बांग्लादेशी पहचान का सवाल: कानून, राजनीति और गरीब

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Ajit Kumar

भारत
बांग्लादेशी पहचान का सवाल: कानून, राजनीति और गरीब

कौन-सी मशीन से पहचाने जा रहे हैं बांग्लादेशी? कंचना यादव का सवाल

तीसरा पक्ष ब्यूरो 1 जनवरी 2026 देश में नागरिकता, पहचान और प्रवासन (Migration) जैसे मुद्दे लंबे समय से राजनीति और प्रशासन के केंद्र में रहा हैं.राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की राष्ट्रीय प्रवक्ता कंचना यादव (@Kanchanyadav000) द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर की गई एक टिप्पणी ने इस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है. उनका सवाल सीधा और तीखा है कि,यह कौन-सी मशीन है जो बांग्लादेशियों को पहचान ले रही है?

कंचना यादव का यह बयान उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद में तैनात एक SHO के व्यवहार पर सवाल उठाता है, जहां बिहार के अररिया से आए गरीब लोगों को कथित तौर पर बांग्लादेशी बताकर निशाना बनाया गया! यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि लोकतंत्र, संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है.

X (Twitter) पोस्ट का संदर्भ

कंचना यादव ने अपने पोस्ट में लिखा कि जिस तरह से गरीब मजदूरों को बांग्लादेशी बताकर परेशान किया जा रहा है! वह बेहद चिंताजनक है. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या किसी पुलिस अधिकारी के पास ऐसी कोई,मशीन है, जिससे वह तय कर सकता है कि कौन भारतीय है और कौन बांग्लादेशी.

उन्होंने यह भी कहा कि अगर यही घटना किसी विपक्ष-शासित राज्य में होती, तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और तथाकथित गोदी मीडिया पूरे विपक्ष को कटघरे में खड़ा कर देती.

गरीब बनाम सत्ता: पहचान का संकट

गरीब बनाम सत्ता: पहचान का संकट

भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में करोड़ों लोग रोज़गार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से बड़ी संख्या में लोग दिल्ली-NCR, महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत में काम करने जाते हैं.

ऐसे में अगर भाषा, पहनावा या आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी को,विदेशी घोषित कर दिया जाये, तो यह न केवल अमानवीय है, बल्कि असंवैधानिक भी है.

कंचना यादव के बयान का मूल प्रश्न यही है कि गरीब होना कब से शक की वजह बन गया?

कानून क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है. इसके अलावा,

किसी भी व्यक्ति को विदेशी घोषित करने की एक तय कानूनी प्रक्रिया होती है,

पुलिस को मनमाने ढंग से किसी को बांग्लादेशी या अवैध प्रवासी कहने का अधिकार नहीं है,

नागरिकता का निर्धारण दस्तावेज़ों और विधिक जांच के आधार पर होता है, न कि शक या पूर्वाग्रह से, यदि बिना ठोस आधार के किसी भारतीय नागरिक को विदेशी बताया जाता है, तो यह मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है.

चयनात्मक सख्ती पर सवाल

कंचना यादव ने अपने पोस्ट में एक बेहद अहम सवाल उठाया— क्या इस SHO में इतनी हिम्मत है कि वह किसी अरबपति पर भी वही जांच करे?

यह सवाल व्यवस्था की उस चयनात्मक सख्ती (Selective Action) को उजागर करता है, जहां अक्सर गरीब, मजदूर और हाशिए पर खड़े लोग ही कार्रवाई का शिकार बनते हैं.बड़े उद्योगपति, प्रभावशाली लोग या रसूखदार वर्ग इस तरह की जांच से लगभग हमेशा दूर रहतेा हैं.

यह दोहरा मापदंड लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है.

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राजनीति और मीडिया की भूमिका

इस पूरे मामले में राजनीतिक दलों और मीडिया की भूमिका भी सवालों के घेरे में है.अगर यही घटना किसी गैर-बीजेपी शासित राज्य में होती, तो संभव है कि इसे राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया जाता.

लेकिन जब घटना बीजेपी-शासित राज्य में होती है, तो कई बड़े मीडिया संस्थान चुप्पी साध लेते हैं. यही वजह है कि कंचना यादव ने; गोदी मीडिया शब्द का इस्तेमाल करते हुए मीडिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाया है.

सामाजिक प्रभाव और डर का माहौल

इस तरह की घटनाओं का सबसे बड़ा असर समाज के कमजोर तबके पर पड़ता है. जब मजदूरों को डर हो कि कहीं उन्हें विदेशी न बता दिया जाए, तो यह उनके मानसिक स्वास्थ्य, रोज़गार और सम्मान तीनों को प्रभावित करता है.

यह डर न केवल संविधान की भावना के खिलाफ है, बल्कि देश की एकता और अखंडता के लिए भी घातक है.

निष्कर्ष

कंचना यादव का यह बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक गंभीर लोकतांत्रिक चेतावनी है.सवाल यह नहीं है कि अवैध प्रवासन पर कार्रवाई हो या नहीं, सवाल यह है कि कार्रवाई का तरीका क्या हो और निशाना कौन बने.

अगर गरीब होना अपराध बन जाएगा और पहचान शक के आधार पर तय होने लगेगी, तो यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए बेहद खतरनाक स्थिति होगी.

आज ज़रूरत है कि कानून का पालन निष्पक्षता से हो, मीडिया अपनी जिम्मेदारी समझे और प्रशासन यह याद रखे कि भारत का संविधान हर नागरिक को सम्मान और सुरक्षा की गारंटी देता है.

यह समाचार कंचना यादव के X (Twitter) पर प्रकाशित आधिकारिक वक्तव्य पर आधारित है.

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