VB-G RAM G बिल क्या है? सरकार के दावे और विपक्ष के आरोप
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,18 दिसंबर 2025 — कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पोस्ट में मोदी सरकार पर ऐसा हमला बोला है, जिसने संसद से लेकर सड़क तक राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है. उनका आरोप है कि केंद्र सरकार ने एक झटके में न सिर्फ राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का अपमान किया है, बल्कि ग्रामीण भारत की जीवनरेखा मानी जाने वाली काम के अधिकार की भावना को भी कमजोर कर दिया है.
यह विवाद तब गहराया जब सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) को हटाकर नया कानून ,
विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G बिल) — लोकसभा में पारित कर दिया है. विपक्ष इसे, सुधार, नहीं बल्कि संरचित dismantling यानी योजनाबद्ध कमजोर करने की कोशिश बता रहा है.
MGNREGA: सिर्फ योजना नहीं, ग्रामीण भारत का सुरक्षा कवच
साल 2005 में लागू हुआ MGNREGA महज एक सरकारी स्कीम नहीं था, बल्कि यह ग्रामीण गरीबों के लिए कानूनी अधिकार था. इस कानून ने पहली बार यह सुनिश्चित किया कि,
हर ग्रामीण परिवार को कम-से-कम 100 दिन का गारंटीड रोजगार मिले
काम मांगने पर 15 दिन में रोजगार न मिले तो भत्ता देना अनिवार्य हो
योजना डिमांड ड्रिवन रहे, यानी जितनी मांग, उतना काम और उतना बजट
महात्मा गांधी के नाम पर बनी यह योजना उनके ग्राम स्वराज के विचार को ज़मीन पर उतारने का प्रयास थी,आत्मनिर्भर गांव, सम्मानजनक रोजगार और सामाजिक न्याय.
MGNREGA के ठोस प्रभाव
करोड़ों गरीब परिवारों को स्थायी आय का सहारा
महिलाओं की भागीदारी 50% से अधिक
दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लिए सुरक्षा कवच
सूखा, बाढ़ और महामारी जैसे संकटों में जीवनरेखा
यही वजह है कि विपक्ष का कहना है,MGNREGA को कमजोर करना सीधे-सीधे ग्रामीण भारत को कमजोर करना है.
VB-G RAM G बिल: सरकार के दावे बनाम विपक्ष के सवाल
सरकार का दावा है कि नया बिल, विकसित भारत 2047 के विज़न के अनुरूप है.इसके तहत,
रोजगार के दिन 100 से बढ़ाकर 125 किए गए
डिजिटल निगरानी और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर
कृषि सीजन में काम पर आंशिक रोक
लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे और विपक्ष का कहना है कि ये बदलाव दिखावटी हैं, जबकि असली बदलाव अधिकारों को सीमित करने वाला हैं.
खड़गे की मुख्य आपत्तियाँ: क्यों बताया ‘तानाशाही कदम?
महात्मा गांधी का नाम हटाना
खड़गे का आरोप है कि योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाना सिर्फ नाम बदलना नहीं, बल्कि गांधीवादी विचारधारा पर हमला है. उनके अनुसार, यह उन ताकतों की सोच को दर्शाता है जो ऐतिहासिक रूप से गांधी के विचारों से असहमत रही हैं.
काम के अधिकार को कमजोर करना
MGNREGA एक कानूनी अधिकार था, जबकि नया बिल इसे सरकारी योजना बनाकर दान आधारित मॉडल में बदल देता है.
अब, केंद्र राज्यों को फिक्स फंड देगा,मांग ज्यादा होने पर भी अतिरिक्त काम की गारंटी नहीं
फंडिंग का बोझ राज्यों पर
पहले जहां केंद्र सरकार 90–100% खर्च उठाती थी, अब 60:40 मॉडल लागू होगा.इससे गरीब और पिछड़े राज्य सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे.
संघीय ढांचे पर चोट
योजना की योजना-निर्माण और निगरानी पूरी तरह केंद्र के हाथ में, जिससे राज्यों की भूमिका कमजोर होती है.
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संसद से सड़क तक संघर्ष का ऐलान
18 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बिल पास होते ही विपक्ष ने विरोध तेज कर दिया.
कांग्रेस, डीएमके, टीएमसी, सपा समेत कई दलों ने इसे गरीब-विरोधी कानून बताया.
कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने साफ कहा,
यह लड़ाई सिर्फ संसद की नहीं, गांव-गरीब-मजदूर की है. हम सड़क से सदन तक संघर्ष करेंगे.
देशव्यापी आंदोलनों की घोषणा के साथ यह संकेत भी दे दिया गया कि मामला यहीं थमने वाला नहीं है.
ग्रामीण भारत पर संभावित असर
अगर यह कानून पूरी तरह लागू होता है तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
सूखा या बाढ़ आने पर रोजगार की गारंटी खत्म
राज्य सरकारों पर भारी वित्तीय दबाव
ग्रामीण मजदूरी और क्रयशक्ति में गिरावट
गांधी के ग्राम स्वराज के विचार को गहरी चोट
आज भी औसत मजदूरी करीब ₹271 प्रतिदिन है, जो महंगाई के दौर में अपर्याप्त है. विपक्ष की मांग है,
₹400 न्यूनतम मजदूरी और 150 दिन का काम.
निष्कर्ष: विकास बनाम अधिकार की बहस
मल्लिकार्जुन खड़गे का हमला केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि एक बड़े लोकतांत्रिक सवाल को सामने लाता है,
क्या विकास के नाम पर गरीबों के अधिकार छीने जा सकते हैं?
एक तरफ विकसित भारत का नारा, दूसरी तरफ ग्रामीण गरीबों की असुरक्षा.यह टकराव बताता है कि आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ संसद तक सीमित नहीं रहेगा.
लोकतंत्र में संघर्ष जरूरी है,और यह संघर्ष अब ग्रामीण भारत की आवाज बन चुका है.

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