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गहरा आघात है.

प्रशासनिक मशीनरी और चुनावी निष्पक्षता पर सवाल

RJD के पोस्ट में एक पूर्व जिलाधिकारी पर गंभीर आरोप लगाया गया हैं, जिनमें चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने और संवैधानिक शपथ के उल्लंघन की बात कही गई है. यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि,

क्या प्रशासनिक अधिकारी सत्ता के दबाव में निष्पक्षता से समझौता कर रहे हैं?

क्या चुनाव आयोग और उससे जुड़ी संस्थाएं वास्तव में स्वतंत्र रूप से कार्य कर पा रही हैं?

लोकतंत्र में प्रशासन की भूमिका निष्पक्ष रेफरी की होती है, न कि किसी टीम के खिलाड़ी की. ऐसे आरोप इस मूल सिद्धांत को चुनौती देते हैं.

2025 चुनाव और टिकारी विधानसभा की हार

RJD के अनुसार, 2025 के चुनाव में टिकारी विधानसभा क्षेत्र से हार के बाद जीतन राम मांझी कथित रूप से असंतोष और अफसोस जता रहे हैं.यह हार इस बात का संकेत माना जा रहा है कि इस बार कथित ,पुराना फॉर्मूला काम नहीं आया.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जनता का विश्वास सचमुच लोकतंत्र में बना रहता है, तो किसी भी प्रकार की धांधली स्थायी रूप से सफल नहीं हो सकता है.

तेजस्वी यादव और राजनीतिक संघर्ष

पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि इन कथित चुनावी हथकंडों का उद्देश्य युवा और जुझारू नेता तेजस्वी यादव को राजनीतिक रूप से कमजोर करना था.लेकिन RJD का दावा है कि तमाम प्रयासों के बावजूद यह रणनीति असफल रहा.

तेजस्वी यादव को बिहार की राजनीति में एक वैकल्पिक और जनसमर्थन प्राप्त नेता के रूप में देखा जाता है. ऐसे में उनके खिलाफ कथित साजिशों का मुद्दा केवल पार्टी राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युवा नेतृत्व और लोकतांत्रिक भविष्य से जुड़ जाता है.

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चुनाव आयोग की भूमिका पर बहस

सबसे बड़ा सवाल यही है—चुनाव आयोग कहां है?
RJD के अनुसार, जब सत्ता पक्ष के नेता स्वयं चुनावी धांधली के तरीके गिनवा रहे हों, तब चुनाव आयोग और संबंधित संवैधानिक संस्थाओं की चुप्पी लोकतंत्र को कमजोर करती है.

चुनाव आयोग की विश्वसनीयता ही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत रही है. यदि उस पर सवाल उठता हैं, तो यह पूरे सिस्टम के लिए खतरे की घंटी है.

मोदी सरकार और कृत्रिम लोकप्रियता का आरोप

RJD के X पोस्ट में मोदी सरकार पर ‘कृत्रिम लोकप्रियता’ गढ़ने का आरोप लगाया गया है,जिसमें कथित तौर पर सरकारी संसाधनों, धनबल और प्रशासनिक ताकत का उपयोग किया गया. यह आरोप राजनीतिक जरूर है, लेकिन यह जनता को यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या विकास और लोकप्रियता के दावे वास्तव में जमीनी हकीकत से जुड़े हैं या केवल प्रचार का हिस्सा हैं.

निष्कर्ष

राष्ट्रीय जनता दल द्वारा साझा किया गया यह मुद्दा केवल एक राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से जुड़ा प्रश्न है. यदि चुनाव निष्पक्ष नहीं होंगे, यदि प्रशासन स्वतंत्र नहीं होगा और यदि संवैधानिक संस्थाएं मौन रहेंगी, तो लोकतंत्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है.

सवाल अब यह नहीं है कि आरोप किसने लगाए, बल्कि यह है कि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कब और कैसे होगी?
सच को कितनी भी देर तक दबाया जाए, लोकतंत्र में अंततः जनता के सामने उसका पर्दाफाश होना तय है.

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