देश में तलवारें बाँटी जा रही हैं… देश किस दिशा में जा रही है?

| BY

Ajit Kumar

भारत
देश में तलवारें बाँटी जा रही हैं… देश किस दिशा में जा रही है?

अगर सरकार मजबूत है, तो जनता असुरक्षित क्यों?

तीसरा पक्ष ब्यूरो पटना,30 दिसंबर — आज का भारत खुद को दुनिया की उभरती हुई महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है.इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल इंडिया, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और आर्थिक विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे किया जा रहा है.लेकिन इसी चमकदार तस्वीर के पीछे कुछ ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जो देश के सामाजिक ताने-बाने और आंतरिक सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करती हैं. उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में खुलेआम तलवारें बाँटे जाने की घटना ऐसी ही एक चेतावनी है. यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि यह पूछने पर मजबूर करता है—देश किस दिशा में जा रहा है?

गाजियाबाद की घटना: क्या हुआ और क्यों यह गंभीर है?

29 दिसंबर 2025 को गाजियाबाद के शालीमार गार्डन इलाके में एक संगठन द्वारा सार्वजनिक रूप से तलवारें और धारदार हथियार वितरित किए जाने का मामला सामने आया है.यह आयोजन किसी छिपी हुई जगह पर नहीं, बल्कि खुले तौर पर किया गया था. वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिनमें हथियार लहराते लोग और उकसाने वाले नारे साफ देखे जा सकता हैं.

दिल्ली से सटे इस संवेदनशील इलाके में इस तरह की गतिविधि ने स्थानीय लोगों के मन में डर और असुरक्षा की भावना पैदा कर दिया है. पुलिस ने वीडियो के आधार पर एफआईआर दर्ज की, गिरफ्तारियां हुईं और हथियार भी बरामद किया. कार्रवाई जरूरी थी, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों होने दिया गया ?

आत्मरक्षा, का तर्क या भय की राजनीति?

हथियार बाँटने वाले संगठनों का दावा है कि वे यह सब ,आत्मरक्षा, के नाम पर कर रहे हैं.वे पड़ोसी देशों या अंतरराष्ट्रीय घटनाओं का हवाला देकर यह तर्क देता हैं कि समाज को,तैयार रहना चाहिये.
लेकिन आत्मरक्षा का मतलब क्या कानून को अपने हाथ में लेना है?
क्या किसी लोकतांत्रिक देश में हथियार बाँटना नागरिक सुरक्षा का वैध तरीका हो सकता है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी गतिविधियों के पीछे सुरक्षा से ज्यादा डर पैदा करने और एक खास मानसिकता को भड़काने की राजनीति काम करती है. जब जनता को लगातार यह महसूस कराया जाए कि वह असुरक्षित है, तो समाज अपने-आप बंटने लगता है.

अगर सरकार मजबूत है, तो जनता असुरक्षित क्यों महसूस कर रही है?

सरकारें जब खुद को ,मजबूत बताती हैं, तो उसका अर्थ सिर्फ सीमा सुरक्षा या सैन्य ताकत नहीं होता.असली मजबूती तब दिखता है, जब आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस करे.लेकिन आज स्थिति उलट दिख रही है,

लोग पुलिस और कानून पर भरोसा करने के बजाय खुद हथियार उठाने की बात कर रहा हैं.

अफवाहें और फेक न्यूज डर को और बढ़ा रही हैं.

सोशल मीडिया पर नफरत और हिंसा को सामान्य बना दिया गया है.

यह असुरक्षा की भावना बताती है कि राज्य और समाज के बीच भरोसे की खाई बढ़ रही है.

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कानून-व्यवस्था बनाम राजनीतिक चुप्पी

पुलिस की कार्रवाई अपनी जगह जरूरी है, लेकिन असली सवाल राजनीतिक इच्छाशक्ति का है.जब ऐसे मामलों पर स्पष्ट, सख्त और सर्वदलीय संदेश नहीं आता, तो समाज में यह धारणा बनती है कि कुछ लोगों को ,छूट मिली हुई है.

लोकतंत्र में कानून का राज होना चाहिये, न कि समूहों की ताकत का.अगर आज एक संगठन तलवार बाँट सकता है, तो कल दूसरा संगठन भी यही करेगा.यह सिलसिला अंततः अराजकता की ओर ले जाता है.

सामाजिक सौहार्द पर खतरा

भारत की असली ताकत उसकी विविधता है.अलग-अलग धर्म, भाषा और संस्कृति के लोग मिलकर इस देश को बनाता हैं. लेकिन जब हथियारों के ज़रिए पहचान और डर की राजनीति की जाती है, तो,

आपसी भरोसा टूटता है.

साम्प्रदायिक तनाव बढ़ता है.

दंगे और हिंसा की आशंका बढ़ जाती है.

इसका असर सिर्फ समाज पर नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, निवेश और अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ता है.

समाधान: सिर्फ कार्रवाई नहीं, दिशा भी जरूरी

इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए केवल पुलिसिया कार्रवाई काफी नहीं है. जरूरत है एक व्यापक दृष्टिकोण कि,

कानून का सख्त पालन

हथियारों के अवैध वितरण पर ज़ीरो टॉलरेंस नीति अपनाई जाये.

इंटेलिजेंस और निगरानी मजबूत हो

ऐसी गतिविधियों को होने से पहले ही रोका जाये .

राजनीतिक स्पष्टता

हर तरह की हिंसा और नफरत के खिलाफ बिना भेदभाव के आवाज उठे.

सोशल मीडिया पर नियंत्रण

फेक न्यूज और भड़काऊ कंटेंट पर सख्त कार्रवाई हो.

संवाद और शिक्षा

युवाओं को डर नहीं, संविधान और कानून पर भरोसा सिखाया जाए.

निष्कर्ष: तलवार नहीं, संविधान देश को सुरक्षित रखता है

गाजियाबाद की घटना एक आईना है, जिसमें हमें अपना वर्तमान और भविष्य दोनों दिखता हैं। अगर हमने समय रहते सवाल नहीं पूछे, तो विकास की चमक के पीछे समाज का अंधकार गहराता जाएगा.
मजबूत देश वह नहीं होता जहां लोग हथियार लेकर चलें, बल्कि वह होता है जहां कानून इतना मजबूत हो कि किसी को हथियार उठाने की जरूरत ही न पड़े.

भारत को तलवारों से नहीं, संवाद, न्याय और संविधान से सुरक्षित बनाया जा सकता है. यही रास्ता हमें एक सचमुच मजबूत और समावेशी राष्ट्र की ओर ले जाएगा.

स्रोत: सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और गाजियाबाद पुलिस की कार्रवाई के आधार पर.

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