भारत के राजनीतिक बंदियों को आज़ाद करो: क्यों ज़रूरी है यह मांग

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Ajit Kumar

भारतबिहार
भारत के राजनीतिक बंदियों को आज़ाद करो: क्यों ज़रूरी है यह मांग

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर लोकतंत्र के कटघरे में खड़ा न्याय

तीसरा पक्ष ब्यूरो नई दिल्ली, 5 जनवरी 2026— भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 5 जनवरी 2026 की तारीख एक बार फिर नागरिक स्वतंत्रताओं, असहमति के अधिकार और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करती है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुलफिशां फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को ज़मानत दिए जाने के साथ-साथ उमर खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत से वंचित रखना, केवल एक कानूनी फैसला नहीं है, बल्कि यह लोकतांत्रिक चेतना पर सीधा आघात है.

बिना मुक़दमे के सालों की कैद: न्याय या उत्पीड़न?

उमर खालिद और शरजील इमाम पिछले पांच वर्षों से अधिक समय से बिना मुक़दमे के हिरासत में हैं. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जिसमें त्वरित और निष्पक्ष सुनवाई भी शामिल है. इसके बावजूद, वर्षों तक मुक़दमे की शुरुआत तक न होना और फिर ज़मानत से इनकार करना यह दर्शाता है कि यूएपीए जैसे कठोर कानूनों का इस्तेमाल दंड से पहले ही सजा देने के औज़ार के रूप में किया जा रहा है.

सुप्रीम कोर्ट का यह कहना कि उनके खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया पर्याप्त सबूत मौजूद हैं, और उन्हें एक साल बाद या संरक्षित गवाहों की गवाही के बाद ज़मानत याचिका पुनः दाखिल करने की,इजाज़त देना, न्याय के मूल सिद्धांतों को उलट देने जैसा है.

असहमति को अपराध बनाती व्यवस्था

यह मामला केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं है. यह उस राज्य प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिसमें असहमति, सवाल और आलोचना को राष्ट्रविरोधी ठहराकर कुचला जा रहा है.जिन युवाओं, छात्रों और बुद्धिजीवियों ने लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखी, उन्हें साज़िश, आतंक और देशद्रोह जैसे आरोपों में फंसा दिया गया.

दिल्ली पुलिस द्वारा लगाए गए मनगढ़ंत आरोपों पर गंभीर सवाल पहले ही उठ चुका हैं. इसके बावजूद, न्यायपालिका का इन मामलों में हस्तक्षेप न करना, नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में एक गहरी विफलता को दर्शाता है.

सुप्रीम कोर्ट से टूटी उम्मीदें

दिल्ली हाई कोर्ट से ज़मानत न मिलने के बाद, देश की लोकतांत्रिक जनता की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी थीं. यह उम्मीद की जा रही थी कि सर्वोच्च न्यायालय संविधान, नागरिक अधिकारों और असहमति की रक्षा करेगा.लेकिन आज का फैसला इस उम्मीद को तोड़ने वाला साबित हुआ है .

यह स्थिति उस कुख्यात ए.डी.एम. जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) फैसले की याद दिलाती है, जब आपातकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने नागरिक अधिकारों की रक्षा करने से इनकार कर दिया था. इतिहास ने उस फैसले को न्यायपालिका की सबसे बड़ी भूलों में से एक माना.आज, एक बार फिर वही सवाल खड़ा है कि,क्या सुप्रीम कोर्ट ने इतिहास से कुछ सीखा?

लोकतांत्रिक संस्थाओं का पतन

आज न्यायालय स्वयं कटघरे में खड़ा दिखाई देता है.जब अदालतें सत्ता के दमनकारी रवैये के सामने ढाल बनने के बजाय मौन साध लेती हैं, तो लोकतंत्र खोखला हो जाता है.बिना मुक़दमे के लंबी कैद, ज़मानत को अपवाद बनाना और कठोर कानूनों को चुनौती न देना, न्याय प्रणाली के भीतर गहरे संकट को उजागर करता है.

यह फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक और संवैधानिक विफलता भी है.

जनता की भूमिका: अब लड़ाई सड़कों पर है

ऐसे समय में जब संस्थागत लोकतंत्र कमजोर पड़ रहा है, देश की जनता की भूमिका और भी अहम हो जाती है.केंद्रीय कमेटी, भाकपा(माले) लिबरेशन की ओर से जारी यह आह्वान केवल एक राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि लोकतंत्र बचाने की अपील है.

भारत की लोकतांत्रिक जनता को आगे आकर यह स्पष्ट करना होगा कि,असहमति अपराध नहीं है.

विचारों को जेल में नहीं डाला जा सकता, बिना मुक़दमे के कैद स्वीकार्य नहीं है,

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भारत के राजनीतिक बंदियों की रिहाई क्यों ज़रूरी है?

राजनीतिक बंदियों की रिहाई केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सवाल नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों, लोकतांत्रिक परंपराओं और मानवाधिकारों की रक्षा से जुड़ा हुआ है.यदि आज इन आवाज़ों को खामोश कर दिया गया, तो कल कोई भी सवाल पूछने वाला सुरक्षित नहीं रहेगा.

निष्कर्ष: लोकतंत्र की बहाली की लड़ाई

आज यह जिम्मेदारी देश की जनता पर है कि वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के इस पतन के खिलाफ आवाज़ बुलंद करे। न्यायपालिका, कार्यपालिका और पुलिस, तीनों को संविधान के प्रति जवाबदेह बनाना समय की मांग है.

भारत के राजनीतिक बंदियों को आज़ाद करो—यह नारा केवल एक मांग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को बचाने का संघर्ष है.

न्यूज़ का स्रोत: भाकपा(माले) लिबरेशन की केंद्रीय कमेटी द्वारा जारी प्रेस बयान के अनुसार

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