लालू यादव ने अपनी टिप्पणी में लोकतंत्र और समानता की अहमियत पर जोर दिया
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,14 जुलाई 2025:लालू प्रसाद यादव का तीखा बयान: जहाँ न्याय चुनिंदा लोगों के लिए हो वहाँ लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता वह दम तोड़ हि देता है.राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने एक्स पर एक अहम बयान जारी करते हुए लोकतंत्र, न्याय और सत्ता संतुलन पर चिंता जताई है.लालू यादव का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में न्यायपालिका के निष्पक्षता और सत्ता के केंद्रीकरण को लेकर बहस तेज हो गया है.उन्होंने बिना किसी का नाम लिए सत्ता संरचनाओं और कानूनी व्यवस्था पर सवाल उठाया हैं.जिसे राजनीतिक विश्लेषको ने गंभीर राजनीतिक संदेश मान रहे हैं.
लोकतंत्र, न्याय और सत्ता पर बड़ा सवाल
लालू प्रसाद यादव ने यह तीखा बयान जारी करते हुये लिखा है कि जहाँ न्याय चुनिंदा लोगों के लिए हो, वहाँ लोकतंत्र दम तोड़ देता है.वह फल-फूल नहीं सकता.जहाँ समानता और न्याय नहीं होता, वहाँ शांति नहीं रह सकता है.राजनीति में अक्सर बयान आते-जाते रहते हैं, लेकिन कुछ शब्द सीधे दिल और व्यवस्था को झकझोरते हैं. राष्ट्रीय जनता दल राजद ) के प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने ऐसा ही एक टिप्पणी X (पूर्व में ट्विटर) पर साझा की, जिसने सत्ता, न्याय और लोकतंत्र के संतुलन को लेकर गहरी बहस छेड़ दिया है.
क्या कहा लालू यादव ने?
अपने ऑफिशियल सोशल मीडिया हैंडल @laluprasadrjd से उन्होंने लिखा कि,
“जहाँ सत्ता पर नियंत्रण नहीं होता और न्याय कुछ चुनिंदा लोगों के लिए आरक्षित रहता है, वहाँ लोकतंत्र फल-फूल नहीं सकता. जहाँ समानता और न्याय नहीं होता, वहाँ शांति नहीं रह सकती.”
इस कथन ने न केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाई है बल्कि सोशल मीडिया पर भी एक नई बहस को जन्म दे दिया है.
बयान का राजनीतिक अर्थ क्या है?
लालू यादव ने किसी व्यक्ति या संस्था का तो नाम नहीं लिया लेकिन उनका इशारा स्पष्ट रूप से वर्तमान सत्ताधारी व्यवस्था और न्याय प्रणाली के निष्पक्षता पर सवाल उठाने जैसा लग रहा है.
विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान कई परतों में संदेश दे रहा है
- सत्ता के केंद्रीकरण पर चिंता
- न्यायिक पक्षपात के आरोपों पर कटाक्ष
- सामाजिक न्याय की वकालत
लालू यादव हमेशा से सामाजिक न्याय के राजनीति के स्तंभ रहे.उनका यह बयान भी उसी विचारधारा की निरंतरता को दर्शाता है. जिसमें हाशिए पर खड़े लोगों के लिए न्याय और समानता की मांग किया जाता रहा है.
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सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया
जैसे ही यह बयान सामने आया, ट्विटर (अब X) पर यह ट्रेड करने लगा. RJD समर्थकों ने इसे लोकतंत्र की रक्षा में दिया गया “सत्य का बयान” बताया, वहीं कुछ विरोधी दलों ने इसे “राजनीतिक हथकंडा” करार दिया है
राजनीतिक विशेषज्ञों का यह मानना है कि यह टिप्पणी केवल व्यवस्था पर चिंता नहीं बल्कि आने वाले बिहार चुनावों की रणनीति का भी हिस्सा भी हो सकता है. लालू यादव अक्सर सामाजिक न्याय और समानता को लेकर मुखर रहे हैं.और यह बयान उसी विचारधारा के निरंतरता को दर्शाता है.
क्या यह चुनावी रणनीति है?
2025 के अंत में बिहार में विधानसभा चुनाव होने की संभावना है.राजनीतिक पंडितों का यह मानना है कि लालू यादव के इस बयान के पीछे रणनीतिक उद्देश्य हो सकता है.यह बयान राजद के उस पुरानी छवि को फिर से मजबूत करता है.जिसमें वह खुद को “वंचितों की आवाज़” के रूप में प्रस्तुत करता है.
लोकतंत्र की दिशा और सवाल
लालू यादव के इस ट्वीट ने एक अहम सवाल उठाया है कि
क्या आज का लोकतंत्र सबके लिए न्याय सुनिश्चित कर पा रहा है?
यदि न्याय केवल कुछ लोगों तक हि सीमित रह जाए और सत्ता का लगाम निरंकुश हो जाये तो लोकतंत्र सिर्फ काग़ज़ी दस्तावेज़ बनकर रह जाता है. यही चेतावनी इस बयान में छिपा हुआ है.
निष्कर्ष: क्या यह सिर्फ बयान है या एक चेतावनी?
लालू यादव के शब्द केवल राजनीतिक बयान नहीं हैं. यह लोकतंत्र, समानता और न्याय की परिभाषा पर एक सवाल है.
यह देखना दिलचस्प होगा कि इस बयान पर अन्य राजनीतिक दल क्या प्रतिक्रिया देता है. और बिहार की जनता इस संदेश को किस रूप में लेती है.

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