नॉर्थईस्ट भारत आज भी खुद को पराया क्यों महसूस करता है?

| BY

Ajit Kumar

भारत
नॉर्थईस्ट भारत में अलगाव की भावना पर विशेष रिपोर्ट

इतिहास, नस्लवाद, AFSPA और विकास की असमानता की कहानी

तीसरा पक्ष आलेख नॉर्थईस्ट, 13 जनवरी 2026 — भारत का नॉर्थईस्ट क्षेत्र, जिसे सेवन सिस्टर्स और सिक्किम के नाम से जाना जाता है — प्राकृतिक सौंदर्य, सांस्कृतिक विविधता और जैव-विविधता का खजाना है.बावजूद इसके, वर्ष 2026 में भी यहां के लाखों नागरिक खुद को, मेनस्ट्रीम इंडिया से कटा हुआ महसूस करता हैं.

यह भावना केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि इतिहास, नस्लीय अनुभव, नीतिगत फैसलों और विकास की असमानता से जुड़ी एक गहरी सामाजिक सच्चाई है.

इतिहास की विरासत: जहां से दूरी शुरू हुई

1947 के विभाजन ने नॉर्थईस्ट को सबसे गहरा झटका दिया था. पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) बनने के बाद यह क्षेत्र अपने पारंपरिक व्यापार मार्गों से कट गया.सिलिगुड़ी कॉरिडोर की 22 किमी चौड़ी संकरी पट्टी ने भौगोलिक ही नहीं, बल्कि मानसिक दूरी भी पैदा किया.

ब्रिटिश काल में ,एक्सक्लूडेड एरिया नीति ने स्थानीय समुदायों को प्रशासनिक रूप से भी अलग रखा, जिसकी छाया आज तक बनी हुई है.

नस्लीय भेदभाव: रोजमर्रा का दर्द

नॉर्थईस्ट के लोगों के शारीरिक फीचर्स अक्सर नस्लीय तानों का कारण बनते हैं.
देश के बड़े शहरों में ,चाइनीज, नेपाली जैसे शब्द अब भी आम हैं.

कोविड-19 काल में यह भेदभाव खुलकर सामने आया, जब नॉर्थईस्ट के नागरिकों को वायरस फैलाने वाला तक कहा गया.
यह अनुभव युवाओं में यह सवाल पैदा करता है — अगर हम भारतीय हैं, तो हमें अलग क्यों देखा जाता है?

AFSPA: सुरक्षा बनाम भरोसा

1958 से लागू AFSPA नॉर्थईस्ट में विश्वास की सबसे बड़ी बाधा रहा है.
हालांकि हाल के वर्षों में कई इलाकों से इसे हटाया गया, लेकिन दशकों तक, डिस्टर्ब्ड एरिया में रहने का मनोवैज्ञानिक असर आज भी बना हुआ है.

स्थानीय समुदाय इसे कानून से ज्यादा अपने खिलाफ अविश्वास का प्रतीक मानते हैं.

विकास की असमानता और बेरोजगारी

तेल, गैस, चाय, हाइड्रोपावर जैसे संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद नॉर्थईस्ट का आर्थिक योगदान सीमित है.

सीमित उद्योग, रोजगार के अवसरों की कमी, केंद्र-निर्देशित योजनाएं

नतीजतन, युवा पलायन करते हैं और महानगरों में फिर भेदभाव झेलते हैं.

पहचान का संघर्ष और जातीय तनाव

200 से अधिक जनजातियां और 220 से ज्यादा भाषाएं — यह विविधता ताकत भी है और चुनौती भी है.
मणिपुर, असम और नागालैंड में समय-समय पर उभरते संघर्ष पहचान और संसाधनों की लड़ाई को दिखाता हैं.

लोग चाहते हैं कि विकास हो, लेकिन संस्कृति की कीमत पर नहीं.

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सकारात्मक बदलाव: उम्मीद की किरण

पिछले एक दशक में कई ठोस कदम उठाए गए

एक्ट ईस्ट पॉलिसी को मजबूती, सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी में सुधार

उग्रवाद में गिरावट, पर्यटन और ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा

लेकिन स्थानीय स्तर पर अभी भी इन्हें अधूरा” माना जाता है.

आगे की राह: समाधान क्या है?

AFSPA का चरणबद्ध पूर्ण हटाव

स्कूल पाठ्यक्रम में नॉर्थईस्ट का इतिहास

स्थानीय नेतृत्व को नीति-निर्माण में भागीदारी

राष्ट्रीय मीडिया में संतुलित प्रतिनिधित्व

स्थानीय उद्योग और स्टार्टअप को बढ़ावा

निष्कर्ष

नॉर्थईस्ट आज भी खुद को पराया इसलिए महसूस करता है क्योंकि इतिहास ने दूरी बनाई, नस्लवाद ने जख्म दिए और नीतियों ने भरोसा तोड़ा. लेकिन अगर विविधता को सम्मान और विकास को साझेदारी बनाया जाए, तो नॉर्थईस्ट सिर्फ भारत का हिस्सा नहीं — भारत की ताकत बन सकता है.

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