सेवा तीर्थ: प्रधानमंत्री कार्यालय का नया नाम और नई राष्ट्रीय सोच का प्रतीक

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Ajit Kumar

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PMO का नया नाम सेवा तीर्थ: सिर्फ बदलाव नहीं, राष्ट्रभावना का संदेश

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना, 02 दिसम्बर 2025— भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एवं पूर्व विधायक प्रेम रंजन पटेल ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) का नाम सेवा तीर्थ करने के निर्णय को राष्ट्रहित और समर्पित नेतृत्व की अनूठी मिसाल बताया है.उनके अनुसार यह केवल नाम परिवर्तन का विषय नहीं, बल्कि शासन की मूल भावना—सेवा सर्वोपरि, राष्ट्र सर्वोपरि—का सशक्त संदेश है.

आज के राजनीतिक परिदृश्य में, जहाँ सत्ता अक्सर विशेषाधिकार या प्रतिष्ठा का केंद्र बन जाती है, वहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अपनाई गई विचारधारा यह सिद्ध करती है कि असली नेतृत्व वही है जहाँ सत्ता नहीं, सेवा ही धर्म मान लिया जाए.सेवा तीर्थ” इसी सोच का आधिकारिक स्वरूप है.

PMO का नया नाम सेवा तीर्थ: सिर्फ बदलाव नहीं, राष्ट्रभावना का संदेश

प्रधानमंत्री कार्यालय देश की सर्वोच्च निर्णय-निर्माण इकाई है.
जब इस कार्यालय को सेवा तीर्थ नाम दिया गया, तो यह सिर्फ एक प्रशासनिक घोषणा नहीं रही, बल्कि एक राष्ट्रीय संदेश बन गया.

यह बताता है कि यह कार्यालय जनसेवा का केंद्र है, न कि सत्ता संचय का.

यहाँ से लिए गए निर्णय करोड़ों नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं.

तीर्थ शब्द यह दर्शाता है कि यहाँ निष्ठा, जिम्मेदारी और राष्ट्रधर्म का पालन होता है.

प्रदेश प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल के अनुसार, यह नाम वर्तमान नेतृत्व की उस सोच का प्रतिबिंब है जो हर निर्णय को राष्ट्रहित की कसौटी पर कस कर लेती है.

प्रधान सेवक की सोच: देश पहले, बाकी सब बाद में

नरेंद्र मोदी स्वयं को प्रधान सेवक कहते हैं, और यह उनकी प्रशासनिक शैली में स्पष्ट दिखाई देता है.
उनके लिए प्रधानमंत्री का पद,

न विशेषाधिकार है,

न राजनीतिक लाभ का माध्यम,

बल्कि सेवा का अवसर, लोगों के जीवन में बदलाव लाने का मिशन है.

उनके नेतृत्व में भारत,

आत्मनिर्भरता की ओर,

आधुनिक विकास की ओर,

और वैश्विक नेतृत्व की ओर तेज गति से आगे बढ़ रहा है.

यह प्रगति केवल नीतियों का परिणाम नहीं, बल्कि सेवा-समर्पित दृष्टिकोण का नतीजा है.

सेवा तीर्थ: राजनीति नहीं, काम की संस्कृति का प्रतीक

आज जब कई राजनीतिक दल केवल चुनाव और वोट-बैंक पर आधारित रणनीतियों पर निर्भर हैं, वहीं मोदी सरकार अपनी पहचान काम की राजनीति से बनाती है.

सेवा तीर्थ के रूप में PMO का नया नाम यह स्पष्ट करता है कि,

निर्णय जाति, धर्म या वोट बैंक देखकर नहीं लिए जाएंगे

सरकार पारदर्शिता और राष्ट्रहित को प्राथमिकता देगी

हर नीतिगत कदम का उद्देश्य देश की भलाई और नागरिकों का उत्थान होगा

यह नाम एक तरह से उस कार्य संस्कृति की घोषणा है, जहाँ समर्पण, ईमानदारी और राष्ट्रनिष्ठा सबसे ऊपर है.

भारत की नई दिशा: आत्मविश्वास, प्रगति और प्रतिबद्धता

पिछले वर्षों में भारत का आत्मविश्वास बढ़ा है.
विश्व में भारत की आवाज़ और प्रभाव दोनों मजबूत हुए हैं.
इस परिवर्तन के पीछे वही विचारधारा है, जिसे “सेवा तीर्थ” आधिकारिक रूप देता है.
देश पहले, व्यक्ति बाद में.चाहे,

गरीब कल्याण की योजनाएँ हों,

डिजिटल इंडिया का विस्तार,

या वैश्विक मंचों पर भारत की नेतृत्व क्षमता,

हर क्षेत्र में यह स्पष्ट है कि सेवा-आधारित नेतृत्व ने देश को एक नई दिशा दी है.

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प्रेम रंजन पटेल के शब्दों में सेवा तीर्थ का सार

प्रदेश प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल का मानना है कि,
प्रधान सेवक नरेंद्र मोदी जी के मन में राष्ट्र सर्वोपरि है.
PMO का नाम “सेवा तीर्थ” रखना उसी आदर्श का सार्वजनिक प्रतीक है.
यह वही स्थान है जहाँ से देश के विकास, जनकल्याण और राष्ट्रहित के निर्णय लिए जाते हैं.

उनके अनुसार, यह नाम एक ऐसी प्रशासनिक पहचान का प्रतिनिधित्व करता है जो आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है.

निष्कर्ष: सेवा तीर्थ’—नए भारत की नई कार्य संस्कृति

PMO का नाम बदलकर “सेवा तीर्थ” रखना एक ऐतिहासिक पहल है.
यह निर्णय बताता है कि भारत में शासन अब सत्ता-केन्द्रित नहीं, बल्कि सेवा-केन्द्रित है.

यह वह दृष्टिकोण है जहाँ,

नेतृत्व समर्पण से परिभाषित होता है,

नीति राष्ट्रहित से प्रेरित होती है,

और सरकार नागरिकों की उन्नति को सर्वोच्च मानती है.

भारत आज जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, उसमें “सेवा तीर्थ” जैसी सोच की महत्त्वपूर्ण भूमिका है.
यह नाम केवल एक शब्द नहीं—यह एक राष्ट्रीय संकल्प, एक दृष्टि, और एक विश्वास है कि भारत का भविष्य सेवा, समर्पण और राष्ट्रभावना से निर्मित होगा.

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