कांग्रेस का बड़ा ऐलान, मज़दूरों के अधिकारों की निर्णायक लड़ाई
तीसरा पक्ष ब्यूरो दिल्ली 27 दिसंबर — भारत में ग्रामीण रोज़गार और सामाजिक सुरक्षा की सबसे अहम योजनाओं में से एक महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने CWC (कांग्रेस वर्किंग कमेटी) की बैठक के बाद X (पूर्व में ट्विटर) पर घोषणा करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी 5 जनवरी से ,मनरेगा बचाओ अभियान की शुरुआत करेगी.यह अभियान केवल एक योजना को बचाने की मुहिम नहीं है, बल्कि संविधान से मिले काम के अधिकार और ग्रामीण मज़दूरों के सम्मान की रक्षा का संकल्प है.
मनरेगा: योजना नहीं, संविधान से मिला अधिकार
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पोस्ट में स्पष्ट शब्दों में कहा कि मनरेगा कोई दया या ख़ैरात की योजना नहीं, बल्कि यह भारतीय संविधान से उपजा हुआ काम का अधिकार है.मनरेगा ने पिछले डेढ़ दशक में करोड़ों ग्रामीण परिवारों को न्यूनतम रोज़गार सुरक्षा दिया है, विशेषकर आर्थिक संकट, महामारी और बेरोज़गारी के दौर में.
मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन का रोज़गार देने की गारंटी दी गई है, जो सीधे तौर पर गरीबी उन्मूलन, पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने में सहायक रही है.
CWC की शपथ और पांच प्रमुख बिंदु
CWC की बैठक में कांग्रेस पार्टी ने मनरेगा को लेकर एक सामूहिक शपथ लिया है, जिसमें पांच अहम बिंदुओं को सामने रखा गया है,
मनरेगा की हर हाल में रक्षा
कांग्रेस ने स्पष्ट किया कि वह मनरेगा को कमजोर करने या खत्म करने की किसी भी कोशिश का विरोध करेगी.
काम के अधिकार की संवैधानिक रक्षा
पार्टी का कहना है कि मनरेगा संविधान के मूल्यों से जुड़ा है और इसे कमजोर करना लोकतंत्र को कमजोर करना है.
ग्रामीण मज़दूरों के सम्मान और अधिकारों की लड़ाई
रोज़गार, मज़दूरी, समय पर भुगतान और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के लिए संगठित संघर्ष किया जाएगा.
ग्राम सभा और मांग-आधारित रोज़गार की सुरक्षा
मनरेगा की आत्मा ग्राम सभा और मांग के आधार पर काम उपलब्ध कराना है, जिसे कमजोर नहीं होने दिया जायेगा .
गांधी जी के नाम और मज़दूर अधिकार पर साज़िश का विरोध
कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मनरेगा से महात्मा गांधी का नाम हटाने और मज़दूरों के अधिकार को ख़ैरात में बदलने की साज़िशें हो रही हैं, जिनका लोकतांत्रिक तरीके से विरोध किया जायेगा .
मनरेगा बचाओ अभियान क्यों ज़रूरी?
पिछले कुछ वर्षों में मनरेगा को लेकर कई सवाल उठा हैं,
बजट में कटौती, भुगतान में देरी, काम के दिनों में कमी
तकनीकी जटिलताओं के कारण मज़दूरों को काम न मिलना
इन परिस्थितियों में कांग्रेस का मानना है कि यदि समय रहते आवाज़ नहीं उठाई गई, तो यह योजना धीरे-धीरे कमजोर कर दिया जायेगा . इसी वजह से गांव-गांव तक आवाज़ बुलंद करने का संकल्प लिया गया है.
लोकतंत्र और संविधान की रक्षा से जुड़ा सवाल
मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने पोस्ट में मनरेगा को सीधे संविधान और लोकतंत्र से जोड़ा.उनका कहना है कि जब मज़दूर के काम का अधिकार सुरक्षित होगा, तभी लोकतंत्र मजबूत रहेगा.
मनरेगा केवल रोज़गार नहीं देता, बल्कि यह ग्रामीण नागरिकों को सम्मान, भागीदारी और आत्मनिर्भरता का एहसास कराता है.
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राजनीतिक संदेश और आने वाले समय की रणनीति
मनरेगा बचाओ अभियान, को कांग्रेस की आगामी राजनीतिक रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है. ग्रामीण भारत आज भी देश की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और मनरेगा वहां की जीवनरेखा है.
यह अभियान कांग्रेस को जमीनी स्तर पर फिर से मज़बूती देने, मज़दूरों और किसानों से सीधा संवाद स्थापित करने का माध्यम बन सकता है.
निष्कर्ष
मल्लिकार्जुन खड़गे के X पोस्ट से स्पष्ट है कि कांग्रेस मनरेगा को लेकर किसी भी तरह का समझौता करने के मूड में नहीं है.मनरेगा बचाओ अभियान,केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि यह मज़दूरों के अधिकार, संविधान की आत्मा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है.
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 5 जनवरी से शुरू होने वाला यह अभियान देशभर में कितना असर डालता है और क्या यह ग्रामीण मज़दूरों की आवाज़ को केंद्र की सत्ता तक मजबूती से पहुंचा पाता है.
जय संविधान, जय हिन्द
यह खबर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के X (Twitter) पोस्ट के आधार पर तैयार की गई है.

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