अमेरिका की दादागिरी के खिलाफ सड़क पर उतरी जनता, वेनेजुएला की संप्रभुता के समर्थन में एकजुटता
तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 5 जनवरी 2026— वेनेजुएला पर अमेरिका द्वारा किया गया सैन्य आक्रमण, राजधानी काराकस पर बमबारी, अंतरराष्ट्रीय कानूनों के उल्लंघन और लोकतांत्रिक रूप से चुने गये राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के अपहरण जैसी घटनाओं के खिलाफ आज पटना में जोरदार विरोध प्रदर्शन किया गया है. यह प्रतिवाद ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट (AIPF) के बैनर तले आयोजित हुआ, जिसमें विभिन्न जनसंगठनों, किसान संगठनों, छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया.
विरोध सभा में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि वेनेजुएला पर किया गया यह हमला केवल एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि दुनिया भर के उन सभी देशों और जनता के खिलाफ है जो साम्राज्यवादी ताकतों से स्वतंत्र होकर अपना भविष्य तय करना चाहता हैं. प्रदर्शनकारियों ने इसे अमेरिकी साम्राज्यवाद की खुली दादागिरी और वैश्विक लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बताया.

यह युद्ध लोकतंत्र और संप्रभुता पर सीधा हमला है
सभा को संबोधित करते हुए खेग्राम्स के महासचिव धीरेंद्र झा, सामाजिक कार्यकर्ता गोपाल कृष्ण, एमएलसी शशि यादव, किसान नेता शंभू नाथ मेहता, कुमार परवेज, दिव्या गौतम, AISA नेता सबा आफरीन और पूर्व विधायक गोपाल रविदास सहित अन्य वक्ताओं ने कहा कि अमेरिका द्वारा थोपा गया यह युद्ध लोकतांत्रिक मूल्यों, अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का खुला उल्लंघन है.
वक्ताओं ने कहा कि जिस तरह इराक पर हमले के समय,विनाशकारी हथियारों का झूठा बहाना गढ़ा गया था, उसी तरह आज वेनेजुएला के खिलाफ नारको-आतंकवाद, का झूठा नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है, ताकि वहां की चुनी हुई सरकार को गिराया जा सके और देश के संसाधनों पर कब्जा किया जा सके.

तेल की लूट के लिए युद्ध थोपने का आरोप
विरोध सभा में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि वेनेजुएला दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार वाले देशों में से एक है. वक्ताओं का कहना था कि ट्रंप प्रशासन द्वारा थोपा गया यह युद्ध अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों की रक्षा और वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जा जमाने की साजिश का हिस्सा है.
उन्होंने कहा कि अमेरिका का इतिहास इस बात का गवाह है कि जब भी किसी देश ने अपने प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभु नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश की, तब-तब उस पर आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य हमला या तख्तापलट थोपा गया है.
लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप का लंबा इतिहास
सभा में अमेरिका के लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में हस्तक्षेप के लंबे और रक्तरंजित इतिहास को भी रेखांकित किया गया. वक्ताओं ने ग्वाटेमाला, चिली, ग्रेनाडा, पनामा और अन्य देशों के उदाहरण देते हुए कहा कि तथाकथित मोनरो सिद्धांत हमेशा से इस क्षेत्र के देशों को उनकी संप्रभुता और आत्मनिर्णय के अधिकार से वंचित करने का औजार रहा है.
उन्होंने कहा कि चुनावों में हस्तक्षेप, लोकतांत्रिक सरकारों को गिराना, जन आंदोलनों का दमन और हिंसा,यह सब अमेरिकी विदेश नीति का हिस्सा रहा है, और वेनेजुएला पर हमला उसी सिलसिले की अगली कड़ी है.
भारत सरकार की चुप्पी पर सवाल
विरोध सभा में इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की गई कि भारत सरकार ने अब तक इस अमेरिकी आक्रमण की खुली निंदा नहीं किया है.वक्ताओं ने इसे शर्मनाक करार देते हुए कहा कि भारत, जो स्वयं उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष से निकला देश है, उसे ऐसे हमलों के खिलाफ स्पष्ट और साहसिक रुख अपनाना चाहिये.
सभा से मांग की गई कि मोदी सरकार तत्काल अमेरिका के इस आक्रमण की निंदा करे, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वेनेजुएला की संप्रभुता का समर्थन करे और युद्ध विरोधी वैश्विक आवाज़ के साथ खड़ी हो.
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व्यापक भागीदारी, एकजुटता का संदेश
कार्यक्रम का संचालन AIPF संयोजक कमलेश शर्मा ने किया. इस अवसर पर भाकपा-माले के वरिष्ठ नेता के. डी. यादव, किसान सभा के नेता उमेश सिंह, सामाजिक कार्यकर्ता पंकज श्वेताभ, सुनील कुमार, पटना नगर सचिव जितेंद्र कुमार, शहजादे आलम, डॉ. प्रकाश कुमार, आफ्शा जबीं, पुनीत पाठक, आशुतोष कुमार, प्रमोद यादव, मुर्तजा अली, अनय मेहता, राखी मेहता, संजय कुमार सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे.
दुनिया की लोकतांत्रिक ताकतें एकजुट हों
सभा के अंत में यह आह्वान किया गया कि दुनिया भर की लोकतांत्रिक, शांतिप्रिय और न्यायप्रिय ताकतें इस साम्राज्यवादी आक्रमण के खिलाफ एकजुट हों.वक्ताओं ने कहा कि यदि आज वेनेजुएला पर हुए इस हमले का विरोध नहीं किया गया, तो कल किसी और देश की संप्रभुता भी खतरे में पड़ सकता है.
प्रदर्शन के दौरान जोरदार नारे लगाए गए,
वेनेजुएला की जनता के साथ अटूट एकजुटता!
वेनेजुएला से दूर हटो!
अमेरिकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
यह विरोध प्रदर्शन न केवल वेनेजुएला के समर्थन में था, बल्कि दुनिया भर में साम्राज्यवादी युद्धों और दखलअंदाजी के खिलाफ एक मजबूत राजनीतिक संदेश भी था.

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