बंगाल की संस्कृति, पहचान और लोकतंत्र की रक्षा: बांकुरा से ममता बनर्जी का सशक्त संदेश

| BY

Ajit Kumar

भारत
बंगाल की संस्कृति, पहचान और लोकतंत्र की रक्षा: बांकुरा से ममता बनर्जी का सशक्त संदेश

भाषा और पहचान पर हमला: बांग्ला-विरोधी राजनीति का आरोप

तीसरा पक्ष ब्यूरो बंगाल, 31 दिसंबर— पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में बांकुरा की धरती से एक ऐसा संदेश दिया है , जो केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल की संस्कृति, भाषा, पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों की गहरी चिंता को सामने रखता है.अपने आधिकारिक X पोस्ट में उन्होंने बंगाल की ऐतिहासिक विरासत, वर्तमान राजनीतिक चुनौतियों और नागरिक अधिकारों पर हो रहे कथित हमलों को स्पष्ट शब्दों में उठाया. यह बयान न केवल राज्य की राजनीति में हलचल पैदा करता है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों पर बहस को भी तेज करता है.

बांकुरा: कला, आध्यात्म और सांस्कृतिक विरासत की भूमि

बांकुरा: कला, आध्यात्म और सांस्कृतिक विरासत की भूमि

ममता बनर्जी ने अपने संदेश में बांकुरा को भारत की कलात्मक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत केंद्र बताया. यह वही भूमि है, जिसने माँ शारदा देवी की दिव्य यात्रा को जन्म दिया और जैमिनी रॉय जैसे महान कलाकार को गढ़ा.रामानंद चट्टोपाध्याय की लेखनी, रामकिंकर बैज की मूर्तिकला और जदुनाथ भट्टाचार्य द्वारा समृद्ध किया गया बिष्णुपुर घराना,ये सभी बंगाल की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक हैं.

बिष्णुपुर के मिट्टी के मंदिर, पंचमुरा की टेराकोटा कला, बलुचारी और स्वर्णचारी साड़ियों की भव्यता तथा डोकरा धातु शिल्प,ये केवल कला के रूप नहीं, बल्कि बंगाल की सामूहिक चेतना और आत्मसम्मान की पहचान हैं.ममता बनर्जी के अनुसार, यह विरासत भारत ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रशंसा का विषय है.

माँ-माती-मनुष्य सरकार और विकास का दावा

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी,माँ-माती-मनुष्य’ सरकार ने हमेशा विकास और विरासत के संतुलन को प्राथमिकता दिया है.उनका दावा है कि बंगाल में सामाजिक कल्याण योजनाओं, सांस्कृतिक संरक्षण और जनभागीदारी के माध्यम से एक समावेशी विकास मॉडल को आगे बढ़ाया गया है.

हालांकि, उन्होंने कुछ ताकतों पर आरोप लगाया कि वे बंगाल को निडर और निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ते देखकर असहज हो जाती हैं और राज्य को बदनाम करने के लिए दुष्प्रचार का सहारा लेती हैं.

राष्ट्रीय घटनाओं का हवाला और तीखे सवाल

ममता बनर्जी ने अपने बयान में पहलगाम, दिल्ली और विशेष गहन पुनरीक्षण अभियानों का उल्लेख करते हुए केंद्र और अन्य राज्यों की सरकारों पर अप्रत्यक्ष सवाल खड़ा किया है . उन्होंने पूछा कि यदि व्यवधान और त्रासदियां केवल बंगाल तक सीमित नहीं हैं, तो फिर बंगाल को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है?

उन्होंने 57 नागरिकों की मौत का हवाला देते हुए यह सवाल भी उठाया कि ऐसे मामलों में नैतिक जिम्मेदारी कौन लेगा और पीड़ित परिवारों के दुख का भार कौन उठाएगा.

ये भी पढ़े :देश में तलवारें बाँटी जा रही हैं… देश किस दिशा में जा रही है?
ये भी पढ़े :एंजेल चकमा की हत्या: नस्लीय नफरत ने फिर छीनी एक भारतीय की जिंदगी

भाषा और पहचान पर हमला: बांग्ला-विरोधी राजनीति का आरोप

मुख्यमंत्री के बयान का सबसे संवेदनशील और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हिस्सा बंगाली भाषा और पहचान से जुड़ा है. उन्होंने आरोप लगाया कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम कर रहे बंगालियों को केवल बंगाली बोलने के कारण परेशान किया जा रहा है और उन्हें बांग्लादेशी कहकर अपमानित किया जा रहा है.

ममता बनर्जी के अनुसार, यह केवल भाषा का अपमान नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक पहचान और अस्तित्व पर सीधा हमला है.उन्होंने चेतावनी है कि जो ताकतें बंगाल की भाषा और लोगों का सम्मान नहीं कर सकता है , वे राज्य की विरासत के लिए गंभीर खतरा हैं.

लोकतंत्र, मतदाता अधिकार और चेतावनी

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि एक भी वैध मतदाता को अन्यायपूर्वक सूची से हटाया गया, तो बंगाल की जनता की अंतरात्मा दिल्ली तक गूंजेगी.उनके अनुसार, लोकतंत्र किसी भी दल की सुविधा के अनुसार बदला नहीं जा सकता और न ही अधिकारों को दबाव के जरिए खत्म किया जा सकता है.

उन्होंने क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूँ, शिविरों का ज़िक्र करते हुए बताया कि राज्य सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी नागरिक खुद को उपेक्षित या शक्तिहीन न महसूस करे.

राजनीति नहीं, अधिकारों की रक्षा का दावा

ममता बनर्जी ने यह स्पष्ट किया कि उनका बांकुरा जाना वोट मांगने के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक गारंटियों और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए था.उन्होंने कहा कि जनता की आवाज़ की रक्षा करना ही उनकी एकमात्र राजनीति है.

निष्कर्ष

ममता बनर्जी का यह बयान केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि बंगाल की संस्कृति, भाषा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का घोषणापत्र है. जय बांग्ला के नारे के साथ दिया गया यह संदेश राज्य की अस्मिता और एकता को मजबूत करने का प्रयास है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह बयान बंगाल की राजनीति और राष्ट्रीय विमर्श को किस दिशा में ले जाता है,लेकिन इतना तय है कि बंगाल अन्याय के सामने झुकने वाला नहीं है.

Trending news

Leave a Comment