NDA को प्रचंड बहुमत मिला, फिर भी तेजस्वी यादव पर बयानबाज़ी क्यों?
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 24 दिसंबर 2025 बिहार की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प और विरोधाभासी तस्वीर देखने को मिल रहा है. विधानसभा चुनाव में एनडीए को मिले कथित प्रचंड बहुमत के बावजूद उसके नेताओं के बयानों में आत्मविश्वास की जगह असहजता और बेचैनी साफ झलक रहा है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रदेश प्रवक्ता चित्तरंजन गगन का कहना है कि यह स्थिति सामान्य नहीं बल्कि इस बात का प्रमाण है कि एनडीए के नेता आज भी तेजस्वी यादव से मानसिक रूप से मुक्त नहीं हो पाए हैं.
राजनीति में आमतौर पर हारने वाला दल सदमे में होता है, लेकिन बिहार की वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति में एक अलग ही दृश्य सामने आ रहा है. जीतने के बाद भी एनडीए के नेता जीत के सदमे से उबर नहीं पाया हैं. यह पहली बार है जब सत्ता में आने के बाद भी किसी गठबंधन के नेता लगातार विपक्ष, विशेषकर तेजस्वी यादव, पर बयानबाज़ी करते नजर आ रहे हैं.
जीत के बाद भी विपक्ष पर हमले क्यों?
राजद प्रवक्ता चित्तरंजन गगन ने सवाल उठाया है कि अगर एनडीए को सचमुच जनादेश का इतना बड़ा समर्थन मिला है, तो फिर उसे विपक्ष पर टिका-टिप्पणी करने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? आमतौर पर जब किसी गठबंधन को स्वाभाविक और जनभावनाओं से जुड़ी जीत मिलती है, तो उसकी प्राथमिकता शासन, विकास और जनता की अपेक्षाओं को पूरा करने पर होती है.
लेकिन बिहार में तस्वीर उलट दिखाई दे रहा है.एनडीए नेताओं के बयानों में आत्ममंथन, विनम्रता और गंभीरता की जगह आक्रामकता और हल्कापन दिख रहा है.यह व्यवहार इस बात की ओर इशारा करता है कि गठबंधन के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है.
तेजस्वी फोबिया बना राजनीतिक चर्चा का केंद्र
राजद का आरोप है कि एनडीए के नेता आज भी अपने दिल और दिमाग से तेजस्वी यादव को निकाल नहीं पाया हैं.यही कारण है कि हर राजनीतिक बयान, हर प्रेस कॉन्फ्रेंस और हर मंच पर तेजस्वी यादव का नाम बार-बार लिया जा रहा है.इसे ही राजद ने तेजस्वी फोबिया करार दिया है.
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो अगर विपक्ष कमजोर होता, तो सत्ता पक्ष को बार-बार उसका उल्लेख करने की जरूरत ही नहीं पड़ती. यह तथ्य अपने आप में यह संकेत देता है कि बिहार की जनता के बीच तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और स्वीकार्यता अब भी मजबूत बनी हुई है.
जनसमर्थन की असली तस्वीर क्या कहती है?
चित्तरंजन गगन का दावा है कि एनडीए नेताओं के बयान ही इस बात का प्रमाण हैं कि जनसमर्थन के मामले में तेजस्वी यादव आज भी उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं.उन्होंने कहा कि जनाधार के लिहाज़ से एनडीए के कई नेता तेजस्वी यादव के सामने बौने साबित हो रहा हैं.
अगर जनादेश पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में होता, तो सरकार बनाने के बाद उसका पूरा ध्यान नीतियों, योजनाओं और जनता के विश्वास को मजबूत करने पर होता. लेकिन लगातार विपक्ष को निशाना बनाना इस बात की ओर इशारा करता है कि भीतर ही भीतर असुरक्षा का भाव मौजूद है.
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एनडीए के भीतर अंदरूनी खींचतान?
राजद प्रवक्ता ने यह भी आरोप लगाया कि एनडीए और उसके सहयोगी दलों के भीतर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. उन्होंने कहा कि भाजपा और जदयू के नेता एक-दूसरे पर दबाव बनाने के लिए और अपने विधायकों को नियंत्रित रखने के उद्देश्य से यह दावा कर रहे हैं कि विपक्षी दल उनके विधायकों से संपर्क कर रहे हैं.
राजनीति में इस तरह के बयान अक्सर तब सामने आते हैं जब गठबंधन के भीतर अविश्वास और असंतोष की स्थिति होती है. ऐसे दावे यह दर्शाते हैं कि सत्ता पक्ष अपने ही विधायकों की निष्ठा को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं है.
स्वाभाविक बनाम गैर-स्वाभाविक जीत
राजद ने स्वाभाविक और गैर-स्वाभाविक जीत के अंतर को भी रेखांकित किया है. स्वाभाविक जीत वह होती है जिसमें जनता का विश्वास स्पष्ट रूप से झलकता है और सरकार उस विश्वास की कसौटी पर खरा उतरने के लिए खुद को जिम्मेदार महसूस करती है.वहीं, गैर-स्वाभाविक जीत में अक्सर सत्ता पक्ष रक्षात्मक रवैया अपनाता है और विपक्ष को लगातार निशाने पर रखता है.
बिहार की वर्तमान राजनीति में दिखाई दे रहा व्यवहार इसी दूसरे प्रकार की ओर इशारा करता है, ऐसा राजद का कहना है.
निष्कर्ष
एनडीए को मिले बहुमत के बाद भी उसके नेताओं की बयानबाज़ी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या यह जीत वास्तव में मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास देने वाली है? या फिर यह जीत अपने साथ असुरक्षा और बेचैनी भी लेकर आई है?
राजद का दावा है कि जब तक बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव सक्रिय हैं, तब तक एनडीए के नेता उनसे नजरें नहीं हटा पाएंगे.तेजस्वी फोबिया केवल एक राजनीतिक शब्द नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीति का संकेत बनता जा रहा है.

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